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बुधवार, 23 फ़रवरी, 2005 को 09:37 GMT तक के समाचार
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दंगे की सादा मगर सशक्त कहानी

अमू में कोंकणा सेन
अमू को दर्शकों ने संवेदनशील फ़िल्म माना है
किसी बड़े समारोह और बड़े प्रचार से परे, रूपहले पर्दे पर दिखने वाली चमक-दमक से दूर एक साफ़-सुथरी और सार्थक विमर्श वाली फ़िल्म है अमू.

अमू, 1984 में हुए सिख दंगों के दर्द के इर्द-गिर्द रची एक कहानी है जिसका निर्देशन सोनाली बोस ने किया है और मुख्य भूमिका में हैं कोंकणा सेन शर्मा, जो फ़िल्म अभिनेत्री अपर्णा सेन की बेटी हैं.

कम बजट की इस फ़िल्म का कथानक इतने मज़बूत विषय पर आधारित है कि देखने वाले नम आँखों से सिनेमाघर से बाहर आते हैं.

इससे पहले '1947-द अर्थ' और 'मिस्टर एंड मिसेज अय्यर' जैसी फ़िल्मों में सांप्रदायिकता और दंगों के सवाल पर गंभीर विमर्श देखने को मिला था.

आम फ़िल्मों से अलग इस फ़िल्म में एक और ख़ास बात है कि फ़िल्म के ज़्यादातर कलाकार पेशेवर अभिनेता-अभिनेत्री नहीं हैं.

फ़िल्म में सामाजिक कार्यकर्ता वृंदा कारत, काजू (कोंकणा सेन) को गोद लेने वाली माँ की भूमिका निभा रही हैं और सांसद रह चुकीं सुभाषिनी अली भी कुछ क्षणों के लिए पर्दे पर दिखाई देती हैं.

कथानक

फ़िल्म की कहानी काजू के इर्द-गिर्द है.

अमरीका से आई ये युवा लड़की भारत को देखने और समझने आई है जिसकी आँखों में भारत के प्रति जिज्ञासा है और हाथों में एक अदद वीडियो कैमरा.

वृंदा कारत
वृंदा कारत ने पहली बार किसी फ़िल्म में अभिनय किया है

साथ में वो तमाम सवाल भी हैं जो आज की युवा पीढ़ी में साफ़ दिखाई देते हैं. मसलन, गरीबी और परंपराओं के साथ ही संबंधों की अपनी परिभाषाएँ और समाज से अपने अस्तित्व की लड़ाई.

इस दौरान वो एक अपने हमउम्र लड़के से मिलती है जिसके साथ वो दिल्ली की झुग्गियों में जाती है. वहाँ पहुँचकर दोनों के ही मन में 1984 के दंगों की जिज्ञासा बढ़ती है और काजू अपने असली माता-पिता की खोज में लग जाती है.

इस दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय की ख़ास भाषाशैली के अलावा दिल्ली की व्यस्त जिंदगी, झुग्गियों में रहने वाले लोग और ख़ासतौर पर दंगों के बाद बची आधी-अधूरी ज़िंदगियों को सामने लाने की कोशिश की गई है.

फ़िल्म के अंत में काजू के पता चलता है कि वो असल में अमू है और फिर सामने आती है 1984 के दंगों में उसके बचपन के उजड़ने और माँ-बाप-भाई, सबके ख़त्म होने की कहानी.

दंगों की विभीषिका के अलावा उस समय के रानीतिक और प्रशासनिक घटनाक्रम पर भी इस फ़िल्म में सीधे हमला किया गया है.

प्रभावी अंत

फ़िल्म अपनी बात को सीधे-सीधे कहने में सफल रही है और अभिनय भी स्वाभाविक है. हालांकि कहीं-कहीं पर फ़िल्म वृंदा कारत के कामों का लेखाजोखा देती हुई लगती है जो उनकी छवि के लिए लाभप्रद नज़र आता है.

 सांप्रदायिकता का सवाल अभी भी बना हुआ है और उसकी वजह धर्मिक नहीं, राजनीतिक होती हैं, यह साफ़ दिखाई दे रहा है
प्रोफ़ेसर चरणजीत सिंह, जेएनयू

फ़िल्म का अंत सबसे ज़्यादा प्रभावी है. अंतिम दृश्य में एक ओर काजू को उसके सवालों का जवाब मिल रहा है और दूसरी ओर टेलीविजन पर गोधरा काँड का समाचार प्रसारित हो रहा है.

इस पर टिप्पणी करते हुए फ़िल्म देखने पहुँचे प्रोफ़ेसर चरणजीत सिंह कहते हैं, "सांप्रदायिकता का सवाल अभी भी बना हुआ है और उसकी वजह धर्मिक नहीं, राजनीतिक होती हैं, यह साफ़ दिखाई दे रहा है."

वो बताते हैं, "दंगा पीड़ितों के लिए न्याय अभी भी नहीं मिला है, इसे फ़िल्म में बेझिझक दिखाया गया है."

पर प्रतिक्रियाएँ तीखी भी हैं. एक अन्य सिख, अमरजीत सिंह कहते हैं, "भाजपा का शासनकाल था, तभी इस फ़िल्म की शूटिंग की इजाजत मिल गई वरना वर्तमान सरकार के कार्यकाल में ऐसा कर पाना संभव नहीं हो सकता था."

फ़िल्म दिल्ली के एक प्रतिष्ठित सिनेमाघर में कई हफ़्तों तक ख़ासी भीड़ बटोरती रही. मगर फिल्म उन लोगों की पहुँच के बाहर ही रही जिन पर यह फ़िल्म आधारित है.

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