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सोमवार, 01 मार्च, 2004 को 13:19 GMT तक के समाचार
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तकलीफ़ों और परेशानियों से मिले संस्कार

बैंडिट क्वीन का पोस्टर
'सत्या' में भीखू म्हात्रे की भूमिका
दिल्ली और मुंबई में एक बड़ा फ़र्क है.

पटना से दिल्ली आ रही ट्रेन शहर में प्रवेश करती है तो दिल्ली राजधानी होने के बावजूद आतंकित नहीं करती.

मुंबई का मेरा अनुभव दीगर है. यहाँ रेलगाड़ी शहर के बीचों बीच से गुज़रती है. मुंबई सेंट्रल के पहले इतनी ऊँची-ऊँची गगनचुंबी इमारतें दिखती हैं कि ट्रेन की खिड़की से उन्हें देखने के लिए सिर झुकाना पड़ता है. यह शहर झुका देता है...दबा देता है.

दिल्ली में प्रवेश करते समय मेरे भीतर जो उत्साह, उमंग और जोश था, वह मुंबई में प्रवेश करते समय बिलकुल नदारद था. यहाँ सिहरन, डर और आशंका थी.

मेरे आगे पीछे 'बैंडिट क्वीन' से जुड़े कई अभिनेता मुंबई आए. उन सभी के संघर्ष, अपमान, परेशानी और दुविधा की कहानियाँ अलग-अलग रहीं. सभी ने उनसे निपटने के अलग-अलग तरीक़े खोजे. हम सब कहीं न कहीं मुंबई शहर और हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के 'रिजेक्शन' से जूझते रहे. इस इंडस्ट्री में हमारा स्वागत नहीं हुआ था. 'बैंडिट क्वीन' इंडस्ट्री के लिहाज से ऐसी फ़िल्म भी नहीं थी कि उससे जुड़े कलाकारों के लिए लालकालीन बिछा दी जाए.

 'बैंडिट क्वीन' और 'सत्या' के बीच के तकलीफ़ों और परेशानियों ने मेरा अहंकार तोड़ा, मेरे मानसिक और बौद्धिक विकार भी ख़त्म हुए और एक नया संस्कार मिला. अब पलटकर देखूं तो उस दौर के प्रति नॉस्टॉल्जिक महसूस करता हूं. गर्दिश के उन अंधेरे दिनों की यादें आज भी जोश देती हैं
मनोज बाजपेयी

मेरे लिए यह दौर किसी बुरे सपने को जीने की तरह रहा. कई बार एहसास हुआ कि मुझे यह शहर छोड़ देना चाहिए. यहाँ कोई इज़्जत नहीं मिल सकती. थिएटर में एक नाम हासिल करने के बाद मैं मुंबई आया था. लोगों से मिली सराहना ने मेरे भीतर अहंकार भी भर दिया था. यह अहंकार यहाँ रोज़ाना टूटा. मैं बाहर और भीतर दोनों तरफ़ से टूट रहा था, छीज रहा था. बाहर इंडस्ट्री के लोगों को यह बताने और समझाने में अपमान के साथ क्षोभ भी होता था कि मैं अच्छा एक्टर हूँ. मैं अपना काम जानता हूँ.

दोहरी परेशानी

दूसरी तरफ़ बाहर से थका हारा घर पहुँचता तो निजी जीवन की समस्याएँ मुंह बाए खड़ी मिलतीं. ग्यारह-बारह सालों तक भूख और नींद की परवाह किए बग़ैर थिएटर को दिए दिनों का हिसाब शरीर माँगने लगा था. कई तरह की बीमारियाँ उभरने लगी थीं. बीमारियों का इलाज तो दवा और परहेज से हो सकता था, हुआ भी, मगर अपने वैवाहिक जीवन को मैं सहेज नहीं पाया. आर्थिक परेशानियाँ भी थीं. समझ में नहीं आ रहा था कि किसे प्राथमिकता दूँ...कैरियर, विवाह या अस्तित्व की रक्षा. एक अभिनेता पूरी तरह बिखर रहा था.

