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सोमवार, 29 मार्च, 2004 को 16:49 GMT तक के समाचार
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सीखी महेश भट्ट की निर्भीकता

महेश भट्ट
महेश भट्ट की फ़िल्म तमन्ना में मनोज वाजपेयी ने काम किया था
'मीट मी अर्जेंटली, महेश भट्ट'...अपने पेजर पर आया मेसेज पढ़कर मैंने सोचा कि किसी ने भद्दा मज़ाक किया है.

थोड़ी देर में दूसरा मेसेज आया...'माई नंबर इज़..'. अब संदेह की गुंजाईश नहीं थी. मैंने फ़ोन किया.

उन्होंने कहा,"तुम जहाँ कहीं भी हो वहीं से फ़ौरन फ़िल्मिस्तान आ जाओ. मैं वहाँ शाहरूख़ ख़ान के साथ 'चाहत' की शूटिंग कर रहा हूँ.".

मैं फ़िल्मिस्तान पहुँचा. सहमते और डरते हुए उनके कमरे में गया. वह सोफ़े पर अधलेटे थे. यह उनकी प्रिय मुद्रा है. और भी लोग कमरे में मौजूद थे.

 उन्होंने मुझे गले लगा लिया. एक हताश अभिनेता को सफल निर्देशक महेश भट्ट ने गले लगा लिया. उस पल के एहसास को मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता.

उन्होंने मुझे गले लगा लिया. एक हताश अभिनेता को सफल निर्देशक महेश भट्ट ने गले लगा लिया. उस पल के एहसास को मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता.

मेरी नसें भड़कने लगीं. सोयी हुई मांसपेशियाँ जाग उठीं. अद्भुत ऊर्जा का संचार हुआ. लगा किसी ने छूकर झंकृत कर दिया हो. मेरा पूरा शरीर बजने लगा.

उन्होंने तत्काल मेरी तुलना फ़िल्म इंडस्ट्री के बड़े और अनुभवी कलाकारों से कर दी. महेश भट्ट से हुई उस मुलाक़ात ने मुझे आधार दिया. डोल रहा मेरा आत्मविश्वास फिर से मज़बूत हुआ.

मैं तय कर चुका था कि दिल्ली लौट जाऊंगा. महेश भट्ट से मिली पहचान ने मेरा निर्णय बदल दिया. मैं रूक गया. उन्होंने अपनी फ़िल्मों में छोटी भूमिकाएँ दीं, मगर उनसे बहुत बड़ा और मज़बूत संबल मिला.

दरअसल महेश भट्ट ने मुझे 'स्वाभिमान' के एक एपीसोड में देखा था. अशोक पुरंग की मदद से मुझे स्वाभिमान सीरियल मिला था.

मैंने उसे अध्ययन और प्रयोग की तरह लिया था.कैमरे के सामने अभिनय के प्रयोग करता था.

 उन्होंने बताया कि अभिनय सिर्फ़ ड्रॉइंगरूम या स्टूडियो की गतिविधि नहीं है. इसे लोगों तक पहुँचना चाहिए इसमें मीडिया मदद करता था.

उनमें से ही एक प्रयोग पर महेश भट्ट की नज़र टिक गई थी. उन्होंने उसी मुलाक़ात में मेरे अभिनय की बारीकियों के बारे में विस्तार से बताया.

मुझे लगा कि मुंबई में भी कोई ऐसा व्यक्ति है, जो मेरे अभ्यास को समझ रहा है. उन्होंने मेरी छोटी कोशिशों को भी रेखांकित किया. मैं संपूर्णता के अहसास से घिर गया.

कभी महेश भट्ट की 'सारांश' देखने के बाद कई दिनों तक अनुपम खेर की नक़ल करता रहा था. तभी इस इच्छा ने बीजरूप लिया था कि कभी महेश भट्ट के साथ काम करूंगा. सालों बाद वही इच्छा अंकुरित हो उठी.

महेश भट्ट के साथ मेरे संबंध गुरू और शिष्य से अधिक आध्यात्मिक और भावनात्मक हैं. उन्होंने मुझे मौक़ा दिया और उनके सामने व्यक्ति और अभिनेता मनोज वाजपेयी मुखर होकर सामने आया.

