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शनिवार, 24 दिसंबर, 2005 को 14:57 GMT तक के समाचार
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ईरान में हिंदी सिनेमा का जुनून

भारतीय सिनेमा
ईरान में शाहरुख़, ऐश्वर्या और सलमान को लोग काफ़ी पसंद करते हैं.
तंदूरी रोटी पकने की ख़ुशबू, ताज़ा फलों, सूखे मेवों, तेज़ हुक्के की तंबाकू और इत्र की सुगंध के साथ-साथ दूर काकेशिया से आई हवाओं में घुलकर गलियों में फैली हुई है.

चाय खानों में गुड़गुड़ाते हुक्के की आवाज़ों और सड़क के किनारे ताज़ा पनीर बेचने वाली औरतों की अनजानी बोली का मजा लेता, मैं ईरान के एक कस्बे आस्त्रा में ठिठक गया.

सड़क पर एक जाना-पहचाना चेहरा दिखाई दिया. किताबों और पोस्टरों की दुकान पर शाहरूख ख़ान मौजूद थे, वहीं बच्चों को लुभाने वाली सदाबहार मुस्कुराहट. उनके पास सनी देओल भी थे और ऐश्वर्य राय भी आने-जाने वालों को देख रही थीं.

ईरान में एक महीने के अंदर मैंने जितनी हिंदी फ़िल्म देखी उतनी शायद पिछले 25 साल में न देखी होंगी. बड़े-बड़े शहरों के दरमियान चलने वाली बसों में हिंदी फ़िल्में दिखाई जाती है.

ये फ़ारसी ‘डब’ होती है पर गाने ‘डब’ नहीं होते.

दीवाने हज़ारों हैं

आस्त्रा के बसअड्डे पर एक रिटायर्ड बस ड्राइवर और उनके परिवार से मिला. यह बुज़ुर्ग ड्राइवर अपनी पत्नी और दो लड़कियों के साथ तबरेज़ जा रहे थे.

औरतें और लड़कियों को पता चला कि मैं हिंदुस्तानी हूँ तो फ़िल्मों की बातें निकल चलीं. उन्होंने गर्दन मटकाकर और हाथ नचाकर फ़िल्मी नर्तकियों की नक़ल की. एक लड़की पूछने लगी कि हिंदुस्तानी अभिनेत्रियों के बाल इतने ख़ूबसूरत और लम्बे कैसे होते हैं?

भारतीय फ़िल्म
पुरानी फ़िल्मों को भी यहां काफ़ी पसंद किया जाता है.

तेहरान और तबरेज़ जैसे बड़े शहरों में ही नहीं हिंदी फ़िल्मों का जुनून ईरान के छोटे शहरों और कस्बों में भी पहुँच चुका है. यहाँ दुकान पर हिंदी फ़िल्मों की सीडी बिकते हुए देखीं.

इस्फाहन के अमीर कबीर होटल के मालिक हुसैन ज़ई कहने लगे कि उनकी बीवी हिंदी फ़िल्मों की इतनी दीवानी है कि दुबई जाकर हिंदी फ़िल्मों की सीडी ख़रीदती है.

उन्होंने अपना कार्ड दिया और कहा कि मैं उन्हें यह जानकारी भेजूँ कि कौन से हिंदुस्तानी फ़्री टीवी चैनल ईरान में किस तरह देखे जा सकते हैं.

तेहरान के टैक्सी ड्राइवर तो हिंदी फ़िल्मों के अपने मनपसंद गाने का मुखड़ा सुना देते हैं.

राज कपूर, सुरैया का ज़माना तो याद है लेकिन संजय दत्त, शाहरूख़ ख़ान, सलमान ख़ान के नाम इन सबकी ज़ुबान पर बड़ी फुर्ती से आते हैं.

शीराज़ में एक होटल के मालिक ने टूटी-फूटी हिंदी में बताया कि उसने हिंदी फ़िल्में देख-देख कर हिंदी सीखी है. वह हमादान में रहा करता था जहाँ हिंदी फ़िल्में बड़ी संख्या में आती थीं.

हिंदी फ़िल्मों का जुनून ईरानियों के सिर चढ़कर बोलता है.

फ़ारसी में हिंदी

सड़क के किनारे अखबारों की दुकान पर एक ईरानी फ़िल्म मैगज़ीन पर नज़र पड़ी और मैं रूक गया.

मैगज़ीन ‘बॉलीवुड समीन’ के कवर पेज पर शाहरूख ख़ान, ऋतिक रोशन, विवेक ओबराय, जॉन अब्राहम, सलमान ख़ान की तस्वीरें थीं. ‘बैक कवर’ पर सनी देओल थे. यह मैगज़ीन उलट-पुलट कर देखने और कुछ पढ़ने की कोशिश करने लगा तो हैरत का पहाड़ टूट पड़ा.

पहले पेज पर उर्दू के इतिहास पर एक टिप्पणी थी, तीसरे पेज पर बॉक्स में ‘मुहब्बत’ फ़िल्म का गाना ‘दीदार उनका होता है’ दिया गया था. इसके साथ दो कालम बने थे जिनमें से एक में हिंदी का एक वाक्य और सामने वाले कालम में उसका फ़ारसी तरजुमा लिखा था.

