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प्रीति ज़िंटा की क़लम से | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री प्रीति ज़िंटा बीबीसी ऑनलाइन के लिए कॉलम लिख रही हैं. इसी की पहली कड़ी में आने वाले महीने पर उनकी एक नज़र-
अगर आप बॉलीवुड में दिलचस्पी रखते हैं तो कमर कसकर तैयार हो जाइए. क्यों?, क्योंकि वर्ष 2004 भारत में मुख्य धारा की फ़िल्मों के लिए सबसे बड़ा साल साबित हो सकता है. अलग-अलग थीम के साथ हमारे बड़े-बड़े फ़िल्म निर्माता फ़िल्में रिलीज़ कर रहे हैं. इनमें करगिल युद्ध से लेकर प्रेम कहानियों तक सब तरह की फ़िल्में होंगी. अनुभवी यश चोपड़ा से लेकर युवा फ़िल्म निर्माता फ़रहान अख़्तर तक के साथ वर्ष 2004 बॉलीवुड के सर्वश्रेष्ठ और सबसे ज़्यादा प्रतिभाशाली लोगों की फ़िल्में लेकर आएगा. ये काफ़ी रोमाँचक साल होगा क्योंकि हमारे युवा फ़िल्म निर्माता अनुभवी और पुराने निर्माताओं के सामने कई तरह की चुनौतियाँ पेश कर रहे हैं. उनकी कोशिश है बॉलीवुड को एक नया चेहरा दिया जाए. बदलता दौर हमने 1950, 60 और 70 के दशक में कितनी ही अद्भुत फ़िल्में बनाई हैं. याद करिए काग़ज़ के फूल, मदर इंडिया, पाकीज़ा, हाफ़ टिकट या फिर पड़ोसन. उनका जादू लोगों पर आज तक बरक़रार है. कलाकारों ने बेहतरीन अभिनय किया, संगीत की लहरी में लोग डूब गए, हास्य तो अपने आप ही छलकता रहा और फ़िल्माने के ढंग से लेकर प्रौद्योगिकी तक साधारण.
वो था बॉलीवुड का 'स्वर्णिम काल'. इसके बाद आया 80 का दशक जिसमें मार-धाड़ की फ़िल्मों की प्रधानता थी. फ़िल्म में अभिनेत्रियों के मुक़ाबले अभिनेताओं को ज़्यादा महत्त्व दिया गया. वैसे इस दौर में भी कुछ अपवाद वाली फ़िल्में तो रहीं जिनमें उमराव जान, निकाह, आहिस्ता आहिस्ता के नाम लोग अब भी याद करते हैं. ये वो दौर था जब फ़िल्म की अभिनेत्रियाँ या तो सिर्फ़ ग्लैमर का शोपीस बनकर रह गईं या पेड़ों के इर्द-गिर्द नाचने, अपहरण, बलात्कार या मार दिए जाने का सामान बन गईं. ये एक हिट फ़ॉर्मूला था. अभिनेत्री को मिलेगी लोगों की सहानुभूति, अभिनेता को उसका बदला और ख़लनायक का तो बस भगवान ही मालिक है. ये था बॉलीवुड का सबसे ख़राब दौर. एक ऐसा दौर जब सब कुछ और संभव था. एक अभिनेता 50 खलनायकों पर भारी पड़ सकता था, दसवीं मंजिल से नीचे कूद सकता था और काफ़ी चोट लगने के बावजूद माँ या प्रेमिका को बचा सकता था. यानि बिल्कुल पागलपन का दौर. फ़ॉर्मूला फ़िल्में उसके बाद 90 के दशक में भी हम फ़ॉर्मूला फ़िल्में ही बना रहे थे. सोच ये थी कि कुछ बड़े सितारों को रखो, अच्छा संगीत डालो और इसके बाद भगवान से प्रार्थना करो. बस फ़िल्म चल जाएगी. मगर इसमें समस्या एक ही थी कि ऐसा होता नहीं था. इस फ़ॉर्मूले पर चलने का नतीजा ये हुआ कि एक के बाद एक करके कई फ़िल्में बुरी तरह पिट गईं और फ़िल्म उद्योग कंगाली की ओर बढ़ने लगा.