समाज के विभिन्न पहलुओं पर उनसे बहसें होती थीं. मुझे उनके सामने ढोंग करने की ज़रूरत नहीं पड़ी. एक पारदर्शिता है उनमें और वही वे दूसरे से भी चाहते हैं. अभिनय और सिनेमा की गहराईयां और बारीकियां तो मैंने उनसे सीखा ही मैंने उनसे निर्भय होना भी सीखा.

 उन्होंने बताया कि अभिनय सिर्फ़ ड्रॉइंगरूम या स्टूडियो की गतिविधि नहीं है. इसे लोगों तक पहुँचना चाहिए इसमें मीडिया मदद करता था.

मैंने सीखा कि कैसे निर्भीक होकर अपनी बातें रखी जा सकती हैं और मन के संशय और डर को ख़त्म किया जा सकता है. उनसे मैंने मीडिया और अभिनेता के नाज़ुक संबंध के पहलू समझे.

उन्होंने निरंतर बहसों के दौरान ही एक बार कहा थ,"मनोज, अगर सफल होना चाहते हो और अपनी पसंद का काम करना चाहते हो तो उसे लोगों के सामने लेकर आओ. इसके लिए मीडिया की ज़रूरत पड़ेगी. तुम उसका उपयोग करो, मगर इसके लिए भी तैयार रहना कि मीडिया तुम्हारा भी उपयोग करेगी".

मीडिया और अभिनेता के संबंधों की इस परस्पर आवश्यकता को उन्होंने सहजता से समझा दिया. उन्होंने बताया कि अभिनय सिर्फ़ ड्रॉइंगरूम या स्टूडियो की गतिविधि नहीं है. इसे लोगों तक पहुँचना चाहिए इसमें मीडिया मदद करता था.

महेश भट्ट संबंधों में आपको बाँधते नहीं. मुक्त करते हैं. मुझे याद है मेरे पिताजी सख़्त बीमार थे. बहन की शादी थी. मेरी आर्थिक हालत ऐसी नहीं थी कि इन पारिवारिक ज़िम्मेदारियों को निभा सकूं. उन्हें मालूम हुआ तो उन्होंने एक मोटी रकम दी.

 उन्होंने ही मुझे बताया था कि हताशा या डिप्रेशन तो धनी और अमीर लोग अफ़ोर्ड कर सकते हैं.अभिनेता ऐसा नहीं कर सकता. वह निराश या हताश नहीं हो सकता. उसे तो रोज़ काम करना चाहिए.

गाँव से लौट कर आया तो उनकी 'तमन्ना' की शूटिंग में व्यस्त हो गया. एक दिन मेरी एक लंबी स्पीच थी. वह दृश्य एक ही टेक में ओके हो गया तो उन्होंने मुझे बधाई दी और कहा कि मैंने तुम्हें जो पैसे दिए थे वे तुम पर न्योछावर करता हूँ. मुझे नहीं चाहिए वह रकम. तुम्हारे अच्छे अभिनय का रिवार्ड है वह.

मुझे मालूम था कि भट्ट साहब वह पैसे नहीं लेते. मगर उस दिन उन्होंने मुझे सहज ही ऋणमुक्त कर दिया. इस अहसास से स्वतंत्र कर दिया कि मैंने उनसे उधार या ऋण लिया है. यह साधारण व्यक्ति नहीं कर सकता.

इधर उनसे मुलाक़ातें नहीं होतीं, फिर भी मैं अपने जीवन में उनकी उपस्थिति किसी अभिभावक की तरह महसूस करता हूँ. वक़्त-ज़रूरत पड़ने पर मैं कभी भी उनके पास जा सकता हूँ.

उन्होंने ही मुझे बताया था कि हताशा या डिप्रेशन तो धनी और अमीर लोग अफ़ोर्ड कर सकते हैं.अभिनेता ऐसा नहीं कर सकता. वह निराश या हताश नहीं हो सकता. उसे तो रोज़ काम करना चाहिए.

आत्मदया की भावना व्यक्ति को कमज़ोर करती है. ज़रूरत है आगे बढ़ने की, लड़ने की और मिली हुई परिस्थितियों को बस में करने की. थैंक्यू भट्ट साहब. आप नहीं जानते कि आपने बिहार से आए इस अभिनेता को क्या-क्या दिया है.

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