यह एक तरह से हिंदी फ़िल्म की भाषा में शब्दों की फ़ारसी डिक्शनरी थी. सैकड़ों हिंदी के लफ़्ज़ों के फ़ारसी समानांतर शब्द दिए गए थे. आगे के पन्नों में भी हिंदी फ़िल्मों के गाने, अभिनेताओं की तस्वीरें और हिंदी शब्दों के फ़ारसी समानार्थक लिखे हुए थे. फ़िल्म के गानों का फ़ारसी अनुवाद भी दिया गया था.

‘बालीवुड समीन’ देखकर यह यकीन हो गया कि यह सिर्फ़ हिंदी फ़िल्मों पर केंद्रित फ़ारसी पत्रिका ही नहीं है बल्कि इसके अवाला भी बहुत कुछ है.

किसे पड़ी है कि ईरानियों को हिंदी फ़िल्में हिंदी में ही देखने के लिए हिंदी पढ़ाए? और फिर पढ़ाए भी तो क्यों? 40-45 पेज में हिंदी फ़िल्मी भाषा की फ़ारसी डिक्शनरी तैयार करना आसान काम नहीं है. यह मेहनत का काम है. जाहिर है इसलिए किया गया होगा कि लोग ऐसा चाहते हैं.

किसे है फ़िक्र

क्या मुंबई की फ़िल्म इंडस्ट्री और फ़िल्म पंडित यह जानते हैं कि ईरानी लोग हिंदी फ़िल्मों में इतनी गहरी दिलचस्पी रखते हैं?

मेरे ख़्याल से हिंदी फ़िल्मों की ग्लोबल लोकप्रियता का हमें सिर्फ़ अंदाज़ा ही है. हम उसके स्वरूप, आकार और प्रभाव से निश्चिंत नहीं है क्योंकि ऐसा कोई गंभीर अध्ययन नहीं किया गया है.

 क्या हमारी ये ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि हिंदी फ़िल्मों में अथाह दिलचस्पी लेने वाले देशों और लोगों की आकांक्षाओं को समझा और पूरा किया जाए? क्या हम इस संबंध में कोई नीति नहीं बना सकते?

क्या हमारी ये ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि हिंदी फ़िल्मों में अथाह दिलचस्पी लेने वाले देशों और लोगों की आकांक्षाओं को समझा और पूरा किया जाए? क्या हम इस संबंध में कोई नीति नहीं बना सकते?

तेहरान में एक बुकशॉप में फ़ारसी फ़िल्मी अख़बार ‘बानी फ़िल्म’ के मुखपृष्ठ पर पहेली फ़िल्म में शाहरूख ख़ान की आठ कॉलम में छपी तस्वीर और साप्ताहिक फ़िल्मी पत्रिका ‘सिनेमा’ में हिंदी फ़िल्मों पर लेख, टिप्पणी और दीगर जानकारियाँ पढ़कर लगा कि अगर हम लोग इन सबकी उपेक्षा कर रहे हैं तो अपना ही नुक़सान कर रहे हैं.

दुखद बात यह है कि ईरान में हिंदी फ़िल्मों के कारोबार से मुंबई के फ़िल्म उद्योग को एक पाई नहीं मिलती. यह सब ग़ैरक़ानूनी व्यापार है.

हिंदी फ़िल्मों की सीडी दुबई से ईरान ‘स्मगल’ की जाती है और यहाँ आकर घर-घर में फैल जाती हैं.

करोड़ों डॉलर का नुक़सान उठा रहा है हिंदी फ़िल्म उद्योग. क्या इस संबंध फ़िल्म जगत या भारत सरकार के पास कोई समझ या कोई नीति है?

फ़िल्म निर्देशक और निर्माता तो अवश्य ही असहाय महसूस करते हैं कि यह सब उनके बस की बात नहीं है. अपनी फ़िल्मों की कालाबाज़ारी पर वे सिर्फ़ आँसू ही बहा सकते हैं क्योंकि ईरान से किसी अंतरराष्ट्रीय कॉपीराइट समझौते को स्वीकार नहीं किया है.

सूझबूझ

भारतीय सिनेमा
फ़िल्में दुबई के रास्ते ईरान पहुँचती हैं.

हिंदी फ़िल्म उद्योग और भारत के हित में क्या यह नहीं किया जा सकता कि भारत और ईरान के बीच इस संदर्भ में एक द्विपक्षीय समझौता किया जाए.

ईरान अंतरराष्ट्रीय संगठनों में यूरोप और अमरीका के वर्चस्व के कारण सम्मिलित नहीं होता पर भारत के द्विपक्षीय समझौते पर तो विचार कर ही सकता है.

इसके अतिरिक्त ईरान में फ़िल्म महोत्सव, फ़िल्मी हस्तियों के कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं. फ़िल्मों को मुंबई में ही फ़ारसी में ‘डब’ किया जा सकता है.

ये तमाम काम है जो फ़िल्म उद्योग के हित में भारत सरकार यदि चाहे तो कर सकती है, पर असली बात तो यह है कि दरवाज़ा कौन खोले?

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