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बैरी जॉन की सीख और संगत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अभिनय की बातें करना और और उसे शब्दों में बता पाना बेहद मुश्किल काम है. उससे भी मुश्किल काम है अपने गुरूओं की दी सीख के बारे में कुछ कह पाना...लिख पाना. बैरी जॉन मेरे दूसरे गुरू हैं. उनके दिये मूलमंत्र का में हमेशा पालन करता हूं. अभी तक तो सफल रहा हूं. बात नहीं करो...डोंट टॉक, डू इट...' अभिनय कहने और और बताने की नहीं, करने और दिखाने की प्रक्रिया है. बैरी जॉन की संगत ने मुझे बिल्कुल बदल दिया. उन्होंने मेरे आत्मविश्वास को जगाया और उसे सही दिशा दी. प्रतिभा तो हर व्यक्ति में होती है, परंतु उसका उपयोग तो गुरू ही सिखाता है. मैं कहूंगा कि बैरी ने मुझे सिखाया...वो भी बिना उंगली दिखाए, बिना उंगली पकड़े. उन्होंने बहुत थोड़े समय में रंगमंच की बारीकियां सिखा दीं और दुनिया दिखा दी, जिन्हें समझने और देखने में सालों बीत जाते. सिर्फ अभिनय ही नहीं, रंगमंच के हर पहलू से मेरा नज़दीकी परिचय बैरी जॉन के जरिए हुआ. हर पहलू को जानने-समझने से मेरा अभिनेता और मज़बूत होकर उभरा. वह समाज के हर कोने में मुझे ले गये. उन अनुभवों से मुझे अपनी परेशानियाँ बौने क़द की लगने लगीं. बैरी जॉन की सीख और संगत से मैं सिर्फ एक अभिनेता ही नहीं, एक बेहतर रंगकर्मी, हिंदी और अंग्रेज़ी का अच्छा वक्ता और एक बढ़िया इंसान बना. विशेष शैली बैरी जॉन जैसे शिक्षक के बारे में मैंने न तो सुना है, न पढ़ा है और न मैंने देखा है. वह न तो उंगली पकड़ते हैं, न चलना सिखाते हैं और न आपको डंडे से मारते हैं. उनके बोले शब्द तक मुश्किल से सुनाई पड़ते हैं. वह एक तरीक़ा तय करते हैं, एक सिस्टम और तंत्र बनाते हैं फिर उस तंत्र में आपको डाल देते हैं. जहां आप ही अपने शिक्षक होते हैं और आप ही अपने छात्र होते हैं. बैरी जॉन आपकी इंद्रियों को खोलने में आपके सहायक होते हैं. वह कभी नहीं कहते कि तुमने ग़लत किया या सही किया. ग़लत और सही की परिभाषा भी आप खुद बनाते हैं और फिर खुद ही निर्णय लेते हैं कि आप ग़लत कर रहे हैं या सही कर रहे हैं. उनकी कोशिश रहती है कि बिना ग़लती का एहसास कराए आपके अंदर यह ताक़त विकसित कर दें कि आप स्वयं अपनी गलतियां समझने लगें. ये बैरी जॉन हैं. मैं तो चाहूंगा कि हर अभिनेता को बैरी जॉन जैसे शिक्षक मिलें. बैरी जॉन से मिलना भी एक संयोग रहा. मैं अपनी दिनचर्या के मुताबिक मंडी हाउस के चौराहे पर बैठा चाय पी रहा था. रघुवीर यादव मिलने आये. उनका बड़ा नाम था. बहुत नामी-गिरामी अभिनेता थे. मैंने उन्हें प्रणाम किया. उन्होंने मुझ से कहा कि बैरी जॉन एक थियेटर वर्कशॉप कर रहे हैं. यहीं मॉडर्न स्कूल में...उस वर्कशॉप में वह अपने हिंदी नाटक के लिये ऐक्टर का चुनाव करेंगे.