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न्यूयॉर्क में एशियाई फ़िल्म समारोह | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका में रहने वाले एशियाई मूल के लोगों के लिए अपने इलाक़े, समाज और संस्कृति से जुड़ी फ़िल्में देखने का एक अच्छा मौक़ा है 28वां एशियाई-अमरीकी अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह जो इन दिनों न्यूयॉर्क में चल रहा है. शनिवार को शुरू हुए एशियाई फिल्मों के समारोह में भारतीय मूल के निर्देशकों और कलाकारों की फिल्मों को दर्शाया जा रहा है. इसमे करीब एक दर्ज़न फिल्में ऐसी हैं जिनमें या तो निर्देशक या कलाकार भारतीय मूल के हैं. न्यूयॉर्क के लोगों को इनकी फिल्में देखने का इंतज़ार भी था. इसके अलावा पाकिस्तानी, बंगलादेशी और श्रीलंकाई मूल के निर्देशकों-कलाकारों की फिल्में भी इस महोत्सव में शामिल हैं. इस अंतरराष्ट्रीय महोत्सव में दिखाई जाने वाली करीब अस्सी फ़िल्मों में ज़्यादातर फ़िल्में अँग्रेज़ी भाषा में हैं, और कुछ लंबी यानी दो घंटे के करीब, तो कुछ छोटी फ़िल्में जो आधे घंटे तक की हैं. बड़ी संख्या में लोग इस महोत्सव में अलग-अलग देशों की फ़िल्मों का आनंद लेने आ रहे हैं. इस समारोह की निदेशक डायना ली कहती हैं, "इस समारोह के ज़रिए हम फ़िल्म जगत में एशियाई मूल के कलाकारों की प्रतिभा को सामने लाना चाहते हैं जिसमें इन कलाकारों की कला को परवान चढ़ते देखा जा सकता है." पिंक लड्डू जो बेहतरीन फ़िल्में इस समारोह में दिखाई जा रही हैं उनमें भारतीय मूल के निर्देशक गौरव सेठ की फिल्म 'पिंक लडडू' भी शामिल है. इस फिल्म का लोगों को इंतज़ार भी है.
90 मिनट की इस फिल्म की कहानी में भारतीय मूल के लोगों में बच्चे के जन्म के समय लड़के की पैदाइश की ललक के बारे में बात की गई है. इस कहानी को हास्य और व्यंग्य के साथ मज़ेदार बनाया गया है. इसमें 'बेंड इट लाइक बेकम' में माँ का किरदार निभाने वाली शाहीन खान फिर माँ बनीं हैं. गौरव सेठ कहते हैं, "मैने इस फिल्म को इसलिए निर्देशन के लिए चुना क्योंकि इसमे भारतीय समाज के एक अहम मुददे की चर्चा की गई है, लेकिन थोड़े हास्य और व्यंग्य के साथ." जुलाई के अंत तक चलने वाले इस सालाना एशियाई फिल्म समारोह में फीचर फ़िल्में और वृत्तचित्र दोनों शामिल हैं. और इनमें हर तरह की फिल्में होंगी जिनमें सामाजिक सांस्कृतिक, राजनीतिक, हास्य या कॉमेडी और साइंस जैसे सभी विषय शामिल हैं. बॉलीवुड की अभिनेत्री नंदिता दास ने एक न्यूज़ीलैंड की फ़िल्म 'फ़्लीटिंग ब्यूटी' में मुख्य रोल निभाया है, उनकी यह फ़िल्म भी इस समारोह में शामिल है. अन्य दक्षिण एशियाई मूल के फ़िल्मकार जिनकी फ़िल्में इस अंतरराष्ट्रीय समारोह में शामिल हैं उनमें यास्मीन अहमद की 'सेपेट' भी चर्चा में है. बंगलादेशी मूल के निर्देशक शब्बीर हसन की 'प्रिटी', भारतीय मूल के निर्देशकों में नीलेश पटेल की 'द वेटर', नंदिनी सिकंद की 'इन हूज़ नेम', पॉल अंगनावाला की 'लाईब्रेरी मजनू', रानी ब्रेसलो की 'टर्मरिक वॉटर्स' और सोमन चैनानी की 'सुहाने सपने' भी शामिल है. इसके अलावा कई अन्य देशों के फ़िल्मकारों की फिल्में इस समारोह में शामिल हैं जैसे मलेशिया, इंडोनेशिया, जापान, ताईवान, कोरिया. |
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