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सोमवार, 08 अगस्त, 2005 को 01:40 GMT तक के समाचार
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'हर आठ महीने में मेरी नई फ़िल्म आएगी'

आमिर ख़ान
अपनी नई फ़िल्म से बहुत उम्मीदें हैं आमिर को
फ़िल्म अभिनेता आमिर ख़ान ने कहा है कि व्यक्तिगत ज़िंदगी में परेशानियों के कारण उनकी नई फ़िल्म के आने में चार साल लगे. उन्होंने कहा है कि अब हर आठ महीने में उनकी नई फ़िल्में आया करेंगी.

लोकार्नो में आमिर ने बीबीसी हिंदी सेवा से विशेष बातचीत की. प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश-

आमिर आप इससे पहले ‘लगान’ लेकर लोकार्नो आए थे और यहीं उसका पहला प्रदर्शन हुआ था. इस बार आप ‘द राइज़िंग’ के साथ लोकार्नो में हैं. किन उम्मीदों के साथ आप यहाँ आए हैं?

उम्मीद ये है कि यहाँ के दर्शक और प्रेस को यह फ़िल्म पसंद आएगी. यहाँ से जिस तरह ‘लगान’ की अंतरराष्ट्रीय यात्रा शुरू हुई थी और इतनी क़ामयाब हुई थी. उम्मीद ये है कि इस दफ़ा ज़्यादा क़ामयाब हो ‘द राइज़िंग’ की यात्रा.

‘लगान’ को जितनी व्यावसायिक सफलता मिली थी, उतना ही फ़िल्म समीक्षकों ने भी उसे सराहा था. एक कलाकार होने के नाते आप किस चीज़ को ज़्यादा अहमियत देते हैं- व्यावसायिक सफलता या समीक्षकों की अच्छी राय?

मेरे लिए दर्शकों की राय सबसे ज़्यादा महत्व रखती है. जब मेरी फ़िल्म मुकम्मल होती है, तब मैं ख़ुद देखता हूँ फ़िल्म को. मुझे फ़िल्म पसंद आती है या नहीं. जो हम बनाने चले हैं उससे मैं ख़ुश हूँ या नहीं. सबसे पहले मैं उससे तुलना करता हूँ फ़िल्म की सफलता की. उसके बाद दर्शक जिनके लिए फ़िल्म बनाई गई है उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है, वो मेरे लिए अहम है.

 जब मैं कोई स्क्रिप्ट सेलेक्ट करता हूँ, मेरा पहला काम होता है कि किरदार के दिमाग में घुस जाऊँ. उसके सोचने के अंदाज़ को समझ लूँ. और ये सबसे कठिन काम होता है मेरे लिए

जब आप व्यावसायिक सफलता की बात करते हैं तो उसका मतलब पैसों से होता है. मेरा बिज़नेस से कोई लेना देना नहीं है, मैं आर्टिस्ट हूँ. मेरी दिलचस्पी सिर्फ़ इस बात में है कि जिन लोगों के लिए फ़िल्म बनी है उन दर्शकों को फ़िल्म पसंद आई या नहीं. और अगर दर्शकों को फ़िल्म पसंद आई तो ये सबसे बड़ी क़ामयाबी की चीज़ है मेरे लिए.

यह देखा गया है कि जिस चरित्र को आप परदे पर जीते हैं उसके लिए आप असली जीवन में बहुत मेहनत करते हैं. आपने मंगल पांडे के चरित्र को निभाने के लिए कैसी तैयारियाँ की थीं?

देखिए, जब मैं कोई स्क्रिप्ट सेलेक्ट करता हूँ, मेरा पहला काम होता है कि किरदार के दिमाग में घुस जाऊँ. उसके सोचने के अंदाज़ को समझ लूँ. और ये सबसे कठिन काम होता है मेरे लिए. मैं निर्देशक के साथ बैठ कर विचार-विमर्श करता हूँ, सवाल पूछता हूँ, टटोलता हूँ, ढूँढता हूँ.

 मैं आर्टिस्ट हूँ. मेरी दिलचस्पी सिर्फ़ इस बात में है कि जिन लोगों के लिए फ़िल्म बनी है उन दर्शकों को फ़िल्म पसंद आई या नहीं
तब जाकर अंदाज़ा होता है कि ये किरदार किस तरह सोचता है, इसका दिमाग किस तरह चलता है. जब वो चीज़ मेरी समझ में आ जाती है तब बाक़ी चीज़ें उससे निकल कर आती हैं. एक बार उसका दिमाग समझ में आ गया, फिर उसके कपड़े किस तरह के होंगे, रहन-सहन किस तरह का होगा, शारीरिक रूप से कैसा होगा, कैसे चलेगा-फिरेगा, हावभाव कैसा होगा, बॉडी लैंग्वेज़ कैसी होगी—ये सारी चीज़ें उससे निकल कर आती हैं. फिर किरदार की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि क्या है उसका अध्ययन कर हम उसे प्लेस करते हैं.

