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पेज-3 की संस्कृति और मधुर भंडारकर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हिंदी फ़िल्मों के निर्माता-निर्देशक मधुर भंडारकर की ज़िंदगी आजकल किसी फ़िल्म की कहानी की नक़ल नज़र आ रही है. उनकी नई फ़िल्म पेज-3 समाज के उच्च तबके की कहानी है जिसे सामाजिक मेल-मिलाप वाले आयोजन यानी पार्टियाँ करना बहुत पसंद होता है और कुछ अख़बारों का तीसरा पन्ना इसी तबके की संस्कृति की ख़बरें मिर्च-मसाला लगाकर छापता है. इसे पेज-3 संस्कृति के नाम से भी जाना जाता है. पश्चिमी देशों के छोटे पन्ने के कुछ अख़बार अपने तीसरे पन्ने के लिए ख़ासे चर्चित है और मुंबई में भी यह संस्कृति काफ़ी प्रचलित है. मधुर भंडारकर की नई फ़िल्म पेज-3 भी इसी संस्कृति पर आधारित है लेकिन मधुर भंडारकर जैसे ही अपनी फ़िल्म पूरा करने के क़रीब आते हैं तो ख़ुद को ही किसी पेज-3 की कहानी का चरित्र बना पाते हैं. एक मॉडल ने हाल ही में मधुर भंडारकर पर आरोप लगाया था कि उन्होंने उसे अपनी फ़िल्मों में भूमिका देने का वादा करके उसके साथ बलात्कार किया. मधुर भंडारकर ने इन आरोपों का खंडन किया है और उन्हें अग्रिम ज़मानत भी मिल गई है. ख़ुद पेज-3 इस मामले के सामने आने के बाद ख़ुद मधुर भंडारकर की कहानी से अब अख़बारों के तीसरे पन्ने भरे नज़र आ रहे हैं कि क्या वाक़ई मधुर भंडारकर के उस मॉडल से कोई रिश्ते थे?
मौजूदा विवाद के सामने आने से पहले ही मधुर भंडारकर ने बीबीसी संवाददाता से कहा था, "पेज-3 की कहानी में एक पत्रकार ऊँचे तबके की संस्कृति के अंदर झाँकने की कोशिश करता है, जो ऐसी पार्टियों को कवर करता है." पेज-3 ऐसे तबके पर नज़र डालती है जिसमें नए मॉडल, फ़ैशन डिज़ाइनर, संगीत की दुनिया के नए चेहरे और धनी पुरुष और महिलाएँ शामिल हैं. एक फ़िल्म लेखक अनिल धारकर कहते हैं, "यह नई बोतल में पुरानी शराब है." लेकिन जब टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार ने कुछ साल पहले इस पन्ने को शुरू किया था तो इसे काफ़ी 'बोल्ड' बताया था. देखा-देखी अन्य अख़बारों ने भी 'उच्च तबके की कि इस विशेष संस्कृति' के बारे में कुछ ऐसा ही लिखना शुरू कर दिया अपने तीसरे पन्ने पर. बहस मधुर भंडारकर की पेज-3 फ़िल्म ने समाज के उच्च तबके की संस्कृति और आदतों के बारे में एक नई बहस भी छेड़ दी है. सामाजिक कार्यकर्ता बंदना तिवारी कहती हैं, "अख़बारों के बाक़ी पन्नों पर तो दुनिया भर की ख़बरें होती हैं, लड़ाई की, ख़ूनख़राबे की वग़ैरा-वग़ैरा...यह इनसानी फ़ितरत है कि वे दूसरों की भूलों पर हँसकर अपना दिल हल्का करना चाहते हैं."
टाइम्स ऑफ़ इंडिया का कहना है कि लोग इसे पसंद करें या इससे नफ़रत करें लेकिन इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. अनिल धारकर कहते हैं, "ऐसे बहुत से लोग हैं जो अख़बार का सिर्फ़ तीसरा पन्ना पढ़ने के बाद ही उसे फ़ेंक देते हैं. ऐसे पाठकों में ख़ासतौर से युवक ज़्यादा होते हैं." बहुत से युवक-युवतियाँ तो यह स्वीकार भी करते हैं कि वे अख़बार सिर्फ़ तीसरा पन्ना पढ़ने के लिए ही ख़रीदते हैं. और मॉडलिंग और फ़ैशन की दुनिया में जगह बनाने के उत्सुक युवक-युवतियाँ तो तीसरे पन्ने के दीवाने होते हैं, उस पर जगह पाने और उसे पढने के लिए. |
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