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सिखों का अपना फ़िल्म महोत्सव | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विश्व भर से सिखों के विविध अनुभवों और कहानियों को फ़िल्मों मे दर्शाता हुआ तीसरा सिख फ़िल्म महोत्सव टोरंटो मे 14 से 16 अक्तूबर तक हो रहा है. इसमे लगभग 30 फ़िल्में दिखाई जा रही हैं और कई चर्चा सत्र एवं सेमिनार भी आयोजित हो रहे हैं. आयोजकों का कहना है कि महोत्सव मे ऐसी फ़िल्में दिखाई जाती हैं जो सिखों के संदर्भ में, उनके द्वारा या उनके लिए बनाई गई हों. और ऐसी फ़िल्में भी जो मानवाधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता एवं मैत्रीभाव को दर्शातीं हो. इस फ़िल्म महोत्सव का नाम है स्पिनिंग व्हील (यानी चरखा) फ़िल्म फ़ेस्टिवल. महोत्सव में दिखाई जाने वाली फ़िल्मों में 'अमु', 'टाइगर', 'वाटरबोर्न' एवं 'डिवाडेड वी फॉल' शामिल हैं. मनदीप सिंह रयात, जो इस साल महोत्सव के अध्यक्ष हैं, कहते हैं, "सिखों को लेकर जो मिथक एवं गलतफहमियाँ प्रचलित हैं, उन्हे दूर करना हमारा उद्देश्य है और साथ ही विश्व स्तर पर सिख समुदाय के योगदान को भी दुनिया के सामने पेश करना है." अलग महोत्सव
वे कहते हैं, "सिनेमा के माध्यम से सिख जीवनशैली एवं संस्क्रुति को अभिव्यक्त करने का यह एक प्रयास है." आयोजक कहते हैं उनका प्रयास उनके समुदाय के ऐतिहासिक, समसामयिक, धार्मिक एवं व्यावहारिक पहलू को नई पीढ़ी के सामने लाना है. और इस वर्ष दिखाई जाने वाली फ़िल्में यही करती हैं. फ़िल्में महोत्सव की शुरुआत सोनाली बोस की बहु चर्चित फ़िल्म अमु से होगी. 1984 में भारत में सिखों पर हुए दंगों पर आधारित 'अमु' अमरीका निवासी बोस की पहली फ़ीचर फ़िल्म है. पिछले महीने टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में भी ये फ़िल्म दिखाई गई थी और इसकी काफ़ी प्रशंसा हुई.
फ़िल्म के स्क्रीनिंग के दौरान सोनाली बोस वहाँ उपस्थित होंगी और उसके बाद सवाल-जवाब के सत्र मे हिस्सा लेंगी. भारतीय मूल की कनाडा निवासी ललिता कृष्णा की फ़िल्म 'टाइगर', जो जानेमाने कुश्तीबाज़ टाइगर जीत सिंघ के व्यक्तिगत एवं व्यावसायिक सफर पर आधारित है. इस फ़िल्म को लेकर यहाँ काफ़ी उत्सुकता है. केवल 6 डोलर की पूँजी से कनाडा में अपना जीवन शुरू करने वाले जीत सिंह उत्तरी अमरीका में दक्षिण एशियाई मूल के पहले व्यावसायिक कुश्तीबाज़ बने और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की. उन्हे "टाइगर" की उपाधि जापान मे एक प्रतियोगिता जीतने के बाद मिली थी. अब उनकी गिनती कनाडा के रईसों मे की जाती है. सिख इतिहास पर बनी पहली 2-डी एनिमेशन फ़िल्म "साहिबज़ादे-ए सागा ऑफ वेलर एण्ड सैक्रिफाइस" गुरू गोबिंद सिंघ के दो पुत्रों की वीर गाथा को दर्शाती है और "बाइ गॉड्स ग्रेस" सिख धर्म की आध्यात्मिकता और साथ ही उसका आचरण कनाडा एवं अन्य देशों मे बसे सिखों में दिखाता है. 11 सितंबर 2001 को अमरीका में हुए आतंकवादी हमले की बाद बदले हुए हालात और उनका सिखों पर असर महोत्सव के कुछ फ़िल्मों का विषय है. इनमें प्रमुख हैं-"डिवाइडेड वी फॉल" एवं "वाटरबॉर्न". तो वहीं, अपनी सरज़मीन से दूर, ब्रिटेन मे बसे सिखों के अपनी पहचान की तलाश से कुछ फ़िल्में जूझती है. महोत्सव के अध्यक्ष रेयात कहते हैं, हालांकि ये फ़िल्में ब्रिटेन की परिस्थितियों में बनी हैं लेकिन सिख अस्मिता और पहचान की खोज विदेश मे बसे सभी सिखों की है. फाउंडेशन और सहायता एक ज़माने से चरखा मात्र सूत कातने का यंत्र ही न होकर अभिव्यक्ति का एक माध्यम भी रहा है. गाँधीजी ने तो इसे आज़ादी की लड़ाई में एक बड़े संकेत के रुप में इस्तेमाल किया. इसलिए मनदीप रयात और उनके साथियों ने टोरंटो में जब सिख फ़िल्म महोत्सव आयोजन करने का निर्णय लिया तो उसे "स्पिन्निंग व्हील" यानी चर्खे का नाम देकर गांव की सोंधी मिट्टी से जुड़ी इस परंपरा को प्रतीकात्मक तौर पर बड़े पर्दे पर उतारा. यह महोत्सव का तीसरा साल है. अगर स्पिनिंग व्हील महोत्सव को चलाए रखना है तो जरूरी है कि और फ़िल्में बनती रहें. फ़िल्मों की फसल तैयार करने और फ़िल्म बनाने वालों की एक नई पीढ़ी तैयार करने के लिए सिख फ़िल्म फाउंडेशन की स्थापना की गई है. फाउंडेशन उभरते फ़िल्मकारों को अनुदान राशि देती है. "डिवाइडेड वी फॉल" इस राशि से बनाई गई फ़िल्म है. रयात कहते हैं, "कनाडा के शहरों से और अन्य देशों से कई लोगों ने अपने यहाँ स्पिनिंग व्हील महोत्सव आयोजित करने की इच्छा व्यक्त की है और हम इस दिशा मे कार्यरत हैं." |
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