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संगीत दंगल में राजनीति की बखिया उधड़ी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राजस्थान के पारंपरिक 'हेला ख़याल' संगीत दंगल में ग्रामीणों ने नेताओं को जमकर कोसा और भारत उदय नारे की खूब खिल्ली उड़ाई. दौसा ज़िले के लालसोट क़स्बे में 72 घंटे तक लगातार चले इस संगीत दंगल में ग्रामीण गायकों ने सोनिया गाँधी के विदेशी मूल पर भी सवाल उठाए. ढाई सौ साल पुराने इस संगीत दंगल में ग्रामीण समूह अपनी-अपनी रचनाओं के साथ मंच पर आए और देश के नीति निर्माताओं पर जमकर प्रहार किए. उनके गीत संगीत में भारत-पाकिस्तान संबंध, क्रिकेट, फ़िल्मी सितारों का राजनीति में आना, मंदिर निर्माण, रथ यात्रा और भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दे और राजनीतिक पात्र शामिल थे.
पारख संगीत मंडल ने चुनाव के समय मंदिर राग छेड़ने पर भारतीय जनता पार्टी की कुछ इस तरह ख़बर ली-- "बीजेपी के एजेंडा की पोल खोल बताते हैं, सभी पर चुटकियाँ शेखोपुरा संगीत मंडल ने भारतीय जनता पार्टी के सुर में सुर मिलाया, फ़ील गुड नारी की तारीफ़ की और सोनिया गाँधी के विदेशी मूल पर कटाक्ष किया. उनका गीत था--- "तुम तो ठहरे परदेसी, साथ क्या निभाओगे,
लेकिन लक्ष्मी संगीत मंडल को लालकृष्ण आडवाणी का ठीक चुनाव से पहले रथ पर चढ़ना ठीक नहीं लगा तो कुछ इस तरह तान छेड़ी--- "भारत उदय कराएंगे, इंदिरा जी ने पहले ही उदया कराया, अब तुम क्या कराओगे." इस दंगल में तीन दिन तक लोगों का सैलाब सा उमड़ा रहा और हर समूह ने अपनी रचनाओं और कलाकारों के साथ लोक गायन शैली में अनोखा प्रदर्शन किया. इस संगीत दंगल की विशेषता ये है कि इन तीखी टिप्पणियों का कोई बुरा नहीं मानता है. हालाँकि पूरा दंगल भारतीय जनता पार्टी और काँग्रेस के खेमों में बँटा नज़र आया. माहौल संसद में किसी बहस के दृश्य जैसा लगा. बस फ़र्क ये था कि यहाँ कोई हाथापाई नहीं हुई और सभी कलाकार एक दूसरे की रचनाओं और प्रस्तुति की प्रशंसा भी करते हैं. प्रत्येक समूह में एक व्यक्ति गाँववालों की मदद से अख़बार पढ़कर सम-सामयिक मुद्दों पर रचनाएं तैयार करता है जिसे मीडिया कहा जाता है.
महाकाली मंडल में मीडिया मैन नंदकुमार ने अपनी रचना में फ़िल्मी सितारों पर प्रहार किया. उनका कहना था कि भारतीय जनता पार्टी को अब साधु संतों की ज़रूरत नहीं है इसलिए फ़िल्मी कलाकारों की भर्ती की जा रही है, वरिष्ठ नेताओं को भुला दिया गया है और संसद को रंगमंच बनाया जा रहा है. स्थानीय मंत्री और विधायक नीचे बैठकर इन रचनाओं को सुनते हैं और व्यंग्य बाणों का भी सामना करते हैं. शायद यही मंच रह गया है जहाँ नेताओं को मंच के बजाय नीचे आम लोगों में बैठना पड़ता है. उस रचनाएं ऐसी-ऐसी जो राजनीति की पोल खोलती नज़र आती हैं-- "भारत के नेताओं की नीयत में नज़र आए भारी खोट, "जनता मरती, सैनिक मरते, नेता एक नहीं मरते, |
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