`तुम्हारा नाम सुना है मैंने. मैंने सुना है कि तुम बहुत ही अच्छे लड़के हो. अनुशासन में रहते हो. तुम आओ.' मैं उनके साथ मॉडर्न स्कूल गया. वहां रिहर्सल चल रही थी. कलाकारों से मुलाक़ात वहीं शाहरूख ख़ान, दिव्या सेठ आदि से मुलाकात हुई. एक-दो हफ्ते तक मैं बेचैन रहा. बैरी या तो अंग्रेज़ी बोलते थे या चुप रहते थे. बोलते समय किसी की तरफ नहीं देखते थे. उनके सामने एक डायरी खुली रहती थी. उसमें वह कुछ न कुछ नोट करते रहते थे. सचमुच मुझे लगा कि मैं ग़लत जगह आ गया हूं या फिर ये लोग मुझे नहीं समझ रहे हैं. शायद मैं भी उन्हें नहीं समझ पाऊं. आधे से ज़्यादा लड़के साउथ दिल्ली के थे. अच्छे परिवारों के अमीर लड़के. मेरे जैसे केवल तीन-चार लोग ही थे, जो निम्न मध्यवर्गीय या मध्यवर्गीय बैकग्राउंड के थे. बैरी को एहसास हो गया कि दो संस्कृतियों का मिलाप नहीं हो पा रहा है. वर्कशॉप में वह तनाव बढ़ रहा है. उन्होंने वर्कशॉप को खेल-कूद की तरफ मोड़ दिया. हम लोग फ़ुटबॉल खेलने लगे. आज मैं उस फ़ुटबॉल का मतलब समझ सकता हूं. बाद में हम लोग (मैं,शाहरूख ख़ान,रवींद्र साहू आदि) बड़े अच्छे मित्र हो गए. हमारे बीच का सांस्कृतिक दुराव ख़त्म हो गया. हिंदी नाटक हुआ उस नाटक में मैंने बहुत अच्छा किया. ऑफ़र उस नाटक के अंतिम शो के समय बैरी ने मुझे बुलाकर पूछा,`क्या तुम मेरे साथ काम करोगे? मैं तुम्हें महीने के बारह सौ रूपये दूंगा. मैं तुम्हें ट्रेनिंग दूंगा और तुम मुझे असिस्ट करोगे.'मैंने उन्हें अपने सपनों के बारे में बताया कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाख़िला चाहता हूं. उन्होंने कहा, `मनोज, तुम्हें जिस तरह के प्रशिक्षण की आवश्यकता है, वह मैं खुद दूंगा. मैंने आज तक किसी को प्रशिक्षण नहीं दिया है व्यक्तिगत तौर पर, लेकिन तुम्हारे पूरे काम को देखकर लगता है कि तुम्हें ट्रेनिंग देने में मज़ा आयेगा. तुम्हारे साथ काम करने में आनंद आयेगा. यह लगाव, समर्पण और ऊर्जा नहीं
फिर शुरू हुआ बैरी की संगत का दौर..मैं सुबह सात बजे तक आ जाता था और रात में लौटता था. सोलह-सोलह घंटे, सत्रह-सत्रह घंटे हम लोग काम करते थे. बैरी के साथ बीते वे क्षण मेरे लिये बहुत क़ीमती हैं. उनके साथ एक अरसा गुज़र चुका था. एक दिन हम लोग कहीं से बस में लौट रहे थे. बैरी ने मेरी तरफ ग़ौर से देखा और कहा, "मनोज, मुझे लगता है तुम्हें घर जाना चाहिये. तुम्हारे चेहरे पर कितनी सिकुड़न आ चुकी है. मुझे लगता है तुम काफ़ी थक गए हो- शारीरिक और मानसिक रूप से. मानसिक थकान उतारने का एक ही तरीक़ा है कि तुम अपने गांव जाओ. मैं गांव लौटा और वहां से वापस दिल्ली आया तो एक नई ताज़गी के साथ थिएटर में जुटा. बैरी ने मेरा भत्ता अठारह सौ रूपये कर दिया. मुझे नई ज़िम्मेदारियां सौंपी गईं. बैरी ने ट्रेनिंग के बाद मुझे आज़ाद कर दिया. मुझे आज़ादी थी कि बाहर के काम करूं और ज़रूरत पड़ने पर बैरी की मदद करूं...बैरी ने ही मुझे खिलने और संवरने का मौका दिया. सलाम बैरी, आप जैसे शिक्षक की संगत में मैं धन्य हुआ. |
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