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शनिवार, 03 जुलाई, 2004 को 17:51 GMT तक के समाचार
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लंदन में ब्रास बैंड की गूँज

जबलपुर का श्याम ब्रास बैंड
ब्रास बैंड की कला का लंदन में लोहा मनवाया
लंदन में तीन जुलाई को बारिश और खिली हुई धूप की आँख मिचौली के बीच अलग-अलग देशों के लोक गीत को सुनना और उनकी धुनों पर थिरकते पैरों को देखना एक अनोखा आनंद था.

उससे भी सुखद आनंद था भारत के आमजन के संगीत यानी ब्रास बैंड की धुन पर पश्चिमी लोगों को नाचते हुए देखना.

भारत में ब्रास बैंड आम लोगों का संगीत रहा है और ब्रास बैंड से किसी भी शादी में यह धुन ज़रूर सुनने को मिलती थी - "आज मेरे यार की शादी है, या फिर - "बहारों फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है...

लेकिन पिछले कुछ सालों में अन्य संगीत उपकरणों का विकास होने पर ब्रास बैंड की लोकप्रियता कुछ कम होती जा रही है.

मगर आश्चर्य की बात ये थी कि इसी ब्रास बैंड को लंदन में संगीत गाँव महोत्सव में पेश किया गया तो लोगों को बहुत पसंद आया.

संगीत का आनंद लिया लोगों ने
संगीत के साथ-साथ थिरके लोग

ब्रास बैंड चूँकि चलते-फिरते हुए बजाया जाता है, इसलिए लंदन के कीव गार्डन में संगीत महोत्सव में भी इसे इसी अंदाज़ में पेश किया गया.

मंच से ऐलान किया गया कि अब पेश है भारत के जबलपुर शहर का मशहूर ब्रास बैंड तो लोग चौंके कि मंच पर तो सिर्फ़ एक ही आदमी था, जो यह घोषणा कर रहा था, फिर ब्रास बैंड कहाँ है?

बस उस घोषणा के चंद लम्हों बाद ही भीड़ के पीछे से ब्रास बैंड ने जब धुन छेड़ी तो सब उसके साथ झूमने लगे और पैरों को थिरकने से नहीं रोक सके.

लंदन में चूँकि शनिवार और रविवार को छुट्टी का समाँ होता है इसलिए खिली हुई धूप में लोगों को जब इस धुन पर अपने शरीर को लोच देने का मौक़ा मिला तो बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, सबने इस मौक़े का ख़ूब फ़ायदा उठाते हुए, बैंड की ताल से ताल मिलाई.

परंपरा और संस्कृति

भारत में ब्रास बैंड ब्रितानी शासन के ज़माने में क़रीब एक सदी पहले प्रचलित हुआ था.

पहले तो ब्रास बैंड दरबारों और सेना का बैंड हुआ करता था लेकिन भारत से ब्रितानी शासन की समाप्ति के बाद यह आम लोगों में पहुँच गया क्योंकि दरबारों से निकले ये संगीतज्ञ रोज़ी रोटी की तलाश में लगे तो शादी ब्याहों और त्यौहारों के मौक़े पर संगीत पेश करने के रूप में उन्हें अच्छा मौक़ा मिल गया.

भारत ही नहीं, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल में ब्रास बैंड काफ़ी लोकप्रिय रहा है और अकेले भारत में ही क़रीब पाँच लाख लोग ब्रास बैंड की कला में माहिर रहे हैं, और यही उनकी रोज़ी-रोटी का एकमात्र सहारा भी रहा है.

शादी-ब्याह, तीज त्यौहार से लेकर ख़ुशी के हर मौक़े पर ब्रास बैंड ही गूँजता था लेकिन आर्केस्ट्रा और अन्य उपकरणों का चलन आने से ब्रास बैंड पर लोकप्रिय फ़िल्मी गीतों की धुनें अब कम ही सुनाई देती हैं.

जबलपुर का श्याम ब्रास बैंड लंदन में
अपनी कला के लंदन में प्रदर्शन पर ख़ुशी

लेकिन जबलपुर, मध्य प्रदेश के श्याम ब्रास बैंड के प्रबंधक अविनाश त्रिवेदी कहते हैं कि उनके बैंड को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी ख्याति मिली है और वे भविष्य को लेकर आशान्वित हैं.

