| हिंदी फ़िल्मों को लेकर रही शिकायतें | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछले दस दिनों से भारत की राजधानी में चल रहा सातवाँ एशियाई फ़िल्म समारोह रविवार को देर रात ख़त्म हो गया. 15 जुलाई से शुरू हुए इस समारोह में इस बार 125 से भी ज़्यादा फ़िल्मों को शामिल किया गया था. वैसे इस सातवें एशियाई सिनेफ़ैन फ़िल्म समारोह में इस बार की सबसे ख़ास बात यह थी कि लोगों को शायद इतने बड़े पैमाने पर अरबी फ़िल्मों को देखने का यह पहला मौका मिला था. समारोह में 13 अरबी फ़िल्मों को शामिल किया गया था. भले ही इसे एशियाई फ़िल्म समारोह का नाम दिया गया हो पर फ़िल्मों के चयन से समारोह अंतरराष्ट्रीय रूप लेता नज़र आया. समारोह में चीन, ताइवान, थाईलैंड, इंडोनेशिया, अफ़गानिस्तान, पेरिस, जापान, इज़्राइल, फ़िलिस्तीन, श्रीलंका, ब्रिटेन, ईरान, अरब देशों, अमरीका जैसे तमाम देशों की फ़िल्में भारत आईं. चीनी फ़िल्म निर्देशक वाँग ज़ियाओ की 'शांघाई ड्रीम्स' से शुरू हुए इस समारोह का समापन बुद्धदेव दासगुप्ता की नई फ़िल्म 'कालपुरुष' के प्रदर्शन से हुआ. समारोह की सबसे बड़ी उपलब्धि यह भी रही कि सत्यजीत रे की फ़िल्म 'पाथेर पांचाली' की मूल प्रति कान फ़िल्म समारोह में प्रदर्शन के बाद अब भारत आ गई है और समारोह में इसे दिखाया भी गया. पुरस्कार समापन समारोह में चयनित फ़िल्मों को पुरस्कार भी दिए गए. इसमें एशियाई फ़िल्मों की प्रतियोगिता में इंडोनेशिया की 'रिंदू कामि पद्मू' को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का ख़िताब दिया गया.
वहीं ईरानी फ़िल्म 'टियर ऑफ़ द कोल्ड' के कलाकार, पारसा पिरोज़फर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ख़िताब हासिल हुआ. सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए चीनी फ़िल्म 'पीकॉक' की झाँग जिंग चाओ को पुरस्कृत किया गया. इसी वर्ग में शामिल फ़िल्म 'द फ़ोरसेकन लेंड' को स्पेशल ज्यूरी अवार्ड दिया गया. समारोह में दूसरे वर्ग में भारतीय फ़िल्मों का चयन किया गया जिसमें जहर कानूनगो की फ़िल्म 'नि:शब्द' को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और इसी फ़िल्म के लिए तृण नीलिना बनर्जी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का ख़िताब मिला. संदीप सरकार की बांग्ला फ़िल्म, 'निशी जापोन' के अभिनेता सव्यसाची चक्रवर्ती को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया गया है. स्पेशल ज्यूरी अवार्ड सुजीत सरकार की 'यहाँ' को दिया गया जबकि रूपा गांगुली के अभिनय को निर्णायकों ने सबसे ज़्यादा सराहा. वैसे तमाम पुरस्कारों के बीच एक पुरस्कार लाइफ़ टाइम अचीवमेंट के लिए भी था और यह पुरस्कार दिया गया जाने माने फ़िल्म विशेषज्ञ डोनाल्ड रिची को. डोनाल्ड रिची पिछले साठ सालों से फ़िल्म और उससे जुड़े विषयों पर लिखते आए हैं और जापानी सिनेमा को लेकर उन्होंने सबसे ज़्यादा काम किया है. डोनाल्ड ने जापानी फ़िल्मों पर काम 1948 में शुरू कर दिया था यानी दूसरे विश्वयुद्ध के तुरंत बाद और इस दौर में वहाँ के सिनेमा पर युद्ध के बाद के प्रभावों पर वा ख़ासी समझ रखते हैं. श्रद्धांजलि समारोह में दो महान फ़िल्मकारों को श्रद्धाजंलि भी दी गई. ये दो फ़िल्मकार, भारत से सत्यजीत रे और चीन से सियाओ सिएन हैं. समारोह में इन दोनों निर्देशकों की पाँच-पाँच फ़िल्मों का प्रदर्शन किया गया.
