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'मैं खंभे की भूमिका भी कर सकती हूँ' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बॉलीवुड की सफल अभिनेत्री रानी मुखर्जी आमिर ख़ान और शाहरूख़ ख़ान की इतनी एहसानमंद हैं कि यदि इन अभिनेताओं की फ़िल्मों में उन्हें दूर खड़े खंभे की भूमिका मिले तो वे भी करेंगी. लोकार्नो में रानी ने बीबीसी हिंदी सेवा से बातचीत में आमिर और शाहरूख़ के प्रति असीम सम्मान के भाव का खुलकर इज़हार किया. बातचीत के मुख्य अंश-- ‘द राइज़िंग’ में आपकी बहुत ही छोटी भूमिका है. क्यों आपने इतना छोटा रोल स्वीकार किया? दरअसल, जब मैंने ये फ़िल्म साइन की थी तो मैंने अपना ‘कैमियो रोल’ समझकर साइन की थी. मैं स्कूल में अपने प्रिय विषय पर बनने वाली फ़िल्म का हिस्सा बनना चाहती थी. भारत के पहले क्रांतिकारी की कहानी पर बनने वाली फ़िल्म का स्क्रिप्ट मुझे दिया गया तो मुझे लगा कि हीरा की भूमिका बहुत ही रोचक है और मैं एक मेहमान कलाकार के रूप में फ़िल्म में शामिल होने को तैयार हो गई. लेकिन जब फ़िल्म बनने लगी तो दो-तीन अतिरिक्त दृश्यों में हीरा को लिया गया और वह कहानी का एक पूर्ण पात्र बन गई. मेरा तो यह मानना रहा है कि फ़िल्म में कितनी बड़ी भूमिका है इसका महत्व नहीं है. महत्व इस बात का होता है कि किसी किरदार का काम क्या है और क्या फ़िल्म देखने के बाद उसे याद रखा जाता है. यदि आपने फ़िल्म देखने के बाद भी मेरे किरदार को याद रखा है तो मैं समझती हूँ कि मैं क़ामयाब रही. एक और बात यह है कि हर फ़िल्म नायिका प्रधान नहीं हो सकती. यदि आप मंगल पांडे पर फ़िल्म देखने जाते हैं तो ज़ाहिर है आप मंगल पांडे के किरदार को देखने जा रहे हैं. फ़िल्म में अपने किरदार के बारे में कुछ बताएँ? जहाँ तक हीरा के किरदार की बात है तो मैंने कभी एक वेश्या की भूमिका नहीं की थी. और इस फ़िल्म में अठारहवीं सदी की एक वेश्या की भूमिका निभाना बड़ा ही रोचक अनुभव रहा. यह आमिर की चार साल बाद आ रही फ़िल्म है. वो मेरे निकट मित्र हैं. इसलिए भी इस फ़िल्म से एक भावनात्मक जुड़ाव रहा और काम करने में मज़ा आया. आमिर के साथ काम करने और शाहरूख़ के साथ काम करने के अनुभव में आप किस तरह का अंतर पाती हैं? शाहरूख़ और आमिर दोनों महत्वपूर्ण हैं मेरे करियर और मेरे जीवन में. मेरे करियर की शुरूआत इन्हीं दोनों के साथ हुई. मैंने दोनों से बहुत कुछ सीखा है. दोनों ने शुरूआत में बड़े प्यार से मुझे बहुत कुछ सिखाया. तब मैं बहुत छोटी थी. मुझे ज़्यादा समझ नहीं थी फ़िल्मों के बारे में या एक्टिंग के बारे में. दोनों ने ठीक उसी तरह मुझे सिखाया जैसे किसी बच्चे का हाथ पकड़ उसे चलना सिखाते हैं. उस समय दोनों बहुत बड़े स्टार थे और मैं एक ‘न्यूकमर’ थी. मेरे मन में उनके प्रति एक ‘सॉफ़्टकॉर्नर’ है. मैं उनको बहुत प्यार करती हूँ, बहुत सम्मान करती हूँ इसलिए आमिर और शाहरूख़ जब भी मुझे कुछ बोलते हैं मैं बिना सोचे, बिना झिझक हाँ कर देती हूँ. अगर आमिर और शाहरूख़ की पिक्चर में मुझे दूर एक खंभे की तरह खड़े होने के लिए भी कहेंगे तो मैं खड़ी हो जाऊँगी. क्योंकि मेरा उनके लिए प्यार इतना ज़्यादा है कि वो कुछ भी मुझे कहें, मैं कर दूँगी. आपने कहा कि आप रोचक और एक चुनौतीपूर्ण भूमिकाएँ करना चाहती हैं. तो ऐसे और कौन से किरदार हैं जिन्हें निभाने का मौक़ा आपको नहीं मिला है, जिन्हें आप निभाना चाहती हैं? मैं हमेशा कहती हूँ कि ये एक्टर के भाग्य में होता है कि निर्देशक किस कहानी के लिए उसे चुनता है. मैं इंतज़ार करती हूँ कि किसी निर्देशक के दिमाग में कोई अभिनव विचार हो और वो उसके लिए मुझे सही पाए. जैसे संजय लीला भंसाली ने ‘ब्लैक’ बनाने की सोची तो किसी ने ज़िंदगी में नहीं सोचा होगा कि संजय ऐसी फ़िल्म करेंगे. लेकिन उन्होंने ‘ब्लैक’ बनाने की सोची और उसके लिए मुझे चुना. तो ये सब एक्टर के भाग्य पर निर्भर करता है. आपकी आने वाली फ़िल्में कौन-कौन सी हैं? मेरी आने वाली फ़िल्में हैं करन जौहर की ‘कभी अलविदा न कहना’ जिसमें शाहरूख़ ख़ान, अभिषेक बच्चन और प्रीति ज़िंटा हैं मेरे साथ. ये फ़िल्म अगले साल अप्रैल-मई तक आ जाएगी. दूसरी फ़िल्म है रवि चोपड़ा की ‘बाबुल’. उसमें अमिताभ बच्चन, हेमा जी, सलमान और जॉन हैं मेरे साथ. वो भी अगले साल मई तक आ जाएगी. |
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