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अक्षम और अधूरा है 'बॉलीवुड' शब्द | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कुछ समय पहले एक समाचार चैनल के स्टूडियो गया था. एक विशेष कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग थी. रिकॉर्डिंग के बाद उस कार्यक्रम की सीनियर रिपोर्टर ने मुझे टोका, "जब भी मैं 'बॉलीवुड' शब्द का प्रयोग करते हुए सवाल पूछ रही थी तो आप जवाब में भारतीय सिनेमा या हिंदी सिनेमा का इस्तेमाल कर रहे थे. ऐसा क्यों?" मैने उन्हें छोटा सा जवाब दिया था, "मुझे इस शब्द से नफ़रत है. मेरे लिए ये गाली के समान है." उससे पहले 'अक्स' की रिलीज़ के समय हम लोग प्रचार के लिए निकले थे. दिल्ली की बात है. एक संवाददाता सम्मेलन में एक पत्रकार बार-बार 'बॉलीवुड' शब्द का इस्तेमाल कर रहा था. मेरे कानों में यह शब्द गर्म शीशे की तरह पिघल रहा था. मुझसे रहा नहीं गया. मैने उस पत्रकार से कहा, "आप इस शब्द का इस्तेमाल न करें." उसने यह कहते हुए मेरे आग्रह को टाल दिया कि 'अब तो यह शब्द डिक्शनरी में भी आ गया है.' मुझे तब ये मालूम नहीं था कि ऐसा कुछ हो चुका है. उसी संवाददाता सम्मेलन में अमिताभ बच्चन ने भी इस शब्द के प्रयोग पर एतराज़ किया था. मगर हम देख रहे हैं कि किसी अंग्रेज़ी पत्रकार का दिमागी फ़ितूर एक कड़वी सच्चाई बनता जा रहा है. अब तो लगभग सभी राष्ट्रीय भाषाओं और बोलियों में यह शब्द घुस चुका है. फिर भी मुझे आपत्ति है. मेरे जैसे कई कलाकार हैं. वे सभी इस शब्द से परहेज़ करते हैं. लगभग एक सदी हो गई, भारतीय सिनेमा का विकास विश्व के किसी भी देश के समानांतर रहा है. आज भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री कई देशों से आगे है. चंद अंग्रेज़ी पत्रकारों ने भारतीय फ़िल्मकारों के अमूल्य योगदान को नज़रअंदाज़ कर कुछ नकली फ़िल्मकारों और उनकी फ़िल्मों का उपहास करने के लिए 'बॉलीवुड' शब्द का इस्तेमाल हॉलीवुड की तर्ज पर किया. उन्हें ख़ुद मालूम नहीं रहा होगा कि वे कितना बड़ा सांस्कृतिक नुकसान कर रहे हैं. वैसे भी देश के अंग्रेजीदां अपनी ही संस्कृतियों और उपलब्धियों को नीची नज़र से देखते हैं और उस पर हंसते हैं.समाज के विभिन्न क्षेत्रों की तरह हिंदी फ़िल्में भी उनके लिए विदेशी नकल पर चल रही कोशिशें हैं. क्या दादा साहिब फालके, वी शांताराम, के आसिफ़, बिमल राय, गुरुदत्त, राज कपूर, महबूब ख़ान, सत्यजीत राय, अदूर गोपालकृष्णन, यश चोपड़ा, हृषीकेष मुखर्जी आदि फ़िल्मकार विदेशी फ़िल्मों की नकल करते रहे हैं? क्या श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी और केतन मेहता की फ़िल्मों के बारे में ऐसा कहा जा सकता है? ग़ौर करें तो हिंदी की श्रेष्ठ और लोकप्रिय फ़िल्में शुद्ध भारतीय परंपरा और समाज की फ़िल्में हैं. उनकी जड़ें देश की मिट्टी में हैं. मेरी स्पष्ट राय है कि देश में मौलिक फ़िल्मकारों की कमी नहीं है. उन्हीं के प्रयासों से फ़िल्म इंडस्ट्री विकसित और विस्तृत हो रही है. इस कारण हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री का पर्याय बॉलीवुड नहीं हो सकता. जिन पत्रकारों और अंग्रेज़ी पत्रिकाओं को लगता है कि हिंदी फ़िल्मों में सिर्फ़ हॉलीवुड की नकल होती है, वे एक बार फिर से हॉलीवुड के सिनेमा का अध्ययन करें. ख़ुद वहाँ का सिनेमा दुनिया के अन्य देशों के सिनेमा से प्रभावित है. आज हॉलीवुड का सिनेमा विश्व की अनेक संस्कृतियों और परंपराओं के योग से ही कुछ कर पा रहा है. मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि हॉलीवुड की फ़िल्मों की फ़ार्मूलेबाज़ी इतनी स्पष्ट और भद्दी होती है कि दस मिनट के बाद ही चरित्रों के विकास और कहानी के अंत का अनुमान किया जा सकता है. निःसंदेह भारतीय सिनेमा विश्व के किसी भी देश के सिनेमा के समकक्ष और आगे है. हिंदी सिनेमा में नए-नए प्रयोग हो रहे हैं. इसे बॉलीवुड कहने का मतलब ख़ुद के प्रति हीन विचार रखना है. सभी भाषाओं के पत्रकारों, फ़िल्म समीक्षकों और अध्येताओं से मेरा आग्रह है कि हिंदी फ़िल्मों के लिए 'बॉलीवुड' शब्द का प्रयोग बंद करें. यह शब्द हिंदी फ़िल्मों के संसार को सीमित और संकीर्ण अर्थ देता है. इस सोच और संकुचन का असर फ़िल्मों और दर्शकों पर भी पड़ता है. वक्त आ गया है कि हम अपनी परंपरा और उपलब्धियों को समझें और गर्व भाव से हिंदी फ़िल्मों की बात करें... बॉलीवुड के संबोधन से ख़ुद को शर्मिंदा न करें. यह शब्द संकीर्ण, नस्लवादी और अंग्रेज़ी अहन्यता का प्रतीक है. हिंदी फ़िल्मों के प्रचार और विस्तार को समेटने में यह शब्द अक्षम और अधूरा है. |
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