|
अब भी रास्ता दिखाता है पृथ्वी थिएटर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
'कला देश की सेवा में'- इसी सपने को साकार करने के लिए आज से 60 साल पहले भारतीय सिनेमा के दिग्गज पृथ्वीराज कपूर ने 1944 में एक चलती-फिरती थिएटर कंपनी की स्थापना की थी. देश में घूम-घूम कर नाटक दिखाने वाली इस कंपनी में 150 लोग काम करते थे जिसमें कलाकार, मज़दूर, रसोइया, लेखक और टेक्नीशियन सभी प्रकार के लोग थे. पिछले 60 साल में बहुत कुछ बदला. घूम-घूम कर नाटक दिखाने वाली ये कंपनी एक स्थान पर सिमट गई. फिर भी पृथ्वी थिएटर के मैनेजर अयाज़ अंसारी का दावा है कि पृथ्वी थिएटर अपने उद्देश्य के लिए आज भी उसी लगन से काम कर रहा है जिसको लेकर उसकी स्थापना हुई थी. तलाश एक अनुमान के अनुसार फ़िल्मों में हीरो हीरोइन बनने के लिए आए दिन लड़के-लड़कियाँ मुंबई आते हैं जिनमें से कई किसी-न-किसी तरह पृथ्वी थिएटर तक पहुँच जाते हैं.
मंथन थिएटर ग्रुप के मालिक संजीव कुमार रजत का भी यही कहना है. संजीव कुमार कहते हैं, ‘‘ पृथ्वी थिएटर पर संघर्ष करने वालों की अच्छी ख़ासी भीड़ होती है. 1993 में जब मैं यहाँ आया था उस समय यहाँ एक प्लेटफ़ॉर्म शो होता था." वो बताते हैं, "कुछ दिन मैं सिर्फ़ देखता रहा. एक दिन हिम्मत बटोर कर अपनी इच्छा रख दी. मुझे ‘सोलो’ नाटक करने का मौक़ा मिला. मेरा अभिनय पसंद किया गया. तब से मैने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.’’ अपना अलग ग्रुप बनाने से पहले संजीव ने पृथ्वी थिएटर में सक्रिय ग्रुप ‘यात्री’ और ‘अंश’ के लिए काम किया. उनका कहना है कि वहाँ वही लोग सफल होते हैं जिनका कोई बैकग्राउंड होता है जो पहले इस तरह के काम कर चुके होते हैं. बिहार के बेगूसराय ज़िले से आने वाले भूपेश सिंह ने वहाँ संघर्षरत लोगों की स्थिति और पृथ्वी थिएटर की उपयोगिता का ब्योरा कुछ इस तरह दिया. भूपेश ने कहा,"पाँच रूपए में चाय मिल जाती है, कुछ लोगों से मुलाक़ात हो जाती है, कम से कम यहाँ पानी तो मुफ़्त मिल ही जाता है." भूपेश पृथ्वी थियेटर इसलिए आते हैं कि यहाँ से उन्हें प्रेरणा मिलती है और लोगों को सफल होते देख कर उन्हे हौसला मिलता है साथ ही एक दूसरे के हालात की जानकारी भी उन्हें मिलती रहती है. उनका कहना है कि उनकी रोज़ी-रोटी का एकमात्र स्रोत ऐक्टिंग ही है और उन्हे वहाँ छोटे-मोटे रोल मिलते रहते हैं. पृथ्वी थिएटर के बारे में बिहार के दरभंगा ज़िले से आने वाले फ़ैयाज़ हसन का कहना है कि यहाँ कुछ न कुछ होता रहता है. यहाँ कलाकारों से मुलाक़ात हो जाती है और फ़िल्म इंडस्ट्री के मिज़ाज का पता चलता है. हिम्मत चाहिए उनका कहना है,"यहाँ आने वाले सभी सफल नहीं होते. यहाँ टिके रहने के लिए फ़ौलाद का कलेजा चाहिए." वो आगे कहते हैं, ‘‘ हर दिन चार-पाँच सौ लोग भाग कर मुंबई आते हैं, कुछ जल्दी लौट जाते हैं, कुछ लुट पिट कर वापस जाते हैं और कुछ हम जैसे भी हैं जो यहीं अपनी कब्र बनाने पर तुले हैं.’’ जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली से मास कम्युनिकेशन का कोर्स करने के बाद मुंबई आने वाले मुरारी द्विवेदी पृथ्वी थियेटर अपने दोस्तों से मिलने के लिए ही आते हैं. मुरारी एक कैमरामैन हैं और शुरू से ही यहाँ उनका रास्ता आसान रहा. उन्होंने ‘कौन बनेगा करोड़ पति’ ‘कमज़ोर कड़ी कौन’ ‘खुल जा सिम सिम’ जैसे कई बड़े सीरियल के लिए फ़ोटोग्राफ़ी की है. उनका कहना है कि फ़िल्म लाइन में यहाँ दिल्ली से ज़्यादा अवसर हैं, शर्त है काम की जानकारी. पृथ्वी थिएटर 1972 में पृथ्वीराज कपूर के निधन के बाद उनके पुत्र शशि कपूर ने पत्नी जेनिफ़र के साथ मिलकर पृथ्वी थियेटर ट्रस्ट की स्थापना की. उन्होंने समुद्र तट पर जूहू में ज़मीन ख़रीद कर एक थिएटर भवन का निर्माण किया. इसमे 200 सीटें हैं. इसमें 1978 से हर साल लगभग 400 शो दिखाए जाते हैं. और 50 से भी अधिक थिएटर ग्रुप इसमें सक्रिय हैं. पृथ्वी राज कपूर की पोती और शशि कपूर और जेनिफ़र की बेटी संजना कपूर पृथ्वी थिएटर की निदेशक हैं. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||