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बँटवारे का दर्द फिर महसूस किया गया | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत का बँटवारा तो 1947 में ही हो गया था लेकिन उसका दर्द अब भी किसी न किसी रूप में बरक़रार है. इस दर्द को इस सप्ताह लंदन में फिर से महसूस करने की कोशिश की गई, बँटवारे पर बनी कुछ फ़िल्मों का प्रदर्शन करके. साउथ एशियन सिनेमा फ़ाउंडेशन ने भारत-पाकिस्तान विभाजन पर बनी कुछ चुनिंदा फ़िल्मों का एक लघु महोत्सव बीते सप्ताह लंदन में आयोजित किया. इसमें विभिन्न भाषाओं की चार फ़िल्मों का प्रदर्शन किया गया, ये थीं, गर्म हवा, पिंजर, ख़ामोश पानी और चित्रा नोदीर पारे. इनमें गर्म हवा और पिंजर भारत में बनी फ़िल्में हैं, ख़ामोश पानी एक पाकिस्तानी फ़िल्म है और चित्रा नोदीर पारे बांग्ला फ़िल्म. हालाँकि भारत-पाकिस्तान विभाजन एक काफ़ी पुराना विषय हो चुका है लेकिन इसने मानवता को इतने बड़े पैमाने पर प्रभावित किया था कि उसका दर्द अब तक की पीढ़ियों तक महसूस किया जा रहा है और न जाने कब तक महसूस किया जाएगा. इस वक़्त क्यों? लेकिन इस वक़्त पर ऐसा फ़िल्म समारोह ब्रिटेन में आयोजित करने का आख़िर विचार कैसे आया.
साउथ एशियन सिनेमा फ़ाउंडेशन के निदेशक और इस लघु महोत्सव के आयोजक ललित मोहन जोशी कहते हैं, "यह एक ऐसा विषय रहा है जिसने दक्षिण एशिया ही नहीं बल्कि विदेशों में भी हलचल मचाई है लेकिन ब्रिटेन में इस तरह का फ़िल्मोत्सव पहले कभी नहीं हुआ." ललित मोहन जोशी कहते हैं कि इस फ़िल्मोत्सव का मक़सद दक्षिण एशिया से संबंध रखने वाली नई और पुरानी पीढ़ी को यह महसूस कराने की कोशिश करना था कि 1947 के दौर में जिस घटना ने उनके पूर्वजों को दुश्मन बना दिया था, ज़रूरी नहीं कि अब भी उसी अदावत के साथ जिया जाए." "फ़िल्मोत्सव का मक़सद इस विषय को एक बार फिर उठाकर उनमें एकता की भावना पैदा करना था और इन फ़िल्मों को देखने आए लोगों की दिलचस्पी से यही नज़र आया कि लोग विभाजन के दर्द को महसूस तो करते हैं लेकिन उस अदावत को याद भी नहीं करना चाहते." ललित मोहन जोशी ने बताया कि इन फ़िल्मों को देखने के लिए हिंदू, मुसलमान, सिख, बंगाली, युवा, अधेड़ और बुज़ुर्ग सभी तरह के लोग आए और उन्होंने काफ़ी पसंद किया. इस लघु महोत्सव में चारों फ़िल्में देखने एक बुज़ुर्ग बंगाली दंपत्ति कार्डिफ़ से आया था. डॉक्टर बिस्नू चौधरी और उनकी पत्नी अनुराधा चौधरी का कहना था कि विभाजन के समय वे बच्चे थे और धुँधली सी यादें उनके ज़हन में अब भी हैं. अनुराधा चौधरी का कहना था कि यह एक अच्छा प्रयास था जिससे इनसानियत की पीड़ा को एक बार फिर महसूस करने का मौक़ा मिला और उससे सबक सीखने का भी ताकि ऐसी घटनाओं को भुलाकर आगे की तरफ़ देखा जाए.
