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वन डॉलर करी - वाकई चीप! | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लंदन में इस सप्ताह एक फ़िल्म रिलीज़ हुई - वन डॉलर करी. फ़िल्मकार इसे कॉमेडी फ़िल्म बता रहे हैं, आम आदमी की कहानी. लेकिन फ़िल्म देखनेवालों को या तो ऐसा लगता है कि उनकी हास्य क्षमता लुप्त हो चुकी है...या ये, कि कहीं हास्य शब्द का अर्थ ही तो नहीं बदल गया. लगभग डेढ़ घंटे की ये फ़िल्म बड़ी बेशर्मी से मज़ाक उड़ाती है - संस्कृति का-भावनाओं का, भारत का-फ़्रांस का, जीवन का-मौत का, आम आदमी का-अधिकारियों का, पंडित का-पूजा का, मीडिया का-शास्त्रीय नृत्य का और सबसे अधिक सिनेमा का. और भारतीय भोजन का मज़ाक तो उड़ना ही था. 10 करोड़ रूपए की ये फ़िल्म भारत और फ़्रांस के दो टेलीविज़न निर्माताओं - ज़ी नेटवर्क और फ़्रांस टू सिनेमा ने मिलकर बनाई है. फ़्रांस में बसे भारतीय निर्देशक विजय सिंह की इस फ़िल्म के मुख्य अभिनेता हैं विक्रम चटवाल जो मुख्य रूप से न्यूयॉर्क में होटल व्यवसायी हैं. मुख्य अभिनेत्री हैं फ़्रांस की गैब्रिएल राइट. स्मृति मिश्रा ने भी भूमिका निभाई है, जिन्होंने 'इस रात की सुबह नहीं', 'सरदारी बेगम', 'ज़ुबैदा' और 'ट्रेन टू पाकिस्तान' जैसी फ़िल्मों में काम किया है. लेकिन ये नाम स्मरण न करवाए जाएँ तो दर्शकों की स्मृति दगा दे जाएगी...कम-से-कम 'वन डॉलर करी' में तो विश्वास नहीं होता कि ये वही स्मृति हैं. कहानी कहानी बिल्कुल सरल है, और कई बार फ़िल्में इसलिए अपनी छाप छोड़ती हैं क्योंकि वे सरल होती हैं. लेकिन फ़िल्मों में एक चीज़ और ज़रूरी होती है - ट्रीटमेंट - जो 'वन डॉलर करी' में बिल्कुल चलताउ किस्म की लगती है. कहानी ये है कि पंजाब से पेरिस पहुँचा एक प्रवासी अपनी जीविका चलाने के लिए एक डॉलर में भारतीय करी बेचना शुरू करता है. नायक की मदद करता है एक कैरीबियाई मूल का नागरिक जिसका अजीब सा नाम है - फ़िक्सर. उसका अपना अतीत है, उसकी प्रेमिका है स्मृति मिश्रा जो भारत में ही है. चूँकि भारत से है, तो उसका नाम भी सांस्कृतिक है, यामिनी, और वो कत्थक भी जानती है. पेरिस में उसकी मुलाक़ात होती है एक टीवी निर्माता से जिसकी भूमिका गैब्रिएल निभाती है. गैब्रिएल राइट बताती हैं कि फ़िल्म के लिए उन्होंने ख़ासी तैयारी की,"मैंने काफ़ी समय विजय सिंह के परिवार के साथ बिताया, किताबें पढ़ीं, महाराजाओं के बारे में जाना, नृत्य के बारे में पढ़ा..मैं एक साल पहले बौद्ध हो गई थी और बोधगया भी गई". लेकिन लगता नहीं कि उनकी मेहनत का फ़िल्म में कोई अधिक काम था. क्योंकि एक प्रवासी के संघर्ष की जो कहानी है उसे बड़े फूहड़ तरीक़े से दिखाया गया है, जिसका ना सिर नज़र आता है- ना पैर. दावे
लंदन में फ़िल्म के रिलीज़ होने से पहले फ़िल्म से जुड़े लोगों ने दावे किए कि फ़िल्म पेरिस में 11 सप्ताह से भी अधिक समय तक चली और भारत में तो कई सप्ताह तक सिनेमाघर हाउसफ़ुल रहे. वैसे मीडिया में बॉक्स ऑफ़िस के जो आँकड़े होते हैं वे कुछ और ही कहानी बयाँ करते हैं. लेकिन फ़िल्मकार अपनी मेहनत से गदगद हैं और उत्साहित होकर बताते हैं कि वे चाहते तो प्रबुद्ध वर्ग के लिए फ़िल्म बना सकते थे लेकिन उन्होंने जान-बूझकर ऐसी कॉमेडी बनाई जिससे आम आदमी अपने को जोड़ सके. दिल्ली के प्रख्यात सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़ चुके निर्देशक विजय सिंह कहते हैं,"ये फ़िल्म 65 से 70 प्रतिशत भारतीय है...कुछ चीज़ें ऐसी हैं जो जड़ों से संबंधित हैं और इसे सब नहीं समझ सकते हैं". लेकिन शायद वे भूल जाते हैं कि जिस स्थान की जड़ों की वो बात करते हैं, वहाँ के दर्शकों ने हृषिकेश मुखर्जी-बासु चटर्जी से लेकर प्रियदर्शन-डेविड धवन और यहाँ तक की मीरा नायर की मौनसून वेडिंग तक में कॉमेडी के दर्शन किए हैं. और ऐसे में एक डॉलर की करी वाकई थोड़ी सस्ती लगती है. |
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