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'क्या पता फिर संगीत एलबम बनाऊँ' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
'क़यामत से क़यामत तक' से हिंदी फ़िल्म प्रेमियों के दिलों में जगह बनाने वाले अभिनेता दिलीप ताहिल ने बाद के वर्षो में 'बाज़ीगर', 'हम हैं राही प्यार के', 'सोल्जर' और 'कहो न प्यार है' जैसी कई फ़िल्मों में काम किया. दिलीप ताहिल ने टेलीविज़न और थियेटर में भी बहुत काम किया है. गाने का शौक़ रखने के कारण उन्होंने लंदन में 'बॉम्बे ड्रीम्स' म्यूज़िकल में अभिनय करना स्वीकार किया. ताहिल ने ब्रिटेन के सबसे लोकप्रिय टेलीविज़न धारावाहिक 'ईस्ट एंडर्स' में भी एक अहम भूमिका की. हमने लंदन में दिलीप ताहिल से बातचीत की- हिंदी फ़िल्मप्रेमियों को बताएँ कि आप आजकल क्या कर रहे हैं? मैं इन दिनों यहाँ ब्रिटेन में करण राज़दान की एक फ़िल्म में काम कर रहा हूँ. इसका कोई नाम अभी नहीं दिया गया है. बहुत अच्छी स्टोरी है. मेरे हाथ में डेविन धवन, सतीश कौशिक और अनंत महादेवन की फ़िल्में भी हैं. इसके अलावा मैं यहाँ कुछ ब्रिटिश प्रोजेक्ट्स में भी काम कर रहा हूँ. मतलब मुझे यहाँ लंदन में भी रहना होगा और भारत में भी. आपने भारत और ब्रिटेन, दोनों जगह ख़ूब अभिनय किया है. आप दोनों जगह काम करने के तरीक़े और माहौल में क्या अंतर पाते हैं? माहौल दोनों जगह अच्छा है. हाँ, यहाँ पर प्लानिंग थोड़ी ज़्यादा ज़रूर होती है. आपको बहुत पहले मालूम हो जाता है कि आप कहाँ और किस दिन क्या कर रहे हैं. हिंदी फ़िल्म उद्योग इतना व्यवस्थित नहीं है. लेकिन वहाँ का फ़्लेवर और तेवर थोड़ा अलग है. मैं दोनों पसंद करता हूँ. मैं दोनों बहुत ज़्यादा नहीं कर सकता हूँ. दोनों में बैलेंस बनाकर चलना अच्छा लगता है. आपने एक्टिंग के तीनों फॉर्मेट में काम किया है, यानी थियेटर, टेलीविज़न और फ़िल्म में. आप इनमें से किसे ज़्यादा पसंद करते हैं? किसमें आपको सबसे ज़्यादा मज़ा आता है? एन्ज़्वॉय तो मैं तीनों को करता हूँ. अच्छा भी तीनों को मानता हँ. लेकिन हमारे एक्टर बिरादरी में एक कहावत प्रचलित है- थियेटर एक्टर का मीडियम है, टेलीविज़न राइटर(लेखक) का मीडियम है और फ़ीचर फ़िल्म डायरेक्टर(निर्देशक) का मीडियम है. मैं टेलीविज़न और फ़ीचर फ़िल्म एन्ज़्वॉय करता हूँ, लेकिन मुझसे पूछा जाए कि दिल के क़रीब कौन-सा मीडियम है तो मैं ज़रूर थियेटर का नाम लूँगा. थियेटर में जब पर्दा उठता है तो वहाँ सिर्फ़ एक्टर होता है, 'कट' बोलने के लिए कोई डायरेक्टर नहीं होता. उसके बाद जो भी ग़लतियाँ होती है आपको ख़ुद एडजस्ट करना पड़ता है. आप रूक नहीं सकते.
टेलीविज़न को मैं एक विशेष माध्यम मानता हूँ. यह पब्लिक का मीडियम है. और कुछ कहानियाँ ऐसी हैं जो टेलीविज़न पर ही की जा सकती हैं किसी अन्य मीडियम में उसे बनाना संभव नहीं होता. आपको गाने का शौक है ये तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ क्योंकि कुछ साल पहले आपने एक संगीत एलबम रिलीज़ किया था. आजकल आप इस शौक के बारे में क्या कर रहे हैं? एलबम आए तो कोई पंद्रह साल हो चुके हैं. वो एक्सपेरिमेंट था. हाँ, मुझे गाने का बहुत शौक है. मेरा गाने का जो स्टाइल है वो मैं थियेटर में, म्यूज़िकल्स में पूरा करता हूँ. अभी दूसरा एलबम लाने की कोई योजना तो नहीं है, लेकिन कौन जाने आगे क्या होता है. दिलीप ताहिल अभिनय और गायन के अलावा ख़ाली वक़्त में क्या करता है? इन दोनों के बाद ख़ाली वक़्त तो मिलता नहीं. लेकिन समय मिला तो मैं क्रिकेट देखता हूँ और क्रिकेट खेलता भी हूँ. मेरा 15 वर्षीय बेटा भी यहीं एक इंग्लिश काउंटी के लिए क्रिकेट खेलता है. बढ़िया खेलता है. |
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