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बुधवार, 22 दिसंबर, 2004 को 19:12 GMT तक के समाचार
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2004 में अंतरराष्ट्रीय सिनेमा

लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्स
लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्सः रिटर्न ऑफ़ द किंग का रहा बोलबाला
फ़िल्में सबसे ज़्यादा पैसा कमाती या गँवाती अमरीका में हैं.

इसलिए समसामयिक सिनेमा की व्यापारिक सफलता या विफलता के लिए हमें वहीं के नतीजे देखने होंगे, जिनके अनुसार 2004 में संसार की सबसे कामयाब फ़िल्मों के नाम इस तरह से हैं-

लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्सः रिटर्न ऑफ़ द किंग्स' (निर्देशकःपीटर जैक्सन), स्केअरी मूवी टू (डेविड टसुकर), द स्कूल ऑफ़ रॉक (रिचर्ड लिंकलेटर),'चीपर बाइ द डज़न’ (शॉन लेवी), 'हॉन्टेड मैंशन' (रॉब मिंकॉफ़), 'एलाँग केम पॉली' (जॉन हैम्बर्ग), 'मोनालिसा स्माइल, (माइक न्यूएल), 'स्टार्स्की एंड हच' (टॉड फ़िलिप्स),'द पैशन ऑफ़ द क्राइस्ट'(मैल गिब्सन), 'स्कूबी-डू 2' (राजा गोएवेल), 'किलबिलःवॉल्यूम 2'(क्वेंटिन टारांटीनो),'वान हेल्सिंग'(स्टीफ़न सोमर्स), 'ट्रॉय'(वोल्फ़गांग पैटरसन), 'द डे आफ़्टर टुमारो' (रोलांड एमेरिख़),'हैरी पॉटर एंड द प्रिज़नर ऑफ़ अज़्काबान' (अल्फ़ोंज़ो कुआरोन), 'श्रैक 21’ (एंड्रयू एडम्सन), 'स्पाइडरमैन 2' (सैम रेमी), 'किंग आर्थर' (अंत्वान फ़ूक्वा),'आइ, रोबोट' (एलेक्स प्रोयास)' 'द बोर्न सुप्रिमेसी’ (पॉल ग्रीनग्रास), 'द विलेज' (मनोज नाइट श्यामलन),'डॉजबॉल' (रॉसन मार्शल), 'द टर्मिनल' (स्टीवन स्पीलबर्ग), 'ओपन वॉटर' (क्रिस केंटिस), 'कोलैटरल'(माइकल मान), 'विंबलडनट (रिचर्ड लाँक्रेन), 'ब्राइड एंड प्रिज्युडिस' (गुरिंदर चड्ढा), 'शार्क टेल' (बीबो बर्जरॉन आदि) और 'द ग्रज' (ताकाशी शीकीज़ू).

गुरिंदर चड्ढा की फ़िल्म सिर्फ़ एक सप्ताह कमाई के शिखर पर रही और कुछ समीक्षकों ने उसकी तथा नायिका ऐश्वर्या राय के काम की आलोचना की.

इसके अलावा भारत से संबद्ध शायद कोई भी फ़िल्म 2004 में विश्व सिनेमा में अपनी उपस्थिति दर्ज़ नहीं करवा सकी.

सराहना

स्पाइडरमैन
स्पाइडरमैन की दूसरी कड़ी की सराहना हुई

इस वर्ष जिन 'मुख्यधारा' तथा 'कलात्मक' फ़िल्मों को व्यापक रूप से सराहा गया वे रहीं 'स्पाइडरमैन 2', 'श्रेक 2', 'द स्टेशन एजेंट' (टॉम मैक्कार्थी), 'मोटरसाइकिल डाररीज़' (वाल्तेर साल्येस), 'गार्डन स्टेट' (ज़ख़ ब्राफ़), 'पीसेज़ ऑफ़ एप्रिल' (पीटर हेजसे), 'वालेंतीन' (अलेखांद्रो अग्रेस्ती), 'शॉन ऑफ़ द डेड' (एड बाइ)' 'लॉस्ट इन ट्रांस्लेशन' (सोफ़िया कोपोला)', '21 ग्राम्स' (अलेखांद्रो गोंसालेस), 'ईटर्नल सनशाइन ऑफ़ द स्पॉटलैस माइंस' (मिशेल गोंद्री), 'फ़ाइंडिंग नेवरलैंड' (मार्क फोर्स्टर), 'शैटर्ड ग्लास' (बिली रे), 'द लास्ट लाइफ़ इन द यूनिवर्स' (पेन-एक रतनारुआंग) तथा 'स्टेज ब्यूटी' (रिचर्ड आयर).

जिन बहुप्रचारित फ़िल्मों से बहुत आशाएं थीं लेकिन जिन्होंने समीक्षकों और दर्शकों को निराश किया वे थीं 'एलिएन वर्सेस प्रिडेटर', 'द स्टैफ़र्ड वाइव्ज़', 'कैटवूमन', द बटरफ़्लाइ इफ़ैक्ट', 'ओपन वॉटर', 'सोल प्लेन', ' द विलेज', 'टूथ', 'प्रिंसिपल्स ऑफ़ लस्ट', 'सर्वाइविंग क्रिस्मस', 'बैड सैंटा', 'थंडरबर्ड्स', 'द ग्रज' तथा 'डॉगवील'.

