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मंगलवार, 09 मार्च, 2004 को 10:53 GMT तक के समाचार
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मेरे पहले शिक्षकः शम्सुल इस्लाम

मनोज वाजपेयी
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाख़िले की तीन कोशिशें..तीनों बार नाक़ामी मिली
मैं एकलव्य नहीं हूँ, लेकिन ये भी सच है कि किसी द्रोणाचार्य की नज़र मुझ पर नहीं पड़ी. मेरी आंतरिक इच्छा थी कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में मुझे दाख़िला मिल जाए, मगर अपनी तीन-तीन कोशिशों में मैं विफल रहा.

इन विफलताओं ने मुझे निराश किया, लेकिन साथ ही आत्मपरीक्षण का मौक़ा भी दिया. मैंने समांतर विकल्प की खोज की. एनएसडी के पाठ्यक्रम को ध्यान में रखते हुए मैंने अभ्यास जारी रखा. मुझे कई ठिकानों की खोज करनी पड़ी. अब लगता है कि उस संघर्ष से फ़ायदा ही हुआ. मैं अधिक मंझा. मेरे व्यक्तित्व का खुरदुरापन ख़त्म हुआ.

मुझे याद है...नाटक करने की इच्छा दोस्तों से ज़ाहिर की तो किसी ने शम्सुल इस्लाम का नाम सुझाया. उसी व्यक्ति ने ये भी बताया कि वह वामपंथी विचारों के हैं और स्ट्रीट थिएटर करते हैं. सच कहूँ तो तब तक मैं राजनीतिक विचारों के भेद से परिचित नहीं था.

शम्सुल इस्लाम से मुलाक़ात हुई. उन्होंने बग़ैर किसी परीक्षा या 'ऑडिशन' के मुझे अपने ग्रुप में शामिल कर लिया. मैं उनके ऑफ़िस आने-जाने लगा और उनकी गतिविधियों में हिस्सा लेने लगा.

पहले गुरू की शिक्षा

 शम्सुल इस्लाम मेरे पहले गुरू हैं. उन्होंने समझाया कि किसी भी अभिनेता के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपने समय की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों को समझे.

मैं कह सकता हूँ कि शम्सुल इस्लाम मेरे पहले गुरू हैं. उन्होंने समझाया कि किसी भी अभिनेता के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपने समय की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों को समझे. इस समझ के बाद ही वह समाज को ठीक से समझ पाएगा. सामाजिक समझ विकसित होने पर ही वह ज़िंदगी के किरदारों के क़रीब पहुँच सकेगा. उन्हें ख़ुद में उतार पाएगा.

इस तरह मेरी शुरूआत एक ऐसे छात्र के रूप में हुई जो अभिनय की बारीकियों के साथ ही समाज को भी रेशा-रेशा समझ सके. मेरे लिए यह बहुत बड़ा सबक़ था. मैं बिहार के एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार से आया था. सदियों की सामाजिक रूढ़ियाँ मेरे संस्कार में थीं.

जात-पात, ज़मींदारी और कुलीनता की शिक्षा मुझे मिली थी. मुझे बताया गया था कि राम के समय में भी धोबी थे, इसलिए आज भी कोई-न-कोई धोबी होना चाहिए. ऊँची और नीची जातियों का होना अस्वाभाविक नहीं है.

 शम्सुल ने देश-विदेश के प्रगतिशील साहित्य से भी मेरा परिचय कराया. मुझे हर तरह की किताबें पढ़ने को मिलीं. मैं रूसी, चीनी और अन्य विदेशी भाषाओं के साहित्य से परिचित हुआ.
शम्सुल की संगत ने मेरे दिमाग़ को बदला. मेरी सोच बदली. मेरे अंतर्विरोध एक-एक कर टूटे और ख़त्म हुए. मैं अपने समय के सामाजिक जकड़न से बाहर आया. शम्सुल ने देश-विदेश के प्रगतिशील साहित्य से भी मेरा परिचय कराया. मुझे हर तरह की किताबें पढ़ने को मिलीं. मैं रूसी, चीनी और अन्य विदेशी भाषाओं के साहित्य से परिचित हुआ.

मेरा नज़रिया बदला. कायाकल्प के इस दौर में ही एक नई विश्वदृष्टि हासिल हुई. सामाजिक विकृतियों के ख़िलाफ़ नाटक करना, आर्थिक असमानताओं के ख़िलाफ़ बातें करना और देश की स्थिति पर राजनीतिक विमर्श करना...यही दिनचर्या बन गई थी.

