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'कई महिला निर्देशक हैं मुख्य धारा में' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अभिनेत्री और निर्देशक अपर्णा सेन पिछले तीन दशकों से देश-विदेश के फ़िल्म महोत्सवों के निर्णायक मंडल में शामिल होती रही हैं. इसी क्रम में वो पिछले दिनों लोकार्नो फ़िल्म महोत्सव की ज्यूरी में शामिल हुईं. वहाँ उन्होंने बीबीसी हिंदी सेवा से ख़ास बातचीत की. प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश- अपर्णा जी, पिछले तीस वर्षों से आप फ़िल्म समारोहों के निर्णायक मंडल में शामिल होती रही हैं. अपने इस लंबे अनुभव के आधार पर बताएँ कि भारतीय सिनेमा विश्व स्तर पर किस स्थिति में है? भारतीय सिनेमा आजकल बहुत आगे बढ़ गया है. लोकार्नो की ही बात करें तो यहाँ तीन साल पहले ‘इंडियन समर’ नामक एक पैकेज आया था जिसमें बहुत सारी भारतीय फ़िल्में थीं. बहुत रूचि है भारतीय सिनेमा में आजकल. लेकिन पिछले पाँच-सात वर्षों से विश्व स्तर पर ईरानी फ़िल्मों को लेकर कुछ ज़्यादा ही जागरूकता देखने को मिल रही है. क्या कहेंगी इस बारे में? इसका भी एक कारण है. बहुत ज़्यादा और कड़ा सेंसरशिप है ईरान में. इसके बावजूद ये लोग बड़े ही अभिनव तरीक़े से फ़िल्में बनाते हैं. सेंसर को बाइपास करके फ़िल्म बनाते हैं. बहुत ख़ूबियाँ हैं ईरानी फ़िल्मों में. ऐसे बनाते हैं कि फ़ीचर-फ़िल्म में भी डॉक्यूमेंटरी का एहसास होता है. और ये सबको बहुत अपील करती है. मुझे भी अपील करती हैं ईरानी फ़िल्में. लगता है जैसे में सच्चाई देख रही हूँ. जबकि भारतीय फ़िल्मों में बहुत चीज़ें 'अरैंज्ड' दिखती हैं, सजाया हुआ लगता है. लेकिन स्थिति बदल रही है और आपको अच्छी भारतीय फ़िल्में भी देखने को मिल रही हैं. भारतीय सिनेमा में महिला निर्देशकों की कमी के पीछे आप क्या कारण मानती हैं? देखिए, अधिकांश महिला निर्देशक महिला केंद्रित फ़िल्में बनाती हैं. और आजकल फ़िल्में पुरुष स्टार के नाम पर बिकती हैं. जो बड़े पुरुष स्टार हैं, भला वो कोई ‘सेकेंडरी रोल’ क्यों निभाएँगे. इसलिए कोई महिला निर्देशक पुरुष केंद्रित फ़िल्म नहीं बनाती है तो उनके लिए फ़ंडिंग मिलना मुश्किल है. फिर भी आजकल कई महिला निर्देशक सामने आई हैं मुख्य धारा की फ़िल्में बनाने के लिए- रेवती हैं, तनूजा चंद्रा हैं. अपनी अगली फ़िल्म ‘15 पार्क एवेन्यू’ के बारे में कुछ बताएँ? कहानी दो बहनों के बारे में हैं. उनमें एक स्कित्सोफ़्रेनिक(मनोरोगी) है, जो भूमिका कोंकणा निभा रही हैं.
उसकी उम्र में बहुत बड़ी सौतेली बहन है जो उसकी देखभाल करती है. ये भूमिका शबाना आज़मी कर रही हैं. स्कित्सोफ़्रेनिक लड़की मीठी एक पता ढूँढती रहती है जो कि सच में है ही नहीं. ये खोज या अनुसंधान हम सभी के लिए एक प्रतीक बन जाता है क्योंकि हम सब ऐसी चीज़ें ढूँढते हैं जो कि नहीं मिल सकतीं. मैं बात करूँ अभिनय के क्षेत्र में अपनी पहचान बना चुकी आपकी बेटी कोंकणा के बारे में, तो एक निर्देशक के रूप में अपनी बेटी को निर्देशित करते हुए आपको कोई परेशानी होती है? आपके मन में किसी तरह का द्वंद्व होता है? देखिए, मैंने कोंकणा को सेलेक्ट किया अपनी फ़िल्मों के लिए तो एक निर्देशक के हिसाब से ही. वरना मेरी एक बड़ी बेटी भी तो है. मैंने कभी उनको तो नहीं कहा काम करने के लिए क्योंकि उनका एकेडेमिक जीवन है, उनकी रूचि भी नहीं है अभिनय में. कोंकणा जब बच्ची थी मैंने 'पिकनिक' नाम की फ़िल्म बनाई थी. तभी से मैं देख रही हूँ कि कोंकणा का बढ़िया स्क्रीन-प्रेज़ेंस है. जब मैं 'इंदिरा' नामक फ़िल्म कर रही थी, उसमें एक लड़के का रोल था. बच्चा नहीं था और शूटिंग जारी थी. ऐसे में मुझे कहा गया कि बाल कटा के कोंकणा से वो रोल करा लूँ. निर्देशक के भी कहने पर मैंने कहा कि चलो कोशिश करते हैं. उस समय कोंकणा साढ़े तीन-चार साल की थी. मुझे नहीं लगा था कि वो कुछ कर पाएगी क्योंकि वो बहुत शर्मीली बच्ची थी. लेकिन जब वह कैमरे के सामने आई...उसने जब जैसा कहा गया, वैसा सब कर दिखाया. लेकिन ऐसा नहीं होता है कि सेट पर कई बार आपके निर्देश की वो अनदेखी करती हैं कि अरे माँ ही तो कह रही है, और अपनी मर्ज़ी से काम करती हों? नहीं, ऐसा नहीं होता. हर निर्देशक का ये भी काम है कि बेटी हो या कोई और, वह कलाकार विशेष के स्वभाव और मानसिकता को देखते हुए निर्देश दे. मसलन कोंकणा और राहुल बोस को मैं अलग-अलग तरह से निर्देशित करूँगी. राहुल किसी भूमिका के लिए पूरी तैयारी करना चाहते हैं, जबकि कोंकणा ऐसा करने के लिए आसानी से तैयार नहीं होती. |
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