|
रबींद्र संगीत की अमरीकी साधिका | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
रबींद्र संगीत का नाम लेते ही मन में स्वाभाविक रूप से बंगाल और बंगालियों का ख़याल आता है लेकिन अगर किसी अमरीकी का नाम लेते ही रबींद्र संगीत का ख़याल आने लगे तो आश्चर्य होना स्वाभाविक है. पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता की ली एलिसन सिबली एक ऐसा ही नाम है. वे यहां अमरीका के महावाणिज्य दूत जॉर्ज सिबली की पत्नी हैं. ली ने रबींद्र संगीत के अपने पहले एलबम, “दूर के कोरिले निकट ” में यानी दूर को पास ले आएँ, के शीर्षक को चरितार्थ करते हुये बंगाल और अमरीका को एक दूसरे का सांस्कृतिक पड़ोसी बना दिया है. रबींद्र संगीत में दिलचस्पी के कारण ली ने कोलकाता आने के कुछ दिनों बाद ही रबींद्र संगीत की जानी मानी गायिका प्रमिता मलिक से बँगला सीखना शुरू किया और फिर जल्दी ही गुरु रबींद्र नाथ के गीतों का अपना पहला एलबम तैयार कर लिया. इस एलबम को रिकॉर्ड कंपनी सारेगामा ( जो पहले एचएमवी के नाम से जानी जाती थी) ने तैयार किया है. लगन और मेहनत
इस एलबम में ली के अलावा उनकी गुरु और शिष्या प्रमिता मलिक ने बँगला और अंग्रेज़ी में रवींद्र नाथ के मशहूर गीत “ एकला चलो रे ” समेत कुल 13 गीत गाए हैं. ली बताती हैं कि वे टैगोर की कविताएं तो कॉलेज के दिनों से ही पढ़ती थीं. कोलकाता आने के कुछ ही दिनों बाद ही एक कार्यक्रम में प्रमिता को गाते सुनकर वे काफी प्रभावित हुईं. कार्यक्रम के बाद उन्होंने प्रमिता से मिलकर रबींद्र संगीत सीखने की इच्छा जताई. प्रमिता को पहले तो हैरानी हुई लेकिन अमरीकी संगीत सिखाने के बदले, वे ली को रबींद्र संगीत सिखाने को तैयार हो गईं. इस तरह वे दोनों एक दूसरे की गुरु-शिष्या बन गईं. ली बताती हैं कि शुरुआत में तो उनको बँगला सिखाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी लेकिन धीरे धीरे ये आसान लगने लगा. उनका पहला कार्यक्रम कोलकाता के राजभवन में हुआ. पुराना संगीत प्रेम वैसे ली के लिये संगीत का क्षेत्र कोई नया नहीं है. न्यूयॉर्क में जन्मी और पली बढ़ी ली ने पहले बोस्टन विश्वविद्यालय से स्नातक और फिर न्यूयॉर्क से संगीत में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की. उसके बाद उन्होंने ब्रिटन स्थित मेसन विश्वविद्यालय से शिक्षा (एजुकेशन) में भी स्नातकोत्तर की उपाधि ली.
पति के साथ दुनिया के विभिन्न देशों में रहने के दौरान वे संगीत के अध्यापन से जुड़ी रही हैं. अब भी वे यादवपुर और कोलकाता विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं. ली संगीत के अलावा सामाजिक मोर्चे पर भी काफी सक्रिय हैं. बच्चों और महिलाओं के हित में काम करने वाले सात ग़ैरसरकारी संगठनों से से जुड़ी होने के अलावा वे “कोलकाता हैश ग्रुप” नामक अपनी भी एक संस्था चलाती हैं. वे बंगाल ही नहीं पूरे भारत की विविधताओं से काफी प्रभावित हैं. ली एक यहूदी हैं और उनको सबसे ज़्यादा नफ़रत रंगभेद से है. अगला एलबम अब वे अपने अगले एलबम की तैयारी कर रही हैं. ली बताते हैं कि ये मौसम के गीत होंगे. रबींद्र संगीत पर आधारित इस एलबम में मॉनसून से लेकर शीत और बसंत तक के गीत होंगे. अपने फ़ुरसत के वक़्त में वे बाग़बानी भी करती हैं और अपने घर आने वालों को बड़े विस्तार से एक - एक फूल और पौधे के बारे में बताती हैं. भारत और अमरीका के सामाजिक और सांस्कृतिक संबंधों को मज़बूत बनाने में भूमिका के लिए वे कोई श्रेय नहीं लेना चाहतीं. वे कहती हैं कि वे ये सब अपनी ख़ुशी के लिये करती हैं. सब लोग आपस में प्यार और शांति से रहें, इससे बड़ी दुनिया में और कोई ख़ुशी नहीं हो सकती. फ़िलहाल तो रबींद्र संगीत की विदेशी गायिका का पूरा ध्यान अपने अगले एलबम पर है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||