अमेरिकी फ़िल्म-समीक्षकों का दावा है कि इस वर्ष उनके देश में 'द स्टेशन एजेंट', 'कॉफ़ी एंड सिगरेट्स' 'द गर्ल विथ ए पर्ल इयरिंग' सरीखी बेहतरीन और 'बिफ़ोर सनसेट' तथा 'ब्लाइंड फ़्लाइट' सरीखी अच्छी करीब 80 फ़िल्में बनीं.

जबकि सच शायद यह है कि माइकेल मूर का वृत्तचित्र 'फ़ारेनहाइट 9/11' सर्वाधिक प्रासंगिक तथा चर्चित रहा, भले ही राष्ट्रपति बुश दुबारा जीते हों, ईसा मसीह के जीवन के अंतिम कुछ घंटों पर आधारित आधारित फ़िल्म 'द पैशन ऑफ़ द क्राइस्ट' अपनी क्रूरता के कारण विवादास्पद रही.

'ईटर्नल सनशाइन ऑफ़ द स्पॉटलैस माइंड' को कल्पनाशील प्रेम-कहानी के लिए सराहा गया.

ब्रिटेन

ब्राइड एंड प्रिज्युडिस
गुरिंदर चड्ढा की फ़िल्म ब्राइड एंड प्रिज्युडिस ब्रिटेन में काफ़ी चली

इस वर्ष ब्रिटेन से भी कुछ अच्छी फ़िल्में आईं जिनमें किशोर-जीवन पर आधारित पावेल पाब्लिकोव्स्की की 'माइ समर ऑफ़ लव', माइकेल विंटरबॉटम की विज्ञान-कथा 'कोड 46' तथा शेन मीडोज़ की स्वतंत्र प्रतिशोध-कहानी 'डेड मैंस शूज़' चर्चित रहीं.

गुरिंदर चड्ढा भी ब्रिटिश फ़िल्म-निर्मात्री मानी जाती हैं. इनके अलावा अन्य प्रशंसित ब्रिटिश फ़िल्में 'वंडरस ऑब्लिविअन', 'वन फ़ॉर द रोड', 'द स्टेटमेंट' तथा 'सूज़ी गोल्ड' रहीं.

फ्रांस ने इस वर्ष भी शायद यूरोप की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण फ़िल्में दीं जिनमें 'स्ट्रेंज गार्डंस','ला टेन', 'ऑलमोस्ट पीसफ़ुल', 'द बार्बेरिअन इंवेज़ंस', 'ले दि आब्ल','इंटिमेट स्ट्रेंजर्स', 'लुक एट मी', 'रैड लाइट्स', 'सों फ़्रैर', 'स्विच ब्लेड रोमांस', 'डॉ टी' तथा 'टू ब्रदर्स' उल्लेखनीय हैं, शाब्रोल की 'द फ़्लॉवर ऑफ़ ईविल' भी अपनी प्रतीकात्मक अपराध-कथा के कारण चर्चित रही.

वर्ष के प्रारंभ में रोत्तरदम फ़िल्म समारोह में सनसनी फैलाने वाली कातेरीन ब्राइला की फ़िल्म 'एनॉटॉमी ऑफ़ हैल' ने दर्शकों और समीक्षकों में मतभेद पैदा किए.

जापान और कोरिया

काल्पनिक नेत्रहीन समूराई पात्र ज़ातोइची पर आधारित ताकेशी कितानो की उसी नाम की फ़िल्म से इस वर्ष का रोत्तरदम फ़िल्म समारोह शुरू हुआ था.

स्वयं कितानो ने इसमें नायक की भूमिका निभाई है और उसे बहुत सराहा गया था.

'ज़ातोइची' अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफल है.

जापान की इस वर्ष की दूसरी चर्चित फ़िल्म 'पिंग-पाँग' रही.

लेकिन इधर कुछ वर्षों में दक्षिण कोरिया एक 'फ़िल्म-शक्ति' के रूप में उभर रहा है और इस साल जहाँ उसकी दो फ़िल्मों 'ओल्ड ब्वाँय' तथा 'ए टेल ऑफ़ टू सिस्टर्स' को पसंद किया गया वहाँ एक हत्यारे पूर्व-पुलिस वाले का चित्रण करने वाली 'दि आइल' तथा कई खूनों की जाँच कराने वाले एक प्रतिबद्ध पुलिस अफ़सर की कहानी 'मेमोरीज़ ऑफ़ मर्डर' को उत्कृष्ट फ़िल्में माना गया.

