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'क्रिकेट से खाई नहीं पटेगी' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जानेमाने खेल पत्रकार और लेखक रोहित बृजनाथ बीबीसी ऑनलाइन के लिए नियमित रूप से स्तंभ लिखेंगे. प्रस्तुत है पहली कड़ी... अगले महीने भारत को पाकिस्तान का दौरा करने दीजिए. लेकिन एक बात मत भूलिए. दोनों देशों के बीच क्रिकेट सिर्फ़ क्रिकेट नहीं रहता. यह बेहद शर्मनाक है लेकिन हक़ीक़त यही है. हम कभी-कभी दोनों देशों के बीच सिरीज़ की तुलना एशेज से करने का ख़तरा मोल लेते हैं लेकिन ऐसा कभी नहीं होता. भारत और पाकिस्तान के बीच अभी तक 47 टेस्ट हो चुके हैं जिनमें से भारत ने पाँच और पाकिस्तान ने नौ मैच जीते हैं. 33 मैच ड्रॉ हुए हैं. ड्रॉ मैचों के आँकड़े यह बताते हैं कि दोनों देश एक-दूसरे के ख़िलाफ़ कितना संभल कर खेलते हैं और हारना तो बिल्कुल नहीं चाहते. ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के आँकड़ों पर नज़र डालें तो 1948 के बाद दोनों देशों के बीच 150 से भी ज़्यादा टेस्ट हो चुके हैं. एशेज सिरीज़ को लेकर दोनों देशों के ख़िलाड़ियों पर दबाव तो ज़रूर होता है. लेकिन यह सिर्फ़ क्रिकेट होता है यानी बैट और बॉल की टक्कर. लेकिन जब भारत और पाकिस्तान खेलते हैं इसे युद्ध की तरह दर्शाया जाता है और राष्ट्रवाद का डंका भी पीटा जाता है. मानसिक दिवालियापन जीत की चाह के कारण भले की दोनों देशों के खिलाड़ी अपना बेहतरीन प्रदर्शन करते हों लेकिन अक्सर हमारे जैसे लोगों के लिए बुरी यादें जुड़ जाती है.
पहले ही ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि एक टीवी नेटवर्क ने इसे 'एलओसी सिरीज़'का नाम दे दिया है. हालाँकि उनका दावा है कि इसका मतलब लॉयंस ऑफ़ क्रिकेट है न कि लाइन ऑफ कंट्रोल. लेकिन इसे मानसिक दिवालियापन की एक मिसाल माना जा सकता है. हमें लाहौर और कराची में जाकर संघर्ष करने दीजिए लेकिन हमें इस मुद्दे पर भी स्पष्ट होना चाहिए. जो लोग ये सोचते हैं कि खेल से ज़ख़्म भरते हैं वे कुछ ज़्यादा ही अर्थ निकाल रहे होते हैं. उदाहरण के लिए ओलंपिक की शुरुआत हमेशा विश्व शांति पर भाषण के साथ होती है. दोनों कोरियाई देश भले ही साथ-साथ मार्च पास्ट करते हों लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त क्या होती है यह सबको पता होता है. मैं यूँ ही आलोचना नहीं कर रहा. मैं यह मानता हूँ कि खेल की अपनी सीमा होती है. खाई नहीं पटेगी भारत और पाकिस्तान के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि वह एक क्रिकेट मैच से नहीं पाटी जा सकती. हमें यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए जो सालों से राजनेता नहीं कर पाए वे खिलाड़ी कर पाएँगे. खिलाड़ियों की मज़बूती एक कवर ड्राइव में है न कि कूटनीति में. यह कोरी मुर्खता है कि आप क्रिकेट को उससे ज़्यादा अहमियत दें. हम सभी सचिन तेंदुलकर को रावलपिंडी एक्सप्रेस सचिन तेंदुलकर के सामने खड़े देखना चाहते हैं लेकिन इससे आगे की बात सोचना मुर्खता ही है. खिलाड़ी पाकिस्तान के दौरे को लेकर बहुत ज़्यादा रोमांचित नहीं. खिलाड़ियों के परिवारवालों ने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ पर दो बार हुए कातिलाना हमले के बारे में भी पढ़ा है. उन्हें खिलाड़ियों की सुरक्षा को लेकर चिंता है. खिलाड़ी भी सवाल पूछ रहे हैं कि वे कितने सुरक्षित हैं वहाँ का माहौल कैसा है. अपील ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि खिलाड़ियों ने बीसीसीआई प्रमुख जगमोहन डालमिया को पत्र लिखकर सुरक्षा के प्रति चिंता जताई है.
खिलाड़ियों ने पाकिस्तान दौरे से पहले आराम दिए जाने की अपील भी की है. ऐसी भी कहा जा रहा है कि भारतीय टीम को पाकिस्तान में प्रधानमंत्री के स्तर की सुरक्षा दी जाएगी और पाकिस्तान उनकी देखभाल और स्वागत में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगा. लेकिन अगर खिलाड़ी अपने कमरे में ही रहे, सड़कों पर घूम नहीं पाए और होटल से मैदान तक बंदूकों के साये में रहे तो क्या ऐसे माहौल में क्रिकेट खेलने की उम्मीद की जानी चाहिए. वे लोग जो इस दौरे को क्रिकेट से ज़्यादा शांति मिशन की संज्ञा दे रहे हैं, उन्हें भी अपने आप से पूछना चाहिए कि शांति मिशन के राजदूतों का कमरे में बंद रहना कितना अच्छा रहेगा. आम लोग ये मानते हैं कि इतनी समानता वाले इन दो देशों को दुश्मनी ख़त्म करनी चाहिए. वे यह भी चाहते हैं कि कश्मीर में हत्याएँ बंद हों. वे यह भी चाहते हैं कि परमाणु हथियारों की होड़ भी ख़त्म हो. लेकिन क्रिकेट यह सब नहीं कर सकता. अगर हम यह सब याद रखें तो दौरे पर जाने में कोई समस्या नहीं. 1999 में चेन्नई के दर्शकों ने भारत को हराने के बावजूद पाकिस्तानी टीम के सम्मान में खड़े होकर तालियाँ बजाईँ. यह ख़ूबसूरत क्षण था. लेकिन वह सिर्फ़ और सिर्फ़ क्रिकेट था और इसे इसी तरह होना भी चाहिए. |
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