ये सब चीज़ें रिसर्च के ज़रिए आती हैं, लेकिन कुछ चीज़ों के लिए शारीरिक मेहनत करनी होती हैं. जैसे इस फ़िल्म में हमें मूँछ बढ़ानी थी और बाल बढ़ाने थे, उसमें हमें एक-डेढ़ साल लग गए. इसके अलावा इस फ़िल्म में मेरा शरीर एक योद्धा जैसा होना चाहिए था.

आजकल के ‘मस्क्युलर कट्स’ वाला शरीर नहीं क्योंकि वो तो बहुत आधुनिक किस्म का शरीर हो जाता. एक डंड-बैठक टाइप शरीर चाहिए था मुझे. उसके लिए काफ़ी मेहनत की मैंने, फ़िज़िकल ट्रेनिंग किया उसके लिए.

‘द राइज़िंग’ में अनेक विदेशी कलाकारों ने काम किया है जिनमें टोबी स्टीवेन्स जैसे प्रतिभाशाली कलाकार शामिल हैं. कैसा अनुभव रहा इतने सारे विदेशी कलाकारों के साथ काम करने का?

बहुत ही अच्छा अनुभव रहा. टोबी स्टीवेन्स एक मँज़े हुए कलाकार हैं. बहुत ही मज़ा आया उनके साथ काम करके. वो इन्सान भी बहुत अच्छे हैं. बड़े प्यार से काम किया है उन्होंने इस फ़िल्म में.

आमिर ख़ान
आमिर ख़ान लगान के साथ भी लोकार्नों आए थे

स्क्रिप्ट उन्हें बहुत पसंद आई थी. दरअसल जितने अंग्रेज़ कलाकारों ने इसमें काम किया है सभी को स्क्रिप्ट पसंद आई थी. सभी ने बहुत ही अच्छी तरह काम किया है. कइयों को इसके लिए हिंदी सीखनी पड़ी.

सबके साथ काम करने का बड़ा ही अच्छा अनुभव रहा, ख़ास करके टोबी के साथ. पूरी तरह समझ के उसने रोल निभाया है और बहुत ही ख़ूबसूरती से निभाया है. मैं कहूँगा कि फ़िल्म के सबसे मज़बूत पक्षों में से एक है टोबी स्टीवेन्स की अदाकारी.

‘दिल चाहता है’ के बाद आपकी इस फ़िल्म को आने में पूरे चार साल लगे. आपकी फ़िल्मों के बीच में इतना अंतराल क्यों रहता है और क्या आपकी आने वाली फ़िल्मों के जल्दी आने की उम्मीद की जाए?

आमतौर पर हर साल मेरी एक फ़िल्म आती है. आप 1995 से देखें तो रंगीला थी, राजा हिंदुस्तानी, इश्क़, ग़ुलाम, सरफ़रोश, लगान, दिल चाहता है—हर साल मेरी एक फ़िल्म तो आती ही रही. इस बार अंतराल ज़्यादा लंबा हो गया क्योंकि मैं कुछ व्यक्तिगत परेशानियों से जूझ रहा था. उसके चलते मैं मानसिक रूप से इस स्थिति में नहीं था कि काम करूँ या काम के बारे में सोचूँ भी. लिहाज़ा डेढ़ साल तक मैंने काम नहीं किया. उसके बाद ‘द राइज़िंग’ की स्क्रिप्ट पढ़ी तो बेहद पसंद आई और मैंने ढाई साल तक इस पर काम किया.

मैंने लोगों की इस शिकायत पर ध्यान दिया है कि मेरी फ़िल्म इतने लंबे अंतराल पर आ रही है. अब मैंने प्लानिंग इस तरह की है कि मैं अपनी फ़िल्में थोड़ा एडवांस में फ़िल्में सेलेक्ट कर लेता हूँ.

काम करने का तरीक़ा मैंने बदला नहीं है. मैं एक वक़्त पर एक ही फ़िल्म करूँगा. और फ़िल्म की शूटिंग के बाद चार महीने का गैप रख कर दूसरी फ़िल्म शुरू करूँगा. जैसे मंगल पांडे की शूटिंग ख़त्म हुई उसके छह महीने बाद मैंने ‘रंग दे बसंती’ की शूटिंग शुरू की. ‘रंग दे बसंती’ की शूटिंग एक महीने पहले ख़त्म हो चुकी है और अब मैं अक्टूबर में शुरू करूँगा कुणाल कोहली की फ़िल्म यशराज फ़िल्म्स के लिए. इस तरह हर आठ महीने में दर्शक मेरी एक फ़िल्म देख सकेंगे, हर आठ महीने में मेरी नई फ़िल्म आएगी.

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