विदेशी फ़िल्में

द ड्रीमर्स
बर्नार्डो बर्तोलुची की फ़िल्म द ड्रीमर्स

ईरान की युवा फ़िल्म निदेशिका समीरा मख़मल बाफ़ की 'एट फ़ाइव इन दि आफ़टरनून' को सर्वत्र प्रशंसा मिली.

अफ़ग़ानिस्तान के निदेशक सिद्दीक़ बर्माक की पहली फ़िल्म 'ओसामा' को भी तालिबान-संस्कृति के उसके विरोध के कारण अंतरराष्ट्रीय सराहना मिली. यह उनकी पहली कथा-फ़िल्म थी.

इटली के ख्याति प्राप्त निदेशक बर्नार्डो बर्नार्डो बर्तोलुची इस वर्ष अपनी नई फ़िल्म 'द ड्रीमर्स' लेकर उपस्थित हुए थे.

उनके देश की तीन अन्य फ़िल्में -'फ़ेसिंग विंडो', 'गुड मॉर्निंग, नाइट' तथा 'द लास्ट किस' भी सराही गईं. कनाडा की 'द सैडेस्ट म्यूज़िक इन द वर्ल्ड' तथा 'ड्रैकुलाःपेजेज़ फ़्रॉम ए वर्जिंस डायरी' भी दर्शकों और समीक्षकों को पसंद आईं.

स्पेन ने 'टेक मान आइज़' तथा 'अंडर साइज ऑफ़ द बैड' से अपनी उपस्थिति दर्ज़ की.

जॉर्जिआ ('सिंस ओतार लेफ़्ट'), अर्जंटीना('वालेंतीन'), चीन ('हीरो'), ब्राज़ील ('कादांदीरू'), नॉर्वे '(किचन स्टोरीज़') मोरक्को ('1000 मंथ्स') तथा हंगरी ('कोंत्रोल') इस वर्ष सिर्फ़ एक-एक उल्लेखनीय फ़िल्म ही विश्व सिनेमा को दे सके. लेकिन ईरान और अफ़गानिस्तान के योगदान की तरह उन्हें भी बहुत सराहना मिली.

'सिंस ओतार लैफ़्ट' तीन पीढ़ियों की तीन औरतों की ओर उनके चहेते ओतार की कहानी है जो पेरिस में डॉक्टर है.

'वालेंतीन' एक ऐसा नौ वर्षीय लड़का है जिसकी माँ उसे छोड़कर चली गई है और वह उसे खोजने निकल पड़ता है.

'हीरो' प्राचीन वीरगाथा परंपरा की शौर्य-गाथा है. 'कारांदीरू' ब्राज़ील की उस कुख्यात घटना पर आधारित है जब एक जेल में अक्टूबर 1992 में 111 कैदी मार डाले गए थे. 'द लास्ट लाइफ़ इन दि यूनिवर्स में नायक केंजी आत्महत्या पर आमादा है लेकिन अचानक उसके घर में दो हत्याएँ हो जाती हैं और एक विक्षिप्त घटनाक्रम शुरू हो जाता है.

यूरोपीय फ़िल्में

द मोटरसाइकिल डायरीज़
चे गुएवारा के जीवन पर आधारित 'द मोटरसाइकिल डायरीज़' की काफ़ी सराहना हुई

रतनारुआंग की यह फ़िल्म यूनानी त्रासदी और ब्लैक कॉमेडी का अनोखा यौगिक है. 'इंटर्नल अफ़ेअर्स' पुलिस के आंतरिक षड्यंत्रों और तनावों की कहानी है.

'किचन स्टोरीज़' नॉर्वे में हुए ऐसे 'शोध-कार्य' पर आधारित है जिसमें शोधकर्ताओं को यह देखने के लिए भेजा गया था कि एकाकी पुरुष अपनी रसोई में क्या और कैसे काम करते हैं.

'1000 मंथ्स' मेहदी नामक एक सात वर्षीय लड़के की कहानी है जिसका पिता 'असहमति' के कारण जेल भेज दिया गया है और जो अपनी माँ और दादा के साथ मिलकर भयावह गरीबी और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष कर रहा है.

हंगरी की फ़िल्म 'कोंत्रोल' बुदापैश्त मेट्रो के टिकट-इंस्पैक्टरों की ऊब-भरी ज़िंदगी को चित्रित करती है जो अचानक एक प्रेम-प्रकरण तथा हत्याओं की एक श्रृंखला से जीवंत हो उठती है.

इस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म किसे कहा जा सकता है? शायद 'द मोटर साईकिल डायरीज़' पर सहमति हो, जो युवा चे गुएवारा के जीवन को विलक्षण विश्वसनीयता और स्नेह से चित्रित कहती है.

लेकिन अभी वर्ष का अंत हो ही रहा था कि महान यूनानी फ़िल्मकार थेओ आंगेलोपूलोस की नई कृति 'ट्रिलॉली द वीपिंग मीडो' आई जो एक फ़िल्म-त्रयी की पहली कड़ी है, 1919 से 1949 तक के यूनान की एक औरत एलेनी द्वारा जी गई गाता है, और जिसे तीन घंटे का महाकाव्य कहा गया है.

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