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'क्योंकि सोनिया ने चुनौतियाँ झेली हैं' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कमला और बवंडर जैसी चर्चित फिल्में बना चुके फिल्मकार जगमोहन मूंदड़ा अब कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी पर फिल्म बना रहे हैं. फिल्म का नाम है – ‘सोनिया’. हॉलीवुड, बॉलीवुड और ब्रिटिश फिल्म जगत में बराबर सक्रिय जगमोहन मूंदड़ा से मुंबई में बातचीत की अरुण अस्थाना ने. सोनिया गांधी पर फिल्म बनाने का ख्याल कैसे आया. मेरी फिल्म राशिद क़िदवई की सोनियाजी पर किताब पर आधारित है. मैने पाया कि सोनिया की जिंदगी विडंबनाओं से भरी है. भाग्य ने उन्हें हमेशा उधर धकेला जिधर वह नहीं जाना चाहती थीं. वह एक आम औरत की जिंदगी जीना चाहती थीं. लेकिन जब भाग्य की चुनौतियां सामने आईं तो उन्होने डटकर मुकाबला किया. वह जब चाहती वापस भी जा सकती थीं- इटली, पर नहीं गईं. मैं तो कहूंगा और मेरी फिल्म की लाइन भी होगी कि – वह एक आदमी के प्यार में भारत आयीं और एक देश के प्यार की खातिर यहां रह गयीं. तो इस फिल्म को जीवनी या राजनीतिक फिल्म क्यों न कहा जाए? नहीं ये असल में सोनिया की प्रेम कहानी ज़्यादा है. वह और राजीव गांधी कैसे पल बिताना पसंद करते थे. कैसे वे स्कूटर पर बैठ कर दिल्ली की सड़कों पर घूमते थे, आइसक्रीम खाते थे. इंदिरा गांधी, मेनका गांधी के साथ उनके रिश्ते. और इस कहानी का काल 1964 से 2004 होगा. यानी उनके कैम्ब्रिज पहुचने से लेकर प्रधानमंत्री पद ठुकराने तक. अब चूंकि राजनीति उनके इर्द गिर्द रही और फिर वह ख़ुद राजनीति में आईं तो राजनीति को बिल्कुल नकारा तो नहीं जा सकता, लेकिन सोनिया की राजनीति का ज़िक्र ‘सोनिया’ में बस उतना होगा जितना कहानी को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी होगा. मसलन.... मसलन जीवन के अहम मोड़ जो राजनीति की तरफ उन्हें मोड़ते हैं. एक जीवित व्यक्ति पर आप फिल्म बना रहे हैं तो इसमें कल्पना का सहारा तो नहीं ले सकते. लेकिन आपकी फिल्म निजी जीवन पर है तो क्या सोनिया गांधी से बातचीत हुई है आपकी? देखिए हम जो कुछ भी दिखाने जा रहे हैं वह सच है और कागज़ों पर, किताबों में दर्ज है. केवल राशिद (क़िदवई) की किताब ही नहीं, हमने राजीव गांधी की किताब, राजीव पर सोनिया गांधी के संस्मरणों के संकलन, उन पर खुशवंतसिंह और पुपुल जयकर का लेखन और कैथरीन फ्रैंक की भारत पर लिखी किताबों से तथ्य जुटाए हैं. इस फिल्म के साथ आपकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा या राजनीतिक झुकाव तो नहीं जुड़े हैं? नहीं नहीं, इनमें से कुछ नहीं. तो सोनिया गांधी का चरित्र निभाने का मौका किसको दे रहे हैं आप? मेरे सामने फिलहाल तो एक ही नाम है – मोनिका बेलुची. ‘मेट्रिक्स’ जैसी बड़ी फिल्में कर चुकी मोनिका इतालवी हैं, अच्छी कलाकार हैं और सोनिया से चेहरा मोहरा भी मिलता जुलता है. उनसे बातचीत जारी है. ऐसी फिल्म की मार्केट क्या है? देखिए, एक तो ये फिल्म अंग्रेज़ी में होगी, दूसरे ये एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म है न कि भारतीय. तो बाज़ार तो बड़ा है ही फिर सोनिया गांधी को लेकर दुनिया भर में जिज्ञासा भी काफी है. कब तक शुरु होगी ‘सोनिया’?
काम तो वैसे अब भी जारी है क्योंकि मेरी फिल्म ‘प्रोवोक्ड’ पूरी हो गयी है. अभी बस एआर रहमान के साथ इसके बैकग्राउंड म्यूज़िक पर काम कर रहा हूं. नवंबर में ‘प्रोवोक्ड’ रिलीज़ होगी और उसके फौरन बाद ‘सोनिया’ का काम तेज़ हो जाएगा. ‘प्रोवोक्ड’ भी तो एक औरत के संघर्ष की कहानी है ना, आपकी बवंडर की तरह? हां. ‘प्रोवोक्ड’ ब्रिटेन की एक महिला किरनजीत अहलूवालिया की कहानी है. उसे 2001 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री शेरी ब्लेयर ने ‘एशियन वूमैन ऑफ सब्सटेंस’ का सम्मान दिया था. किरनजीत ने कई साल तक पति के अत्याचार झेलते रहने के बाद तंग आकर पति को जला दिया था. उसे आजीवन कारावास की सज़ा मिली. लेकिन जेल में बंद औरतों ने उसकी मदद की, मामला अपील कोर्ट में गया और वहां से न सिर्फ उसको बरी किया गया बल्कि इस केस की वजह से ही कानून में बदलाव भी करना पड़ा. ‘प्रोवोक्ड’ में आपने ऐश्वर्या रॉय को मुख्य किरदार में लिया है. कैसा अनुभव रहा? उसका डायरेक्टर हूं सिर्फ इसलिए तारीफ़ नहीं करूंगा. सचमुच ऐश्वर्या से आप कैसा भी किरदार करा सकते है. लेकिन दिक़्क़त ये रही है कि ऐश्वर्या की ख़ूबसूरती से आगे न तो कोई देखता है न कोई काम लेता है. |
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