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बुधवार, 25 मई, 2005 को 05:14 GMT तक के समाचार
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‘नैना’ पर विवाद निराधार है: उर्मिला
उर्मिला मातोंडकर
उर्मिला मातोंडकर 'नैना' फ़िल्म को लेकर चर्चा में हैं
उर्मिला मातोंडकर हाल ही में रिलीज़ हुई अपनी फ़िल्म ‘नैना’ को लेकर उठे विवाद को ग़लत और निराधार बताती हैं. अपने को सामाजिक हितों के प्रति ज़िम्मेदार बतानेवाली, उर्मिला भारतीय दर्शकों को समझदार बताते हुए कहती हैं कि लोग कल्पना और सच के फ़र्क को समझते हैं.

उर्मिला मानती है कि आलोचना करनेवालों को विवादों के बजाय उनकी कला का सकारात्मक कामों में इस्तेमाल करना चाहिए.

पिछले दिनों अपनी 'नैना' के प्रचार के लिए दिल्ली आई उर्मिला से पाणिनी आनंद ने बातचीत की.

आपकी फ़िल्म प्रदर्शन के साथ ही विवादों में घिर गई. इस बाबत क्या कहना चाहेंगी.

उर्मिला- मुझे ऐसा लगता है कि फ़िल्म को लेकर जो विवाद खड़ा किया गया है उसका कोई आधार नहीं है. उन्हें लगता है कि फ़िल्म में लड़की की आँख सूर्यग्रहण की वजह से ख़राब हुई जबकि फ़िल्म में ऐसा कुछ नहीं दिखाया गया है.

मैंने हमेशा एक सामाजिक बोध के साथ काम किया है और इसलिए ऐसा कोई काम मैं नहीं करती हूँ जो समाज और उसके हितों के ख़िलाफ़ हो.

विवाद उठानेवालों को इसके बजाय मेरे जैसे कलाकारों को सकारात्मक बातों के प्रचार-प्रसार के लिए इस्तेमाल करना चाहिए.

फ़िल्म के बारे में उठा विवाद केवल एक ग़लतफ़हमी है.

फ़िल्म में आँख लगवाने के बाद लड़की को भूत दिखाई देने लगते हैं. लोगों का कहना है कि इस फ़िल्म को देखने के बाद किसी दूसरे व्यक्ति की आँख लगवाने वालों में कई तरह के वहम पैदा हो सकते हैं.

उर्मिला- यह तो बेवकूफ़ी भरी बात है. ‘मैगी नूडल्स’ के विज्ञापन में पिता बच्चों से कहता है कि माँ रोटी-सब्ज़ी जैसा ‘बोरिंग खाना’ बनाती है, इसका यह मतलब तो नहीं कि सारे माँ-बाप यह कहें कि इससे ग़लत असर पड़ रहा है.

क्या ‘भूत’ फ़िल्म को देखने के बाद से लोगों ने मकान ख़रीदने बंद कर दिए हैं. इससे लोगों में रोमाँच पैदा होता है और लोग उसे पसंद करते हैं.

हमारे देश में लोग अठारह वर्ष की उम्र में वोट दे सकते हैं तो क्या लोगों को इतनी भी समझ नहीं है कि क्या काल्पनिक है और क्या हक़ीकत.

लोग आपको ‘हॉरर क्वीन’ के रूप में जानने है, क्या कहना चाहेंगी इस बारे में.

उर्मिला- ऐसा कुछ भी कहना ग़लत है. मुझे ऐसा लगता है कि मैंने जो भी किया है, उसकी मुझे बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली है.

मेरी फ़िल्म ‘पिंजर’ भारतीय फ़िल्म समारोह में प्रीमियर वाली पहली फ़िल्म थी. उस समय भी लोगों ने मुझे ‘ड्रामा क्वीन’ कहा था. उससे पहले मुझे ‘सेक्सी गर्ल’ कहा गया. ये सारे नामकरण लोगों के दिमाग की उपज है.

कलाकार के नाते हम वो सब करते हैं जिसकी हमारे अंदर क्षमताएँ होती हैं और मुझे ख़ुशी है कि मैंने अपनी कला को इस मुकाम तक पहुँचाया है.

पर ‘पिंजर’ जैसी फ़िल्म के बाद इस तरह की विवादों में घिरी फ़िल्म करना कितना उचित है.

उर्मिला- मुझे ऐसा नहीं लगता. मैं पहली महिला कलाकार हूँ जिसने पाकिस्तान जाकर वहाँ पत्रकार वार्ता की थी. शांति प्रक्रिया पर बात कर चुकी हूँ. एड्स के बारे में जागरूकता के अभियान से जुड़ी रह चुकी हूँ. मैं और विवेक, तम्बाकू के ख़िलाफ़ अभियान से भी जुड़े रहे हैं.

इस देश में, जहाँ ज़्यादातर फ़िल्म अभिनेता इन सवालों के बारे में सोचते ही नहीं हैं, मैं इतना सबकुछ कर रही हूँ. ऐसे में मुझे लगता है कि यह सवाल उठाना ही ग़लत है.

पर क्या भारतीय हॉरर फ़िल्मों का स्तर हॉलीवुड की तुलना में काफ़ी पिछड़ा और अपरिपक्व नहीं लगता.

उर्मिला- मुझे लगता है कि यह सवाल वही लोग कर सकते हैं जिन्होंने नैना नहीं देखी है.

इस फ़िल्म को देखने के बाद लोगों को लगेगा कि भारत में भी एक मज़बूत और अच्छी पटकथा वाली हॉरर फ़िल्म बनाई जा सकती है और दर्शक इसे ख़ासा पसंद भी कर रहे हैं.

क्या ख़ास है इस फ़िल्म में.

उर्मिला- इस फ़िल्म को बनाने में इस्तेमाल तकनीकी, फ़िल्म का निर्देशन, इसकी पटकथा और इन सबके साथ, अगर बड़ी बात न करूँ तो मेरा अभिनय है.

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