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नेता अभिनेता दोनों गड़बड़ हैं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेता और अभिनेता समाज के दो अलग-अलग पहलू हैं. दोनों की अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ हैं. दोनों ही अपने समय के समाज को प्रभावित करते हैं लेकिन साथ ही, वे एक दूसरे से प्रभावित भी होते हैं. पुराने समय से ही शासक, सत्ता, राजनीतिक संगठन और समाज के प्रभुत्वशाली वर्ग अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए कलाकारों का इस्तेमाल करते रहे हैं. कलाकार कभी अपनी इच्छा से, कभी दबाव में तो कभी स्वार्थ के कारण इस्तेमाल होते रहे हैं. फिर भी नेता और अभिनेता की सामाजिक भूमिका में फ़र्क मौजूद रहा है और रहना भी चाहिए. कोई अभिनेता समाज की परेशानियों को समझते हुए एक निश्चित सोच-विचार के साथ सामाजिक कार्य कर सकता है, किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो सकता है और उसके लिए प्रचार भी कर सकता है.
दिलीप साहब ने देश की अल्पसंख्यक जनता की समस्याओं को बहुत अच्छे तरीक़े से सत्ताधारी पार्टी के नेताओं के सामने रखा. आज भी वे गाहे-बगाहे आवाज़ उठाते रहते हैं. सुनील दत्त साहब समाज के प्रति समर्पित कलाकार हैं, सक्रिय राजनीति में आने से पहले वे नरगिस के साथ मोर्चे पर जाकर सैनिकों का मनोरंजन करते रहे हैं. वे अजातशत्रु हैं. फ़िल्म से राजनीति में गए ऐसे अनेक कलाकार हैं जिनकी ईमानदारी और निष्ठा पर विरोधी पार्टियाँ भी संदेह नहीं कर सकतीं. अपनी सेवा से उन्होंने यह सम्मान हासिल किया है. शत्रुघ्न सिन्हा शुरू से ही विपक्ष के प्रचारक रहे, उन्होंने खुलकर भाजपा का समर्थन किया और मंत्री बनने से पहले संतरी की भूमिका निभाते रहे. इसी तरह शबाना आज़मी और राज बब्बर अपनी राजनीतिक सोच और व्यक्तिगत ईमानदारी के साथ ख़ास किस्म की राजनीति से जुड़े हुए हैं. सारा विवाद राजनीति में शामिल होने के फ़िल्मी कलाकारों के भेड़ियाधसान से हुआ है. यह ख़बर फैली कि कुछ कलाकारों ने पैसे लेकर विभिन्न पार्टियों में जाने का फ़ैसला किया. यह स्थिति हास्यास्पद और निराशाजनक है, राजनीतिक सोच रखना और किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ना ग़लत नहीं है. एक लोकतांत्रिक देश में रहने के नाते हम चुनाव के समय किसी एक उम्मीदवार को वोट देकर अपनी राजनीतिक मंशा ज़ाहिर करते हैं. मताधिकार का प्रयोग राजनीतिक समझ के साथ होना चाहिए, समस्या तब आती है जब कलाकार पार्टी पॉलिटिक्स को भी कंज्यूमर प्रोडक्ट के इंडोर्समेंट की श्रेणी में ले आते हैं. मेरे ख़याल में यह ग़लत है, किसी पार्टी का प्रचार करना बहुत ज़िम्मेदारी का काम है. हम कलाकार अपनी छवि का ग़लत इस्तेमाल करके ग़लत राजनीति का प्रचार कर डालते हैं. निश्चित ही, इस भ्रष्ट आचरण के पीछे पैसा, पद और प्रतिष्ठा का स्वार्थ होता है. दोषी राजनीतिक पार्टियाँ भी हैं जो इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देती हैं और कलाकारों को भ्रम देती हैं कि उनका भला होगा. होता क्या है, हम सभी जानते हैं. मेरी राय में बरसों की मेहनत और दर्शकों से मिले प्यार से बनी लोकप्रिय छवि का दुरूपयोग नहीं होना चाहिए. जब कोई नेता किसी फिल्मी कलाकार को नचैया-गवैया कहकर संबोधित करता है तो मुझ जैसे कलाकार के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती है. इतनी मेहनत से हासिल सम्मान को हम एक झटके में खो देते हैं.
साथी कलाकारों से मेरा निवेदन है कि खुद को इतना नीचे न गिराएँ. हाँ, अगर समाज की परेशानियाँ उद्वेलित करती हैं, किसी राजनीतिक पार्टी का घोषणापत्र उचित लगता है या अपने राजनीतिक योगदान के प्रति गंभीर हैं तो अवश्य जाएँ. अभी तो स्थिति ये है कि न तो मुद्दों की जानकारी है और न ही राजनीति का पता है. एक राजनीतिक पार्टी में ताज़ा-ताज़ा शामिल हुई एक कलाकार ने कहा, "अभी नई हूँ, धीरे-धीरे सब जान जाऊँगी." मेरा यही कहना है कि सब जान लेने के बाद पार्टी में शामिल होने में क्या दिक्कत है? ऐसी क्या हड़बड़ी है? आख़िर क्यों चुनाव का बिगुल बजते ही राजनीति में शामिल होने के भेड़ियाधसान में कूद पड़े? कुछ गड़बड़ है और वह नेता और अभिनेता दोनों में है. |
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