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इतिहास को दोहराती एक और फ़िल्म | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लगान और देवदास की सफलता ने ख़स्ताहाल बालीवुड को एक पुराने और आज़माए हुए फार्मूले की याद फिर से दिला दी और फार्मूलों की तलाश मे हमेशा बेकल रहने वाली इंडस्ट्री में ढेर सारी पीरियड फिल्मों की घोषणा होने लगी. मगर इतिहास पर आधारित इन फिल्मों मे से ज़्यादातर इतिहास ही हो के रह गईं. जो बन पाईं उनमे से एक है अकबर खान की ताजमहल. अक़बर खान को इतिहास से इश्क रहा है. भाई संजय खान की मदद के लिये उन्होने धारावाहिक टीपू सुलतान के कुछ एपीसोड्स का निर्देशन सम्हाला और फिर अकबर दी ग्रेट सीरियल बनाया. ताजमहल उनकी आनेवाली फिल्म है जो मोहब्बत और इतिहास दोनो को बयान करती है. अकबर खान के शब्दों मे ताजमहल महज़ एक खूबसूरत मकबरा नही है,वो मुग़लिया सल्तनत की शान और सियासी कशमकश का गवाह भी है जिसमें इश्क की खुशबू है तो नफरत की आँधी भी है. पेश है अक़बर खान से उनकी फिल्म पर अपराजित शुक्ल की बातचीत. आपकी फिल्म ताजमहल शाहजहाँ और मुमताज़ की मोहब्बत का इतिहास है या आपकी इतिहास से मोहब्बत की दास्तां? शाहजहाँ ने जिस जुनून से 20 साल और 22000 मजदूरों से ताजमहल बनवाया मैने उसी जुनून से ये फिल्म पूरी की है. और ताज ही की तरह इसके हर कोने हर पहलू को खूबसूरती से तराशा है ताकि दर्शकों के ज़ेहन मे ये फिल्म उसी तरह दमकती रहे जैसा कि इतिहास के दोराहे पर ताज अपनी भव्यता लिये चमकता रहा है. आप फिल्म मे ऎश्वर्या राय और रेखा को लेना चाहते थे फिल्म में उनके न होने की की क्या वजहें रहीं? जी हाँ ,मैं मुमताज़ महल के किरदार के लिये ऎश्वर्या राय और नूरजहाँ की भूमिका के लिये रेखा को लेना चाहता था क्योकि दोनो ही बेहतरीन अदाकारा हैं ,मगर दोनो बहुत मसरूफ थीं और मैं अपनी फिल्म के हर किरदार को पूरा वक्त दे कर इत्मिनान से शूट करना चाहता था , इसलिये ये मुमकिन न हो सका. मुगलों के स्वर्ण काल को फिर से ज़िंदा करने के लिये आपने अभिनेताओं का चुनाव किस आधार पर किया? मेरी फिल्म मे किरदार सबसे अहम हैं उन्ही के अनुरूप कद- काठी और रूप- रंग के अदाकारों की ज़रूरत थी. शाहजहाँ की आलीशान शख़्सियत के लिये कबीर बेदी सबसे पहले ज़ेहन मे आए और उन्ही के अनुरूप नौजवान शाहजहाँ यानि ज़ुल्फिकार सईद चुने गए. मुमताज़ महल की नज़ाकत और सुंदरता के पैमाने पर सोनिया जहाँ चुनी गईं. इन दोनो को मुग़लिया तौर – तरीकों, रहन–सहन और तलफ्फुज़ की ट्रेनिंग दी गई.
शाहज़ादी जहाँआरा जिसने गद्दी के लिये एक दूसरे के ख़ून के प्यासे भाईयों और बूढ़े पिता के बीच पुल का काम किया था,उस अहम किरदार को निभा रही है मनीषा कोईराला. औरंगज़ेब के ख़ूँखारपन को ज़िंदा करने मे अरबाज़ ख़ान ने कोई कसर नही छोड़ी है, शाहजहाँ की माँ का किरदार पूजा बत्रा ने किया है. एक बात और उस युग के संगीत को जगाने के लिये मैने शुरु से ही नौशाद साहब को तय कर लिया था जिन्होने बेहतरीन ढंग से अपने काम को अंजाम दिया है । आज के तेज़–तर्रार संगीत के मुकाबले आपने मद्धम लय के पुराने ढंग के संगीत को तवज्जो दी ... कोई ख़ास वजह? नौशाद साहब ने मुगले-आज़म और बैजू बावरा जैसी फिल्मों में अमर संगीत दिया है ।उनका संगीत उस वक़्त के मिजाज़ को बेहतरीन ढ़ंग से पेश कर सकता है. आज का तेज़ संगीत लोगों के ज़हन मे गहरे बैठता नही है,ये रीत बदलेगी और संगीत में मेलोडी लौटेगी. इतिहास पर बनी एक और चर्चित फिल्म रज़िया सुलतान की असफलता में उसकी गाढ़ी उर्दू का भी योगदान रहा है ,आपने फिल्म की भाषा कैसी रखी है? हमने ख़ास ध्यान रखा है कि भाषा साधारण हो और हर ख़ासो आम की समझ में आए, साथ ही मुगलों के अंदाज़े – बयानी का फ्लेवर भी हो. सईद गुलरेज़ ने गानों और डायलाग्स को इस तरह तराशा है के दर्शकों की ज़बान तक ही नही बल्कि दिल तक उनका असर होगा । अभिनय आपका पहला प्यार रहा है. इस फिल्म मे सिर्फ डायरेक्टर का किरदार निभा कर आप कैसे संतुष्ट हो पाए? ये सब्जेक्ट इतना बड़ा था कि पूरी लगन से फोकस किये बिना इसके साथ इंसाफ करना मुमकिन न होता, इसलिये मैने एक ही काम करने का फैसला किया और पर्दे के पीछे अपनी भूमिका अदा की .. आने वाले प्रोजेक्ट्स में मुमकिन है के मैं कोई भूमिका करूँ .... |
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