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ब्रिटेन के सिखों में खुशी की लहर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लंदन का साउथॉल इलाक्रा - पिछले 50 सालों से सिख समुदाय का घर बने लंदन के इस कोने पर भारत में चल रही गतिविधियों का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है. आज यहाँ ख़ासतौर पर बहुत चहल-पहल है. हो भी क्यों न - भारत में सिख समुदाय के डॉ मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री जो बन गए हैं. यहाँ रहने वाले 70 साल के मलकीत सिंह गर्व से कहते हैं, "मुझे बहुत खुशी है कि उन्हें प्रधानमंत्री चुना गया. पगड़ी तो अलग ही दिखती है." साउथॉल में पंजाब रेडियो स्टेशन के जसवीर सिंह का कहना है, "जब कोई खालसा शासन करता है तो गरीबी और दमन जैसी समस्याऐं पास नहीं फटकतीं." 20 साल पहले सिख समुदाय ने अपने सबसे बड़े गुरूद्वारे स्वर्ण मंदिर में आतंकवादियों से निपटने के लिए सुरक्षा बलों को भेजने का विरोध किया था. इस क़दम के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने समुदाय की नाराज़गी झेली थी. फिर 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद भड़के दंगों में सैकड़ों सिखों की जान गई थी और उन्हें दमन का सामना करना पड़ा था. आज उसी कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गाँधी का मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री नियुक्त करना सिखों को उन घावों पर मरहम जैसा लग रहा है. लेकिन इसके साथ ही भारत की राजनीति से भरोसा न होने के कारण कहीं डर भी है. देसी रेडियों में काम करने वाले अजीत सिंह का कहना है,"हमें केवल इसलिए ज़्यादा उत्साहित नहीं हो जाना चाहिए कि एक पगड़ी वाले ने सत्ता संभाली है. हम चाहते हैं कि मनमोहन सिंह 1980 के दंगों का जाँच फिर से शुरू करायें और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए संविधान में संशोधन लायें." नाराज़गी अजीत सिंह ने बीबीसी ऑनलाईन को बताया कि पश्चिम में रहने वाले सैकड़ों सिख हमेशा से भारतीय राजनीति पर प्रभाव डालते रहे हैं. एक समय था जब सभी सिखों के लिए पृथक खालिस्तान की मांग के लिए एकजुट हो गए थे. वह कहते हैं, "1980 के दशक में हरेक पंजाबी खालिस्तानी था." हालाँकि अब खालिस्तान के लिए संघर्ष ख़तम हो चुका है.
लेकिन 1980 की ज़्यादतियों को भुलाना उनके लिए आसान नहीं है. साउथॉल के एक निवासी का मानना है कि इंदिरा गाँधी ने कई गलतियाँ की लेकिन स्वर्ण मंदिर का अनादर करने की पहल उन चरमपंथियों ने की, जिन्होंने उसमें शरण ली. उनका कहना है,"जिस जगह हम अपने जूते तक ले जाना ग़लत समझते हैं, वहाँ वे बंदूकें और हथियार लेकर कैसे जा सकते थे." योद्धा कौम लेकिन कुछ अन्य लोग 1984 के घावों के लिए तत्कालीन सरकार को ही ज़िम्मेदार ठहराते हैं. साउथॉल की रामगढ़िया सभा सिख गुरूद्वारे के मेहर सिंह सेहम्बी कहते हैं, "सिख कभी भी इंदिरा गाँधी को माफ़ नहीं कर सकते." पंजाब रेडियो के जसवीर सिंह भी कहते हैं, "सिख व्यक्तिगत हमले बर्दाश्त कर सकते हैं, लेकिन अपने धार्मिक स्थलों पर हमले हमें कतई बर्दाश्त नहीं हैं." फिर भी उनका कहना है कि समझौता और सदभाव उनके धर्म का अहम अंग है. उन्होंने कहा कि उनकी कौम योद्धा कौम मानी जाती है. लेकिन लड़ने के कई तरीक़े हैं. मनमोहन सिंह ग़रीबी के ख़िलाफ़ लड़ेंगे. जसवीर सिंह का मानना है कि मनमोहन सिंह देश का नेतृत्व करने के लिए सबसे उपयुक्त हैं. उनमें वित्तीय समझ के साथ-साथ सिख धर्म के मानवीय मूल्य मौजूद हैं. हालाँकि 1984 के ज़ख्म अभी भरे नहीं हैं, लेकिन ज़्यादातर सिख भविष्य की तरफ देखने में विश्वास रखते हैं. जैसे कि अजीत सिंह कहते हैं, "ब्रिटेन बदल गया है. अब यहाँ अलग-अलग संस्कृतियाँ का मेल हैं. उम्मीद करते हैं कि ये सकारात्मक संदेश भारत भी पहुंचेगा." मेहर सिंह सेहम्बी भी इससे इत्तेफ़ाक रखते हुए उम्मीद जताते हैं कि अब सिख की नई पहचान उभर कर आयेगी. ये न तो पूरी तरह से ब्रिटिश होगी और न ही पूरी भारतीय. |
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