अविनाश बताते हैं कि वह जबलपुर के श्याम बैंड का गठन तो उनके पुरखों ने 1940 के आसपास किया था लेकिन 1971 से उसे ख्याति मिली.

अविनाश बताते हैं कि श्याम ब्रास बैंड में कुल 225 सदस्य हैं लेकिन लंदन में अपनी कला दिखाने के लिए सिर्फ़ 12 कलाकार ही आ सके.

श्याम ब्रास बैंड ने 1990 में अंतरराष्ट्रीय ख्याति हासिल की जब ब्रिटेन और बेल्जियम सहित कई अन्य देशों में अपनी कला का प्रदर्शन करने का मौक़ा मिला.

श्याम ब्रास बैंड तब से लेकर तीन बार ब्रिटेन में अपनी फूँक की कला दिखा चुका है. यह उन कलाकारों के मुँह की फूँक ही होती है जो पीतल के इस उपकरण से तरह-तरह की धुनें निकलवाती है.

लेकिन ब्रास बैंड को अपने गले की ताक़त लगाकर बजाने वाले कलाकार तमाम मुश्किलों के बावजूद हिम्मत हारने के लिए तैयार नहीं हैं और साँस की अनेक बीमारियों का शिकार होने के बावजूद वे इस कला को जीवत रखने के लिए कमर कसे हुए नज़र आते हैं.

दुनिया की झलक

इस संगीत महोत्सव में अनेक देशों को लोकप्रिय संगीत की झलकियाँ पेश की गईं जिनमें पोलैंड, यमन, दक्षिण अफ्रीका, मोरक्को, त्रिनिदाद एंड टोबैगो वग़ैरा.

दक्षिण अफ्रीका का नृत्य
इस नृत्य ने पाँव ख़ुद-ब-ख़ुद थिरका दिए

दर्शकों को ऐसे बैंड समूहों का हुनर भी देखने को मिला जिन्होंने अलग-अलग देशों को लोकप्रिय संगीत उपकरणों को एक समूह में पेश किया.

यमन के अल अहमदी गुट ने जब अपने सिमसिमिया, तम्बूरा, मिज़मर, मिरवाज़ और हाजिर (बड़े और छोटे ढोलक) जैसे देसी संगीत उपकरणों के साथ अफ्रीका से प्रभावित लीवा और बम्बीला नृत्प पेश किया तो लोग साथ-साथ झूमे-नाचे तो सही, और गानों की भी फ़रमाइश करने लगे.

नज़ारा देखने लायक था कि बच्चे-बुज़ुर्ग, औरतें, मर्द सभी तालियाँ बजाते-बजाते, धुनों के साथ थिरकने लगे.

बीच-बीच में बादलों ने भी फुहार गिराई लेकिन कुछ लोग ऐसी मस्ती में थे कि नाचते हुए भीगने का आनंद नहीं छोड़ने चाहते थे.

दक्षिण अफ्रीका की टुकड़ी ने जब मंच पर ज़ुलू क़बीले का इसिकथमिया नृत्य पेश किया तो मंच धम-धम तो बोलने ही लगा, लोगों ने भी पैरों को थिरकाते हुए और तालियों से ताल मिलाने की कोशिश की.

लंदन की व्यस्त ज़िंदगी में से कुछ पल निकालकर हरी-हरी घास पर लेटते-बैठते हुए और धूप और बारिश का एक साथ आनंद लेते हुए तरह - तरह के संगीत को सुनना बेशक अनोखी ताज़गी देने वाला था.

संगीत गाँव महोत्सव के मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रकाश दसवानी कहते हैं कि इस महोत्सव का मक़सद ब्रिटेन में रहने वाले विभिन्न देशों के लोगों को उनकी पहचान और संस्कृति का अहसास कराना है.

"ब्रिटेन में विभिन्न देशों के लोग रहते हैं जो अपनी-अपनी संस्कृति का प्रतिनिधित्व तो करते ही हैं, उसस जुड़े भी रहते हैं. यह संगीत महोत्सव उन्हें अपनी जड़ों से जुड़ने का अहसास कराता है."

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