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मंगलवार, 10 फ़रवरी, 2004 को 08:30 GMT तक के समाचार
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सहज अभिनय की परंपरा और हमारी पीढ़ी

हाल ही में रिलीज़ हुई 'मक़बूल' में इरफ़ान ख़ान की बेहद तारीफ़ हो रही है. उसके पहले विजय राज की फ़िल्म 'रघु रोमियो' को मुंबई के मामी फ़िल्म फ़ेस्टिवल में श्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार मिला.

राजपाल यादव 'मैं माधुरी बनना चाहती हूँ' की केंद्रीय भूमिका में दिखे और सराहे गए.

अपने आसपास और साथ के कलाकारों को मिल रही अच्छी फ़िल्मों और उन फ़िल्मों को मिल रही सराहना को देख-पढ़कर सुखद अहसास होता है.

आज हिंदी फ़िल्मों में हमारी तरह के कलाकार पूरी तरह स्वीकार कर लिए गए हैं तो क्या ये सिर्फ़ मेरी पीढ़ी के कलाकारों के संघर्ष और प्रयास का नतीजा है?

मेरे ख़्याल से नहीं... यह मोतीलाल से आरंभ हुई यथार्थवादी और सहज अभिनय की उस परंपरा का परिणाम है जिसे बलराज साहनी, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी और रघुवीर यादव जैसे कलाकारों ने मज़बूत किया.

मनोज बाजपेयी

मुझे याद है बाबूजी मुझे अपने साथ ले गए थे 'जागते रहो' दिखाने. वह मेरी ज़िद पूरी कर रहे थे.

मुझे सिनेमा के पर्दे पर कुछ भी चलते-फिरते देखने का नशा हो गया था. ऐसा लगता था कि पर्दे पर चल रहा जादू कभी ख़त्म ही नहीं हो.

यह जादू पहली बार टूटा था 'जागते रहो' में. 'जागते रहो' में एक प्रसंग आता है, जब हमारा नायक राजकपूर पानी की तलाश में दर-दर भटक रहा है. उसे प्यास लगी है.

उसे एक चरित्र मिलता है. वह अपने कुर्ते की जेब से एक छोटी सी बोतल निकालकर उससे शराब पीता है और गाना गाता है.

वह मोतीलाल थे. घर आने पर बाबूजी ने मोतीलाल के अभिनय की तारीफ़ में जो शब्द कहे थे उनमें से एक शब्द 'सहजता' हमेशा के लिए याद रह गया.

थोड़ा बड़ा हुआ तो अमिताभ बच्चन के करिश्मे से प्रभावित हुआ. उनमें एक अलग ढंग की सहजता थी.

तनावपूर्ण, रोमांटिक और हँसने-हँसाने के प्रसंगों में उनकी सहजता में एक आकर्षण था. मन में अभिनेता बनने की इच्छा कुलाँचे भरने लगी.

कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. तभी मैंने कोलकाता से निकलने वाली हिंदी पत्रिका 'रविवार' में नसीरुद्दीन शाह का एक इंटरव्यू पढ़ा.

उसमें उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा का ज़िक्र किया था. मुझे लगा कि अभिनेता बनना है तो नसीरुद्दीन शाह की राह ठीक है और उसके लिए नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा जाना होगा.

मैं दिल्ली आ गया. वहाँ प्रवेश तो मिला नहीं मगर दिल्ली ने हिंदी फ़िल्मों की दुनिया से परिचित कराया, जिससे मैं वंचित था.

मनोज बाजपेयी

मैंने नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी सरीखे कलाकारों की फ़िल्में देखीं.

यह तो समझ में आ गया था कि कलाकार बनने के लिए अमिताभ बच्चन के साथ मोतीलाल और नसीरुद्दीन की सहजता होनी चाहिए.

अपने साथियों के साथ मैं बार-बार रंगमंच के कलाकारों की फ़िल्में देखकर लौटता और बार-बार उन सभी के अभिनय की छोटी-छोटी चीज़ों को बारीकी से समझने की कोशिश करता रहा.

दोस्तों के अभिनय की गूढ़ता के अंदर उतरने की कोशिश करता रहा.

अभिनय की सहजता को जल्दी नहीं हासिल कर पाने की अपनी असमर्थता से चिढ़ होती थी.

उन्हीं दिनों एक अभिनेता मिले रघुवीर यादव.

दिल्ली रंगमंच में उनका बड़ा नाम था. सीनियर उनकी तारीफ़ करते थे और जूनियर उनकी तरह एक्टिंग करना चाहते थे.

उनके साथ काम करने का मौक़ा मिला. रघुवीर यादव में वह सब कुछ था जो एक अभिनेता में होना चाहिए- सहजता, दो घंटों तक दर्शकों के मनोरंजन की क्षमता और उन्हीं दो घंटों में चरित्र को समझा देने की शक्ति.

वहाँ तीसरे-चौथे ऐसे अभिनेता थे जिन्हें पकड़ने और आत्मसात करने की लगातार कोशिश करता रहा.

मनोज वाजपेयी

उनकी अभिनय प्रक्रिया को समझने की कोशिश करता रहा. वह प्रक्रिया अभी तक जारी है.

अपने आसपास के अभिनेताओं से सीखता हूँ. मुझे हमेशा लगता है कि वे मुझसे बेहतर अभिनेता हैं.

चाहे वह इरफ़ान ख़ान हों, आदित्य श्रीवास्तव, विजय राज या फिर राजपाल यादव हों.

आज तक यही कोशिश है कि इन सभी अच्छे अभिनेताओं की अच्छी बातें मैं अपना लूँ.

आज हमारी पीढ़ी के अभिनेता सफलता की जो फ़सल काट रहे हैं उसे अथक परिश्रम और धैर्य से मोतीलाल से लेकर रघुवीर यादव सरीखे कलाकारों ने बोया-सींचा और कीड़ों से बचाकर रखा है.

न सिर्फ़ फ़िल्म इंडस्ट्री बल्कि दर्शकों ने भी हम सरीखे अभिनेताओं को स्वीकार कर लिया है. ये नया ट्रेंड है कि सारे अभिनेता चरित्र को समझने की कोशिश कर रहे हैं.

पूरी स्क्रिप्ट माँगते हैं. ये बदलाव अहम है. हम सभी अभिनेताओं के लिए ज़रूरी हो जाता है कि हम यथार्थवादी परंपरा के उन सभी सहज अभिनेताओं को खड़े होकर सलाम करें जिनकी बदौलत आज हम सभी को इज़्ज़त मिलती है, कुर्सी मिलती है, पैसा मिलता है, काम मिलता है...

दर्शकों को भी सलाम कि वे हमारी मेहनत की क़द्र करने लगे हैं. चरित्र को जीने में बहाए पसीने की गंध भी उन तक पहुँचने लगी है.

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