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'शूल' फ़िल्म में मनोज बाजपेयी

भावनात्मक संबल ख़त्म हो गया था, आर्थिक स्थिति बुरी थी और भविष्य की अंधेरी गुफ़ा डरा रही थी. ऐसा लगता था कि ग़लत जगह पर आ गया हूँ. कई बार बोरिया बिस्तर बाँधा, मगर कभी दोस्तों की सलाह पर तो कभी किसी डायरेक्टर के आश्वासन पर रुकता रहा. एक दो बार दिल्ली लौटा भी तो भाई-बहन और दोस्तों ने ज़बरदस्ती ट्रेन में बिठाकर मुंबई रवाना कर दिया.

दुविधा, असमंजस और परेशानी के इसी दौर में 'स्वाभिमान' धारावाहिक मिला. मेरे एक दोस्त हैं अशोक पुरंग. एक दिन वे मुझे फ़िल्म सिटी ले गए. 'स्वाभिमान' के ऑफ़िस में जाकर कहा, ''आप मनोज बाजपेयी हैं. इस धारावाहिक में काम करेंगे.'' फिर उन्होंने मुझे समझाया कि चलो मन का काम नहीं है लेकिन खर्च तो चलेगा. मैंने भी अंतिम विकल्प के रुप में 'स्वाभिमान' को स्वीकार कर लिया. मेरे अभिमान की रक्षा हो गई थी. मैंने उसे प्रशिक्षण के रुप में लिया. मैंने मन बनाया कि मैं कैमरे के आगे ख़ुद को 'एक्सप्लोर' करुँगा.

संभावना और आशा

वहीं महेश भट्ट से मेरी मुलाक़ात हुई. उन्हें मेरा काम पसंद आया था. उन्होंने मेरी तारीफ़ की थी और मेरी तुलना नसीरुद्दीन शाह से कर दी थी. बाहर और भीतर से पहचान और अस्तित्व की तलाश में बिखर रहे अभिनेता को महेश भट्ट की तारीफ़ से हिम्मत मिली. मुंबई में टिकने और रहने की वजह मिल गई. स्वीकृति का सुख भी मिला. हालांकि महेश भट्ट ने मुझे 'तमन्ना' और 'दस्तक' में छोटी भूमिकाएँ दीं, मगर कुछ समय बाद उनके ऑफ़िस से भी भविष्य सँवरने की संभावना कम होती दिखी.

यह दौर 'रिजेक्शन' के दौर से भी अधिक आहत कर रहा था. ख़ुद को निरर्थक महसूस करने लगा था मैं. अकेले में ख़ुद से ही सवाल पूछने लगा था कि क्या मुझे अभिनय आता है...क्या थिएटर से मिली तारीफ़ें झूठीं थीं या मैं किसी ग़लतफ़हमी में तो नहीं जी रहा हूँ. सच कहूँ तो 'सत्या' के पहले मैं मुंबई से तिरस्कृत होकर लौटने की स्थिति में आ चुका था. लौट ही गया होता अगर 'सत्या' न मिली होती...या उससे भी पीछे की बात करुँ तो मैं 'बैंडिट क्वीन' नहीं मिली होती तो मैं किसी थिएटर ग्रुप के रंगमंडल में दिन गुज़ार रहा होता या किसी संगीत नाटक अकादमी में कोई पद लेकर इतरा रहा होता.

'बैंडिट क्वीन' और 'सत्या' के बीच के तकलीफ़ों और परेशानियों ने मेरा अहंकार तोड़ा, मेरे मानसिक और बौद्धिक विकार भी ख़त्म हुए और एक नया संस्कार मिला. अब पलटकर देखूं तो उस दौर के प्रति नॉस्टॉल्जिक महसूस करता हूं. गर्दिश के उन अंधेरे दिनों की यादें आज भी जोश देती हैं. आख़िर ऐसी तकलीफ़ों से ही हम कलाकारों में निखार आता है. हम अधिक निर्मल और 'नॉर्मल' होते हैं और अपना सिर अपने ही कंघों पर टिका रहता है.

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