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दिल्ली के दिन और 'बैंडिट क्वीन' का मिलना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पटना से दिल्ली आ रही रेलगाड़ियाँ कई बार सिग्नल न मिलने से तिलक पुल, मिंटो पुल या उनके आगे-पीछे रुक जाती हैं. मेरी रेलगाड़ी भी रुकी थी. खिड़की से झाँककर दिल्ली को देखा था मैंने. देश की राजधानी में आने की घबराहट थी. एक उतावलापन भी था. वह बिंब आज भी मेरी आँखों के सामने है. पुल के नीचे से शहरी लोगों का रेला आ-जा रहा था. थोड़ी देर तक बाहर देखता रहा. खिड़की पर रखे हाथ की मेरी पकड़ मज़बूत होती गई और अंदर से एक आवाज़ आई- इस शहर में मेरा नाम होगा. बस एक ही लक्षित इरादे से दिल्ली आया था. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रवेश लेना था. वहाँ से निकलने पर मुंबई का रुख़ करना था. अब यह लिखने में क़तई शर्म नहीं महसूस हो रही कि मुझे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रवेश नहीं मिला था. उस असफलता ने एक तरफ़ मुझे हताश किया था तो दूसरी तरफ़ मेरे अंदर ज़िद भी भर दी थी. 'एक्ट वन' शायद यह हमारी पीढ़ी की विडंबना है कि हम एक साथ विपरीत भावनाओं से प्रेरित होते हैं. या तो इस पार, या उस पार ...... बीच धार में डूबने-उतराने की स्थिति यों भी सुखद परिणाम नहीं देती. ख़ुद को साबित करने की अतिरिक्त ऊर्जा मुझे थियेटर में गहरे ले गई. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की हद के बाहर कुछ दोस्त बने. उस मेलजोल और सामूहिक सक्रियता से थियेटर मेरी रगों में उतरता चला गया. थियेटर में दायें-बायें देखने की सुध भी नहीं रही. मुंबई जाने और फ़िल्मों में एक्टर बनने का ख़याल दिल के कोने में कहीं सो गया. 'एक्ट वन' के रंगकर्मियों के साथ सारी दुनिया भूलकर रंगमंच में कुछ नया करने के जोश के साथ मैं भी लगा हुआ था. हमारे ग्रुप की अच्छी सराहना होती थी. ऐसा लगने लगा था कि अब थियेटर में ही जीना-मरना है. सोते-जागते सिर्फ़ थियेटर ही थियेटर! अब लगता है कि कई बार हम अपनी सक्रियता, गतिविधियों और मिल रही सराहना से एक छोटी परिधि में क़ैद हो जाते हैं. अपने सृजनात्मक वृत्त के विस्तार का ख़याल भी नहीं आता. ऐसे में कोई अवरोध, कोई प्रेरणा, कोई हस्तक्षेप या कोई नया प्रस्ताव ही पुरानी घेराबंदी को तोड़ता और सृजन के नये आयामों से परिचित कराता है. मेरे साथ तो ऐसा ही हुआ. पहला बड़ा अवसर दिल्ली में आईटीओ के पास मैं एक नाटक की रिहर्सल कर रहा था. रिहर्सल से निकलकर चाय की दुकान की बेंच पर बैठा चाय पी रहा था. तभी देखा तिग्मांसू धूलिया ('हासिल' के निर्देशक) अपने पुराने स्कूटर पर चले आ रहे हैं. वे आये, रुके और उन्होंने साथ में चाय भी पी. उन्होंने बताया कि शेखर कपूर तुमसे मिलना चाहते हैं. मुझे लगा कि वे मज़ाक़ कर रहे हैं. हम दोस्तों के बीच ऐसे मज़ाक़ चलते रहते थे कि स्पीलबर्ग तुम्हें खोज रहे हैं या मणि रत्नम के यहाँ से कॉल आया है. बहरहाल, मैंने हँसकर उनकी बात