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'कलाकार हैं- इश्तहार और कहार बनने से बचें' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
न तो मैं कोई बहादुरी दिखाना चाहता हूँ और न ही कोई आंदोलन खड़ा करना चाहता हूँ. मैंने अपनी असहमति प्रकट की थी और फ़िल्म इंडस्ट्री के लोगों ने मुझे फ़ोन पर शाबाशी दी और मेरे फ़ैसले से अपनी सहमति दिखाई. सभी जानते हैं कि पिछले महीने एक फ़िल्म पुरस्कार में अपने नामांकन के प्रति मैंने विरोध ज़ाहिर किया था. मैं सिर्फ इतना कहना चाहता था कि आपने जिस श्रेणी के लिए मुझे नामांकित किया है, उससे मैं सहमत नहीं हूँ. मेरे निर्माता और निर्देशक भी नहीं सोचते हैं कि मैं उस श्रेणी में हूँ. मुझे किसी से हारने या जीतने में कोई मलाल नहीं होता, अगर मुझे सही श्रेणी में रखा गया होता. मैं पिछले वर्षों में लगभग सभी श्रेणियों में पुरस्कृत हो चुका हूँ. पुरस्कारों के प्रति मैं कभी बहुत अधिक उत्साहित नहीं रहा. पलटकर देखता हूँ तो पाता हूँ कि स्कूल-कॉलेज के दिनों में दौड़, क्रिकेट और दोहा प्रतियोगिताओं में दूसरे-तीसरे नंबर पर रहा. इस तरह पुरस्कार कभी मेरे जीवन में प्रेरक तत्व नहीं रहा. आगे बढ़ने का जोश हमेशा अपने अंदर से मिला मुझे. रही फ़िल्मी पुरस्कारों की बात... तो ये पुरस्कार मुझे किसी की प्रतिभा की पहचान और सम्मान से अधिक फ़िल्म इंडस्ट्री के लोगों के मेलजोल का आयोजन लगते हैं. बहुत ख़ुशगवार और रंगीन होती है वह शाम. हम सभी मिल कर साल भर की मेहनत की सफलता का आनंद उठाते हैं. उत्सव का माहौल रहता है. अगर बहुत पॉज़ीटिव हो कर बात करूँ तो उत्सव की इस शाम में शामिल होना मुझे अच्छा लगता है. हाँ, वहाँ कोई जलन, कुढ़न और स्पर्द्धा न हो तब. श्रेष्ठता की कसौटी? मेरे ख्याल में लोकप्रिय फ़िल्मी पुरस्कार श्रेष्ठता का सबूत नहीं होते. अगर कोई इस साल श्रेष्ठ है तो क्यों वह अगले साल कहीं दिखाई नहीं पड़ता? दरअसल फ़िल्म पुरस्कार समारोह मोटे तौर पर लोकप्रियता से निर्देशित होते हैं. इन समारोहों के आयोजक यह बताने में कोताही नहीं बरतते कि उनके पुरस्कार वास्तव में लोकप्रिय पुरस्कार हैं. ग़ौर करें तो ये पुरस्कार दर्शक पहले ही दे चुके होते हैं. वे अपनी पसंद से फ़िल्मों को हिट या फ़्लॉप साबित कर चुके होते हैं. फिर पुरस्कारों की क्या ज़रूरत है? पिछले कुछ सालों में हिंदी फ़िल्मों के पुरस्कार समारोह श्रेष्ठता की पहचान से ज़्यादा इवेंट हो गए हैं. ऐसे इवेंट, जिन्हें हिंदी फ़िल्मों का दर्शक देखता है और जिनकी मार्केटिंग की जा सकती है. इस छिपे एजेंडा के कारण पुरस्कार समारोह के आयोजकों का सारा ज़ोर और प्रयास स्टारों को जुटाने और उन्हें लाइव परफ़ार्मेंस के लिए तैयार करने में ख़र्च होता है. मैंने तो यह भी सुना है कि पुरस्कारों के फ़ैसले भी इन उद्देश्यों से प्रभावित होने लगे हैं.
ग़ौर करें तो सारे लोकप्रिय फ़िल्म पुरस्कारों की ब्रांडिंग हो चुकी है. उन्हें कोई न कोई कंज्यूमर प्रोडक्ट कपनी प्रस्तुत कर रही है. मैं यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि इन कंपनियों के मालिकान की इच्छाओं और रुचियों पर ध्यान नहीं दिया जाता होगा. जो पैसे लगा रहा है, उसकी अपनी ज़रूरतें होंगी. ये पुरस्कार समारोह उन ज़रूरतों को कैसे पूरी कर रहे हैं और फ़िल्म बिरादरी के हमलोग कैसी उनकी ज़रूरतों के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं? यह पहचानने और समझने की ज़रूरत है. हम कलाकार हैं, इश्तहार और कहार बनने से बचें तो बेहतर होगा. कहीं अनजाने में हम किसी कंज्यूमर प्रोडक्ट के प्रचारक तो नहीं बन गए हैं? हम उनके प्रोडक्ट की डोली तो नहीं ढो रहे हैं? राष्ट्रीय पुरस्कार मुझे लगता है कि राष्ट्रीय पुरस्कारों का महत्व बढ़ना चाहिए. उन्हें विवादों और पक्षपातों से दूर रखते हुए एक ऐसी प्रक्रिया विकसित करनी चाहिए कि अच्छे काम के साथ ही अच्छे उद्देश्यों को भी पहचान मिले. पुरस्कार की प्रक्रिया पारदर्शी और कलात्मक अभिरुचि जारी करे. वह ईमानदार कलाकारों, तकनीशियनों और फ़िल्मकारों के लिए प्रेरक और उत्साहवर्द्धक हो. तभी इन पुरस्कारों के बाद सभी की हैसियत बढ़ेगी. अभी तो पुरस्कार किसी भी रूप में हैसियत नहीं बढ़ाते. न तो पुरस्कृत फ़िल्मों को अधिक दर्शक मिलते हैं और न तकनीशियनों का संघर्ष कम होता है. रहे स्टार तो वे पुरस्कारों से नहीं, बाज़ार में अपनी लोकप्रियता से ऊपर चढ़ते और नीचे उतरते हैं. ऐसे माहौल में पुरस्कारों का क्या औचित्य रह जाता है? |
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