|
कठिन भूमिका का इंतज़ार: राजपाल यादव | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राजपाल यादव ने हिंदी फिल्मों में कॉमेडी को एक नया रंग दिया है. उन्होंने दिखा दिया है कि बिना फूहड़ हुए भी लोगों को हँसाया जा सकता है लेकिन अब एक संपूर्ण अभिनेता के तौर पर उनकी पहचान बन रही है. उनके लिए ख़ास रोल लिखे जा रहे हैं और ख़ास उनके लिए फिल्में बनाई जा रहीं है. हाल ही में आई एक संवेदनशील फिल्म ‘मैं मेरी पत्नी और वो’ इसका उदाहरण है. राजपाल ने साबित कर दिया है कि प्रतिभा और लगन हो तो मायानगरी में सफल होने में न क़द आड़े आता है न रूपरंग और न ही पृष्ठभूमि. राजपाल यादव ने मुंबई में अरुण अस्थाना को अपनी पूरी कहानी सुनाई. बातचीत के कुछ अंश – गाँव से मुंबई उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर ज़िले में पुवांया के पास मेरा गाँव है कुंडरा. नवीं कक्षा में पढ़ता था तभी से नाटकों में भाग लेना शुरु कर दिया था. फिर शाहजहाँपुर आया और पढ़ाई के साथ-साथ पाँच साल नाटक किए. तय कर लिया था कि अभिनय ही करना है. ग्रेजुएशन करते ही अभिनय और नाटक की बारीकियाँ सीखने लखनऊ की भारतेंदु नाटक अकादमी में दाख़िला लिया. वहाँ पता चला कि अभिनय के लिए इतना कुछ सीखना पड़ता है. लखनऊ के बाद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाखिला लिया. वहाँ से निकलने पर ये विश्वास आ गया था कि मैं अभिनय से कभी डरूंगा नहीं. इसी विश्वास के साथ मैं 1997 में मुंबई आ गया. मुंबई का संघर्ष मैं पूरी तैयारी के साथ मुंबई पहुँचा था. अपने या अपनी अभिनय क्षमता के बारे में मुझे कोई मुग़ालता नहीं था. आख़िर सालों तक थियेटर किया था और दो-दो बड़े नाट्य विद्यालयों में रच बसकर पढ़ाई की थी, सीखा था. दयाल निहलानी ने पहला रोल दिया ‘स्वराज’ सीरियल में. फिर प्रकाश झा ने ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ के सीक्वेल ‘मुंगेरी के भाई नौरंगीलाल’ सीरियल में टाइटल रोल दिया.
फिर मिली पहली फिल्म ‘शूल’. छोटा सा रोल था पर उसने रामगोपाल वर्मा को काफ़ी प्रभावित किया. उन्होंने ‘मस्त’ दी फिर ‘जंगल’. ‘जंगल’ के रोल के लिए अवार्ड मिले, दो-दो. बस उसके बाद तो अब तक 45 फिल्में कर चुका हूँ. हीरो बनने आया था और बना भी हम हाँगकाँग में ‘कंपनी’ की शूटिंग कर रहे थे. अचानक रामू ने कहा – राजपाल ‘जंगल’ में तुमने इतना अच्छा काम किया अब ऐसा नहीं लगता, इस फिल्म में काफी छोटा रोल कर रहे हो. मैंने कहा – छोटा या बड़ा मेरे लिए मायने नहीं रखता, रोल कैसा है ये ज़्यादा महत्वपूर्ण है. फिर मैं कनाडा चला गया. लौटा तो रामू ने बताया कि ‘मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं’ का हीरो मैं ही हूँ और अब यूटीवी की ये फ़िल्म देखिए – ‘मैं मेरी पत्नी और वो’. निराशा कब हुई देखिए, मैं सकारत्मक सोच वाला इंसान हूँ. मेरे लिए गिलास हमेशा आधा भरा रहता है. मैं उसमें अपनी क्रियेटिविटी के कंकड़ पत्थर डालता रहता हूँ. कभी तो पानी ऊपर आएगा. जो मिलता जाता है उसे सहर्ष स्वीकार करता जाता हूँ, साथ-साथ और बेहतर करने की कोशिश में हर रोज़ लगा रहता हूँ. वर्तमान में जीने में मुझे विश्वास है. लखनऊ में था तो वहाँ जो कर रहा था उसी के बारे में सोचता था कि इसी काम को और अच्छे तरीके से कैसे किया जाए. दिल्ली पहुँचा तो भी वहीं सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करता रहा. अब मुंबई में हूँ तो हर वक़्त सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करता हूँ. रोज़ इम्तिहान देता हूँ. ज़ीरो या सौ नंबर में ही विश्वास करता हूँ. इसके बीच में कुछ नहीं होता. सौ है तो अच्छा, ज़ीरो मिले तो मान लेता हूँ कि ग़लती की और आगे इसे दोहराना नहीं है. सबसे कठिन रोल चैलेंजिंग रोल तो ख़ूब मिले पर सबसे कठिन अब तक नहीं मिला. हाँ, सबसे संतोषप्रद फिल्म है – ‘मैं मेरी पत्नी और वो’.