टाल दी. उन्होंने कहा, 'यह मज़ाक़ नहीं है. ब्रितानी चैनल फ़ोर फूलन देवी पर एक फ़िल्म बना रहा है. शेखर कपूर डायरेक्ट कर रहे हैं. उनका असिस्टेंट और कास्टिंग डायरेक्टर हूँ. शेखर को तुम्हारी तस्वीर पसंद आई है. एक बार मिल लो.' तिग्मांसू धूलिया के उस संदेश ने थियेटर की मेरी आत्ममुग्ध दुनिया में ख़लल डाल दिया था. इस अचानक मिले प्रस्ताव ने एक उत्साह भी पैदा किया था. सुनकर पीयूष मिश्रा और दूसरे साथी बेहद ख़ुश हुए थे. अगले दिन मैं शेखर कपूर से मिलने गया. शेखर की आदत है बहुत धीरे-धीरे बोलने की. आधे शब्द तो वे ख़ुद ही चबा जाते हैं. मैंने बेरी जॉन की संगत में अंग्रेज़ी सीख ली थी. इतनी बात समझ में आ गई कि वे विक्रम मल्लाह की भूमिका के लिए मुझे परख रहे हैं. चलते-चलते उन्होंने यह भी कहा कि अभी आप फ़ाइनल नहीं हैं. मैं एक-दो और नामों पर सोच रहा हूँ. जैसा भी होगा, बताऊँगा. थियेटर में मिल रहे नाम से मेरे अंदर एक अक्खड़पन आ चुका था. उनकी हाँ या न की परवाह किये बग़ैर मैं थियेटर में लगा रहा. मुझे याद है कि शेखर कपूर से हुई पहली मुलाक़ात और दूसरी मुलाक़ात के बीच मैं मुंबई और कोलकाता थियेटर वर्कशॉप और शो के लिए निकला था. मुझे ख़बर लग चुकी थी कि विक्रम मल्लाह की भूमिका के लिए निर्मल पाँडे फ़ाइनल हो चुके हैं. मेरे नाम पर फिर भी विचार चल रहा है, मगर रोल बदल चुका है. मान सिंह की भूमिका के लिए मैं विकल्प के तौर पर रखा गया हूँ.
नसीरुद्दीन शाह ने जब अपनी व्यस्तता के कारण मान सिंह का रोल छोड़ दिया, तो वह मुझे मिला. कुछ दिनों तक असमंजस की स्थिति बनी रही. इस असमंजस ने थियेटर की मेरी एकाग्रता तोड़ी. 'बैंडिट क्वीन' में होने-न-होने की आशा-आशंका ने उद्वेलित किया. ख़ैर, रोल मिला और हम दोस्तों ने कोलकाता में उसका जश्न मनाया. मान सिंह को आत्मसात् करने और उसे पर्दे पर जीवित करने की कथा फिर कभी.... शेखर की सलाह 'बैंडिट क्वीन' के मिलते ही मेरी थियेटर की घेराबंदी टूटी. मुझे शेखर कपूर की राय ने सचेत किया. उन्होंने 'बैंडिट क्वीन' में शामिल थियेटर के कलाकारों को सलाह दी- 'मैं देख रहा हूँ कि आप लोग दस-बारह सालों से थियेटर में लगे हैं. अभी जोश है, इसलिए भविष्य की फ़िक्र नहीं है. भविष्य और सम्पन्नता के प्रति आप सभी में एक लापरवाही है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि यहाँ आपको आपकी क़ाबिलियत की क़ीमत मिल रही है. कहीं आप लोग लक्ष्यहीन रास्ते पर तो नहीं बढ़ रहे ? मेरा कहना है कि इस फ़िल्म के बाद आप लोग मुंबई आ जाएँ. अपने मन का ही काम करें, लेकिन अपनी प्रतिभा के पैसे तो पाएँ.' शेखर कपूर की राय ने मुझे डरा दिया. मुझे लगा कि स्पीड में जा रही मोटर गाड़ी को अचानक एक स्पीडब्रेकर मिला और मैं संभावित दुर्घटना से बच गया. मैं फ़िल्मों में आ गया. मुंबई आ गया. अपनी ज़िद और उम्मीद के साथ. मेरे आगे-पीछे 'बैंडिट क्वीन' से जुड़े थियेटर के कई साथी भी मुंबई आ गये. |
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