हालाँकि उनका यह भी कहना था कि पिंजर विभाजन पर कम बल्कि एक सामाजिक मुद्दे पर बनी फ़िल्म ज़्यादा है. अच्छा होता कि इसकी जगह अगर 'मम्मो' दिखाई जाती. इन फ़िल्मों को देखकर ऐसा ही लगा कि उनमें उठाए गए सवाल यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि इंसानियत को किस तरह राजनीति की भेंट चढ़ा दिया गया और इनसान के दर्द को समझने या महसूस करने के बजाय हालात से न सिर्फ़ फ़ायदा उठाने की कोशिश की गई बल्कि और मजबूर हालात पैदा करने की भी कोशिश की गई. गर्म हवा गर्म हवा को भारत-विभाजन के दर्द का चित्रण करने वाली पहली हिंदुस्तानी फ़िल्म कहा जाता है जो 1973 में आई थी. फ़िल्म में जो सवाल उस समय उठाए गए थे वो काफ़ी वक़्त तक मौजूद रहे और शायद किसी न किसी रूप में आज भी मुँह-बाएँ खड़े नज़र आते हैं. आप में से बहुत से लोगों ने वह फ़िल्म कई बार देखी होगी लेकिन हर बार देखने पर यह फ़िल्म प्रासंगिक लगती है. जो फ़िल्म कम, एक हक़ीक़त ज़्यादा नज़र आती है. ख़ामोश पानी ख़ामोश पानी निर्देशक सबीहा सुमार की पहली फ़िल्म है और उन्होंने दिखाने की कोशिश की है कि बेरोज़गारी का फ़ायदा किस तरह से उठाया जा सकता है और कोई समाज अगर धार्मिक और सामाजिक बंधनों में जकड़ा हुआ है तो एक मोड़ पर आकर इनसान की हिम्मत किस तरह कमज़ोर पड़ जाती है. फ़िल्म की पृष्ठभूमि पाकिस्तान में जनरल ज़ियाउल हक़ के शासनकाल की है जब 'इस्लाम ख़तरे में है' की तर्ज़ पर युवाओं की भावनाओं को एक ख़ास मोड़ देने की कोशिश की गई जिसने माँ जैसे रिश्ते पर भी सवाल खड़े कर दिए. इसमें पाकिस्तान में मुसलमान-सिख संबंधों की नाज़ुक डोर पर कहानी बाँधी गई है जहाँ ख़ून का रिश्ता ही आयशा की जान का दुश्मन बन जाता है. आयशा हालात की शिकार होकर सिख से मुसलमान बनकर अपनी पहचान की तलाश में सारी ज़िंदगी गुज़ार देती है लेकिन आख़िरकार उसकी पहचान पर उसके अपने ही सवाल खड़े कर देते हैं तो वह जैसे टूट जाती है.
फ़िल्म इस हक़ीक़त से भी रूबरू कराती है कि चाहे वह भारत हो, पाकिस्तान या कोई और देश, इनसानियत हर जगह ज़िंदा है और कट्टरपंथ, चाहे वह किसी भी तरह का हो, बिना राजनीतिक हवा के नहीं पनप सकता. ख़ामोश पानी में औरत के दर्द को बहुत ही संवेदनशील नज़रिए से दिखाया गया है, एक औरत जो हालात और समाज से लड़कर अपना वजूद बनाती है लेकिन एक मोड़ पर आकर वह भी हिम्मत हार जाती है. आख़िर क्यों? एक अन्य लड़की है, जो 21वीं सदी का चरित्र है, वह चीज़ों को तर्क की कसौटी पर कसकर देखती है और उसमें अपने मज़हब का आदर करने के साथ-साथ समाज में अपना स्थान बनाने की ललक और क्षमता भी नज़र आती है. अमृता प्रीतम के उपन्यास पर आधारित बनी फ़िल्म 'पिंजर' भी एक औरत के दर्द को ही उकेरती है कि कट्टरपंथी समाजों में औरत को किस तरह 'ख़ानदान की इज़्ज़त' तो माना जाता है लेकिन उसका वजूद शायद किसी के लिए कोई अहमियत नहीं रखता. बांग्ला फ़िल्म चित्रा नोदीर पारे उस समय के पूर्वी पाकिस्तान और आज के बांग्लादेश में रहने वाले एक मध्यमवर्गीय हिंदू परिवार के हालात से दो-चार कराती है कि वह अपनी ज़िंदगी को स्थायित्व देने की कोशिश तो करता है लेकिन जैसे पूरी हवा में ही असुरक्षा भरी हुई है. परिवार के मुखिया भारत में पश्चिम बंगाल जाने के लिए राज़ी नहीं हैं लेकिन हालात ने उन्हें इसकी बहुत भारी सज़ा दी. |
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