हँसाते कैसे हैं लोगों को? मैंने कभी नहीं सोचा कि किसी को हँसाना या रुलाना है. ट्रैजेडी या कॉमेडी तो समय, काल, वातावरण से बनते हैं. मैंने कैरेक्टर रोल किए हैं. बिल्कुल ख़ाली होकर निर्देशक की सुनता हूँ. फिर देखता हूँ कि मेरे कैरेक्टर की उम्र, सामाजिक स्तर, दिमाग़ी स्तर, मान्यताएँ वगैरा क्या हैं. फिर अपनी समझ से निर्देशक के कहे को अमली जामा पहना देता हूँ. आज की फिल्में देखिए, आज हमारे दर्शकों की जागरूकता स्तर बढ़ गया है, वो प्रबुद्ध हो रहा है. चमत्कारों पर अब लोग जल्दी यक़ीन नहीं करते. पचास मंज़िल से हीरो कूदता है तो सीतामढ़ी का दर्शक भी सोचता है कि लोकल हाँक दी. इंडस्ट्री भी उसी हिसाब से बढ़ रही है. अब हम प्रयोग कर सकते हैं. वास्तविकता के आसपास रहना ज़रूरी होता जा रहा है. ऐसी फिल्में बनाने की कोशिश बढ़ रही है जिन पर हम परिवार के साथ खाना खाते वक़्त बात करने से हिचकें नहीं. 'मैं मेरी पत्नी और वो' और वास्तविक जीवन ये ठीक है कि मेरी क़द काठी फ़िल्म के हीरो मिथिलेश शुक्ला से मिलती है. ये भी सच है कि वास्तविक जीवन में मेरी पत्नी मुझसे क़द में लंबी है लेकिन ये फ़िल्म मेरे जीवन की वास्तविकता से कोई संबंध नहीं रखती. हालाँकि इस फ़िल्म का आइडिया मैंने ही निर्देशक चंदन अरोड़ा को दिया था. हम ऐसे ही बातें शेयर करते रहते हैं. हमारी केमिस्ट्री बहुत अच्छी है. ये एक ऐसे आम इंसान की कहानी है जो अपनी ख़ुशक़िस्मती को अपनी शारीरिक संरचना के कारण बदक़िस्मती समझ लेता है. |
इससे जुड़ी ख़बरें अर्थपूर्ण फ़िल्मों का कठिन अर्थशास्त्र30 सितंबर, 2005 | मनोरंजन अब भारतीय 'कारमेन' बना रहे हैं बेनेगल22 सितंबर, 2005 | मनोरंजन 'क्योंकि सोनिया ने चुनौतियाँ झेली हैं' 06 सितंबर, 2005 | मनोरंजन साहित्य और इतिहास की ओर बॉलीवुड19 जुलाई, 2005 | मनोरंजन शक्ति कपूर का 'सेक्स और स्कैंडल' 05 जुलाई, 2005 | मनोरंजन गरम है भोजपुरी फ़िल्मों का बाज़ार11 जून, 2005 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||