कॉलेज की नियमित पढ़ाई के लिए बहुत कम वक़्त मिल पाता था, लेकिन मैं संतुष्ट था. मेरा दायरा बढ़ रहा था. मैं विस्तृत हो रहा था.

भाषा पर मेहनत

इसी दौर में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाख़िला लेने की पहली कोशिश में विफल होने पर मैंने महसूस किया कि मेरी हिंदी अच्छी नहीं है. बोलने के लहजे, शब्दों के चुनाव और उच्चारण में अपने इलाक़े का भारी प्रभाव है. किसी अभिनेता के लिए आवश्यक है कि वह सबसे पहले भाषा के इस दोष से मुक्त हो.मैंने हिंदी का अभ्यास आरंभ किया.

 एक विषय के तौर पर मैंने अंग्रेज़ी की पढ़ाई अवश्य की थी, मगर दिल्ली में अंग्रेज़ी समझने, पढ़ने और बोलने में दिक़्क़त होती थी. यह एहसास हो गया था कि अगर बड़े शहर में आगे बढ़ना है तो अंग्रेज़ी से अलग नहीं रह सकता.

मुझे अंग्रेज़ी बिल्कुल नहीं आती थी. एक विषय के तौर पर मैंने अंग्रेज़ी की पढ़ाई अवश्य की थी, मगर दिल्ली में अंग्रेज़ी समझने, पढ़ने और बोलने में दिक़्क़त होती थी. यह एहसास हो गया था कि अगर बड़े शहर में आगे बढ़ना है तो अंग्रेज़ी से अलग नहीं रह सकता. अंग्रेज़ी सीखनी होगी.

अपनी भाषा दुरूस्त करने के क्रम में मैंने समझा कि बिहार से आए अभिनेता अपनी इस कमी को बच्चों की ज़िद की तरह पाल लेते हैं. अपने अहंकार में भाषा के भदेसपन को गुण समझ बैठते हैं.

दिल्ली के आरंभिक वर्ष शम्सुल इस्लाम के साथ स्ट्रीट थिएटर करने के अलावा रामजस कॉलेज और हिंदू कॉलेज के नाटक करने में गुज़रे. ललित पारिमू और देशदीपक मुझे बुलाते थे.

हिंदू कॉलेज का एक नाटक होना था. उसका रिहर्सल चल रहा था. एक दिन मैं मलेरिया से तप रहा था, फिर भी अपना झोला लेकर मैं वहाँ पहुँच गया. सभी ने कहा कि मुझे नहीं आना चाहिए था. वहाँ से निकलते समय मैं कब कमज़ोरी से बेहोश होकर गिर पड़ा और कैसे मुझे देश दीपक लेकर होस्टल तक आए, ये सब किस्सा बताया गया था.

जुनून और मौक़ा

 मुझे लगता है कि हिंदी प्रदेशों में प्रतिभा की कमी नहीं है.प्रतिभाओं को मुरझाने से बचाने के लिए हमें जल्दी-से-जल्दी इस संदर्भ में कुछ करना चाहिए. देश के एकलव्यों को अर्जुन बनने का मौक़ा देना चाहिए.

दरअसल मैं कुछ साबित करने के इरादे से बुख़ार में रिहर्सल करने नहीं गया था. मुझे हर वह पल अच्छा लगता था, जो मैं रंगमंच में गुज़ारता था. मैं पिछड़े इलाक़े से आया था. मुझे बहुत कुछ सीखना था. नाटक करने के उस जुनून ने ही मुझे वहाँ पहुँचा दिया था.

वैसा जुनून कई लोगों में होता है, मगर कभी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाख़िला नहीं मिलने से तो कभी शम्सुल इस्लाम के संपर्क में नहीं आने से बहुत सारे लोग गुमनामी के अंधेरे में भटक जाते हैं.

मुझे लगता है कि हिंदी प्रदेशों में प्रतिभा की कमी नहीं है. कमी है ऐसे संपर्कों और संसाधनों की...जो सही समय पर उन्हें दिशा दें, अवसर दें और खिलने का मौक़ा दें. प्रतिभाओं को मुरझाने से बचाने के लिए हमें जल्दी-से-जल्दी इस संदर्भ में कुछ करना चाहिए. देश के एकलव्यों को अर्जुन बनने का मौक़ा देना चाहिए.

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