मुझे अब भी याद है कि जब मैं फ़िल्म उद्योग में नई-नई आई थी तो फ़िल्म निर्माता जब मेरे पास आते थे तो कहते थे, "हीरो के साथ आप अकेली ही हिरोइन हैं और आप पर पाँच गाने फ़िल्माए जाएँगे." इसके बाद अभिनेता एक समय पर आठ-दस फ़िल्में साइन कर लेते थे और एक साथ ही सबमें काम करते थे. उस दौरान वे दो शिफ़्टों में काम करते थे और एक शिफ़्ट होती थी आठ घंटे की. नतीजा ये होता था कि एक फ़िल्म बनने में एक से दो साल लग जाते थे. ये सारी फ़िल्में आम लोगों को ध्यान में रखकर बनाई जाती थीं. इसके अलावा चूँकि भारत बहुत पढ़े-लिखे लोगों का देश नहीं है तो उस दौर की फ़िल्में बहुत ही आम तरह की होती थीं. फिर सैटेलाइट टेलीविज़न चैनल आए. एक सरकारी चैनल अब नहीं रह गया. केबल, इंटरनेट और इसी के साथ बदलता लोगों का नज़रिया. इसके बाद लोगों को मनोरंजन के बारे में विकल्प चुनने का मौका मिला. जब उन्हें मौका मिला तब उन्होंने अपने हिसाब से फ़ैसले किए. हर तरफ़ फ़िल्में फ़्लॉप होने लगीं. बड़े-बड़े सितारे भी लोगों को थिएटर की ओर मोड़ने में नाक़ामयाब होने लगे. नई पीढ़ी देश में परिवर्तन की बयार बह रही थी और यही मौका था हमारी नई पीढ़ी के निर्माता-निर्देशकों के लिए मैदान में कूदने का. भारत में तो अब फ़िल्मों का बाज़ार भी बदल चुका है. विदेशों की सीमाएँ भारतीय फ़िल्मों ने पार कर लीं और शहरों में फ़िल्मों ने नई धूम मचा दी. इसका मतलब हुआ कि फ़िल्म निर्माताओं को अब नई तरह की फ़िल्में बनाने की ओर रूख़ करना पड़ा.
वर्ष 2001 में 'दिल चाहता है' आई जिसने ध्वनि के मामले में नई तरह की क्रांति की और डबिंग पुराने ज़माने की चीज़ हो गई. आज मुझे पूरी स्क्रिप्ट मिल जाती है. ये स्क्रिप्ट निर्माताओं या कलाकारों से कहीं बड़ी चीज़ है. बदलते हुए फ़िल्म जगत का हिस्सा होना अच्छा लगता है.अब निर्माता और कलाकार एक समय में एक ही फ़िल्म करना पसंद करते हैं और फ़िल्म तीन से चार महीने में पूरी हो जाती है. हमारे प्रदर्शन में अब एक निरंतरता बनी है. मुझे एक फ़िल्म याद आती है. फ़िल्म का हीरो लड़ाई कर रहा है उसे चेहरे पर चोट लग जाती है और वह गिर जाता है. जब वह उठता है तो उसके बाल कटे हुए दिखते हैं. बस फिर क्या था दर्शक चिल्लाने लगे, "देखो, देखो उसने बाल कटवा लिए हैं." मुझे आज के बॉलीवुड का हिस्सा होने की ख़ुशी है. मुझे नाचना और गाने के शब्दों पर ओंठ चलाना अच्छा लगता है. मुझे सपने के दृश्य पसंद हैं और जो नए-नए तरह के कपड़े पहनते हैं वो भी मुझे बहुत अच्छा लगता है. 'लक्ष्य' का इंतज़ार इस साल मुझे इंतज़ार है मेरी फ़िल्म 'लक्ष्य' का जो साल के बीच में किसी समय रिलीज़ होगी. ये भारत और पाकिस्तान के बीच हुए करगिल युद्ध को दिखाती है. 'लक्ष्य' मुझे बहुत पसंद है क्योंकि ये दिखाती है कि युवाओं के अनुभव क्या होते हैं और युद्ध से वे किस तरह प्रभावित होते हैं. ये सिर्फ़ लोगों के चीखने-चिल्लाने और एक दूसरे को मारने के बारे में ही नहीं है. मुझे लगता है कि सरकारों के मुकाबले लोगों के बीच रिश्ते काफ़ी अच्छे हैं. मेरी भाभी आधी अमरीकी और आधी पाकिस्तानी हैं. हम इन सब सीमाओं पर ध्यान नहीं देते. 'लक्ष्य' फ़िल्म भी नए तरह के बॉलीवुड को दिखाती है. ये फ़िल्म मेरे फ़िल्म जीवन की सबसे मेहनत वाली फ़िल्म साबित हुई है. हम इसकी शूटिंग के लिए 17,800 फुट की ऊँचाई तक गए और ये भी एक तरह का विश्व रिकॉर्ड है. हमने दुनिया में सबसे ऊँची कैमरा क्रेन लगाई. लोगों ने शून्य से 15 डिग्री नीचे तक के तापमान में रहकर काम किया है. मैं इसे लेकर काफ़ी आशावान हूँ क्योंकि इस फ़िल्म ने तो एक तरह से मेरी जान ही ले ली और जो चीज़ आपको मार न पाए वो आपको और मज़बूत ही करती है. |
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