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'मैं किसी को हराने नहीं आया हूँ' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछले बारह संस्मरणात्मक लेखों में मैने ख़ुद को भी देखा, खोजा, पाया. इस सिरीज़ के अंतिम लेख में मैं बीबीसी हिंदी के अधिकारियों को धन्यवाद देना चाहूँगा. उन्होंने मुझे अवसर दिया है कि मैं अपनी मर्ज़ी की कुछ बातें कर सकूँ. आमतौर पर ऐसी बातें नहीं छपतीं. न तो कोई पूछता है और न हम बताते हैं. बिहार के बेतिया ज़िले के एक छोटे से गाँव से निकलकर मैं दिल्ली पहुँचा. वहाँ से मुंबई आया और एक संघर्ष के बाद थोड़ी पहचान हासिल कर सका. मेरा संघर्ष कोई अनूठा नहीं है. फिर भी फ़िल्म इंडस्ट्री के पंडितों और ज्योतिषियों से मुझे शिकायत है. वे सभी मुझ जैसे फ़िल्म इंडस्ट्री के बाहर से आए महात्वाकाँक्षी लड़कों के प्रति शंकालू रहते हैं. हमें हमेशा प्रश्नचिन्हों के घेरे में रखते हैं. हमारी सफलता को वे महज संयोग और चमत्कार मानते हैं. हर नई फ़िल्म की रिलीज़ के पहले से उनकी भविष्यवाणियाँ आरंभ हो जाती है कि इस बार देख लेना, वह गिरेगा. नहीं चल सकेगा. अरे....दो फ़िल्में चल गईं तो क्या सारी चलेंगी. अगर वह फ़िल्म भी चल गई या उसमें हमारी तारीफ़ हो गई तो हमारे महत्व को नकारने के लिए किसी और को श्रेय देने लगते हैं. समीक्षक या फ़िल्म पंडित को माँ की तरह होना चाहिए. जो चलना सीख रहे बच्चे के एक कदम भरने पर भी इतराती है. अगर कभी पाँव लड़खड़ाए तो वह संभालती है और फिर पुचकारते हुए हिम्मत बँधाती है. आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है. अगर समीक्षकों और फ़िल्मी पंडितों का रवैया सभी कलाकारों के प्रति एक सा रहता तो तकलीफ़ नहीं होती. कई बार लगता है कि कुछ कलाकारों की सफलता के लिए वो ख़ुद भी लालायित रहते हैं. उनकी लगातार असफ़लता और अयोग्यता को नज़रअंदाज़ कर हर नई फ़िल्म की रिलीज़ के समय घोषणा करते हैं कि इस बार वह निश्चित ही कमाल करेगा. मैंने फिल्म समीक्षकों से कुछ कलाकारों की तारीफ़ में ये भी पढ़ा है कि उनमें थोड़ा सुधार हुआ है. मेरी शिकायत यह है कि कुछ कलाकारों में आए थोड़े सुधार को वे देख लेते हैं लेकिन अन्य परिष्कृत के काम से हमेशा दाग़ खोजने की कोशिश करते हैं. मुझे कई बार लगता है कि फ़िल्म इंडस्ट्री और मीडिया का व्यवहार सभी कलाकारों के प्रति समान नहीं होता. हमें अपनी प्रतिभा और योग्यता आज़माने का एक जैसा अवसर नहीं मिलता और न ही हमारे प्रति कोई सहानुभूति बरती जाती है. हमें हर फ़िल्म के साथ परीक्षा देनी होती है. यह आशंका बनी रहती है कि अगर असफल हुए तो मैदान से ही बाहर कर दिए जाएँगे. इन आशंकाओं, व्यवधानों और नकारात्मक माहौल में बाहर से आए मेरे जैसे कलाकारों का संघर्ष दोहरा और तिहरा हो जाता है. इसके अलावा यह बात भी अजीब लगती है कि हमेशा हमारी कमयाबी की तुलना की जाती है. मैं ऐसे समीक्षकों और पंडितों को स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं यहाँ किसी को हराने नहीं आया हूँ. मेरे लिए अभिनय दंगल नहीं है, जहाँ दूसरे की हार पर ही अपनी जीत मुमकिन है. यह तो ऐसा रणक्षेत्र है, जहाँ एक साथ सभी विजयी हो सकते हैं. आख़िर क्यों कुछ लोग हमारे हारने, असफल होने या लौट जाने के इंतज़ार में रहते हैं. मुझे यह भी लगता है कि हिंदी फिल्मों में हिंदी जाति का स्वर नहीं सुनाई पड़ता. हिंदी प्रदेशों के लोगों की सामूहिक आकाँक्षा हिंदी फ़िल्मों में ही नहीं आ पा रही है. सब कुछ इतना सिंथैटिक, नकली, वायवीय और पश्चिमोन्मुख हो गया है कि हिंदी फ़िल्में हिंदी दर्शकों को संतुष्ट नहीं कर पा रही हैं. मुझे लगता है कि हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री का विकेंद्रीकरण होना चाहिए. समाज और सरकार के सहयोग से हर प्रदेश की राजधानी या किसी अनुकूल शहर में फ़िल्म निर्माण केंद्र की स्थापना होनी चाहिए. इससे स्थानीय प्रतिभाओं को अवसर मिलेगा और हमारा हिंदी सिनेमा अधिक सार्थक, मनोरंजक और विकसित होगा. अंत में एक बार फिर बीबीसी हिंदी को धन्यवाद. उन्होंने मुझे यह मौका दिया कि मैं अपनी कुछ बातें आप सभी के सामने रख सका. फिर मिलेंगे...... (मनोज बाजपेयी का यह कॉलम हमें कुछ समय के लिए स्थगित करना पड़ रहा है. लेकिन आप निराश न हों. मनोज फिर लौटेंगे. अपने कुछ नए अनुभव आपसे बाँटने के लिए...संपादक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम) |
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