ग़ौरतलब है कि सत्यजीत रे की 'पाथेर पाँचाली' को बने इसी साल पचास साल पूरे हो गए हैं. इस फ़िल्म की मूल प्रति भारत में नहीं थी लेकिन इसबार अमरीका में मूल प्रति को संरक्षित किए जाने के बाद अब पाथेर पाँचाली भारत लौट आई है. समारोह के सेंटरपीस के रूप में प्रदर्शित इस फ़िल्म को देखने के लिए हज़ारों लोगों के साथ ही लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी भी पहुँचे. फ़िल्म देखकर भावूक हो गए सोमनाथ चटर्जी ने इसे ऐतिहासिक फ़िल्म और संरक्षित प्रतियों के भारत आने को ऐतिहासिक अवसर बताया. उन्होंने कहा कि वो सत्यजीत रे के काम के बड़े प्रशंसक रहे हैं और 50 साल पहले जब फ़िल्म बनी थी तब भी उन्होंने इसे देखा था. 'अ सिटी ऑफ़ सैडनेस' और 'डस्ट इन द विंड' जैसी नामी फ़िल्मों के प्रदर्शन से लोगों ने सियाओ सिएन के काम को भी याद किया. निराशा भारत में इस समारोह के आयोजन से जहाँ लोगों को काफ़ी खुशी हुई वहीं भारतीय फ़िल्मों और ख़ासकर हिंदी फ़िल्मों ने दर्शकों को सबसे ज़्यादा निराश भी किया. जहाँ विदेशों से आई ज़्यादातर फ़िल्मों को देखने के लिए दर्शकों को मारामारी करनी पड़ती थी वहीं ज़्यादातर हिंदी फ़िल्में लोगों को पसंद नहीं आईं. हालांकि सौरभ शुक्ला की 'हार्ट गोज़ शा..ला..ला..' और रुचि नारायण की 'कल' को लोगों ने सराहा. समापन समारोह में पहुँची मशहूर अभिनेत्री और भारतीय फ़िल्म सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष, शर्मिला टैगोर ने बीबीसी से बातचीत करते हुए कहा कि हिंदी फ़िल्मों के चिंताजनक होते प्रदर्शन के पीछे की एक वजह व्यावसायिकता की ओर हमारी दौड़ है. उन्होंने बताया, "अच्छी फ़िल्में बनाना अब ख़ासा मुश्किल होता जा रहा है क्योंकि पैसे की कमी है. अपने देश की तरह ईरान में मार्केटिंग और प्रचार का तनाव नहीं है इसलिए वो मुद्दों पर फ़िल्में बनाते हैं. हमारे यहाँ क्षेत्रीय फ़िल्मों जैसे बांग्ला और मलयाली फ़िल्मों में तो कुछ बेहतर हो रहा है पर हिंदी में नहीं." ख़ुद समारोह की आयोजक और फ़िल्म पत्रिका 'सिनेमाया' की संपादक, अरुणा वासुदेव ने माना कि हिंदी फ़िल्मों का स्तर अच्छा नहीं था. उन्होंने बताया कि समारोह तो वैसी ही फ़िल्में दिखाएगा, जैसी बनेंगी. इस समारोह में तमाम निर्देशकों और फ़िल्मकारों के बुलाया गया था ताकि वो अन्य देशों से आई फ़िल्मों को देखें और कुछ सीखें ताकि हिंदी फ़िल्मों के स्तर में भी सुधार हो सके. ख़ास विषय युद्ध एक बड़े विषय के तौर पर फ़िल्मों में इस्तेमाल हो रहा है, ऐसा इस समारोह से साफ़ हो गया.
ख़ासकर ईरान और फ़िलिस्तीन-इज़्राइल से आई फ़िल्मों, अरबी फ़िल्मों और अमरीकी फ़िल्मों में भी आतंकवाद और युद्ध एक बड़े विषय के तौर पर सामने आए. तमाम फ़िल्मों में युद्धों के औचित्य और उनके मानवीय सरोकारों पर सीधे संकेत किया गया और साथ ही मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर भी चर्चा की गई. इन फ़िल्मों को देखने आए लोगों से जब इनके विषयों के चयन पर बातचीत की तो उन्होंने इसे काफ़ी महत्वपूर्ण माना. लोगों के मुताबिक ऐसे विषयों पर काम करने की आवश्यकता भारत में भी है ताकि लोग केवल राष्ट्रीयता ही नहीं समझें, मानवता को भी समझें और यह जानें कि इससे किसको कितना फ़ायदा और नुकसान है. कुछ अच्छी उपलब्धियों तो कुछ छुटपुट विवादों के साथ यह समारोह समाप्त हो गया. |
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