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नक़ली डीवीडी के ख़िलाफ़ अभियान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान में भारतीय फ़िल्में काफ़ी शौक से देखी जाती हैं लेकिन अब शायद यह शौक पूरा करने में फ़िल्म प्रेमियों को कुछ दिक्कतें आएं. पाकिस्तान में भारतीय फ़िल्में ज़्यादातर चोरी से ही देखी जाती हैं, यानी फ़िल्मों की कैसेट या डीवीडी चोरी से बनाई जाती हैं मगर अब बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव की वजह से ऐसा करना शायद मुमकिन ना हो. पाकिस्तानी अधिकारियों ने कॉपीराइट अधिकारियों का उल्लंघन करते हुए चोरी से डीवीडी बनाने वाले लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करना शुरू किया है. पाकिस्तान की संघीय जाँच एजेंसी (एफ़आईए) ने पिछले सप्ताह कराची में कुछ दुकानों पर अचानकर छापे मारकर भारतीय फ़िल्मों की एक लाख से भी ज़्यादा नक़ली डीवीडी बरामद की हैं. इतना ही नहीं एक बड़ी दुकान से दो क़रीब दो लाख ख़ाली सीडी भी बरामद की गईं. उस दुकान को सील कर दिया गया और उसके मालिकों को हिरासत में ले लिया गया. लेकिन फ़िल्म जगत के जानकार सरकार की इस कार्रवाई को शक की नज़र से देखते हैं और उनका कहना है कि एक समय के बाद अंग्रेज़ी फ़िल्मों से तो दिलचस्पी कम हो सकती है लेकिन भारतीय फ़िल्मों के बारे में ऐसा नहीं होगा. गहरी पैठ पाकिस्तान में भारतीय फ़िल्मों ने गहरी पैठ बना रखी है और वहाँ के लोग इनके दीवाने से नज़र आते हैं. डीवीडी के कारोबार में लगे एक व्यवसायी ख़ालिद जान मोहम्मद कहते हैं, "पाकिस्तान में यह सिलसिला तब शुरू हुआ था जब 1970 के दौर में वीसीआर चलन में आया था. उस वक़्त किसी ने भी कॉपीराइट जैसी किसी चीज़ का नाम नहीं सुना था."
यही वह दौर था जब खाड़ी देशों में रहने वाले बहुत से पाकिस्तानियों ने हज़ारों की संख्या में वीसीआर भेजना शुरू किया था और देखते ही देखते वीसीआर ने लोगों की ज़िंदगी में अच्छी ख़ासी जगह बना ली थी. वीसीआर घरों, दुकानों, यहाँ तक बसों में भी नज़र आने लगा था. भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 में हुई लड़ाई के बाद पाकिस्तान में भारतीय फ़िल्मों सिनेमाघरों में दिखानी बंद हो गई थीं और एक ऐसा दौर आया जब भारतीय फ़िल्में वीसीडी या डीवीडी के रूप में हर दुकान पर मिलने लगीं. कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि पाकिस्तान सरकार ने तब ध्यान क्यों नहीं दिया जब भारतीय फ़िल्मों की चोरी से वीडियो कैसेट बनकर धड़ल्ले से आ रही थीं. एक महिला सामाजिक कार्यकर्ता निगहत सईद ख़ान इसका एक बहुत ही दिलचस्प कारण बताती हैं. वह कहती हैं, "जनरल ज़ियाउल हक़ का शासन बहुत ही दमनकारी था, एक सांस्कृतिक दुष्वप्न जैसा. उसकी एक नीति थी लोगों को घरों तक ही महदूद रखना." "जनरल ज़ियाउल हक़ की नज़र में किसी सार्वजनिक स्थान पर मनोरंजन का ऐसा तरीक़ा इस्लाम के ख़िलाफ़ था जहाँ औरत और मर्द एक जगह इकट्ठा हो सकें." निगहत सईद ख़ान कहती हैं कि ऐसे माहौल में वीसीआर एक चमत्कार की तरह लोगों की ज़िंदगी में आया जिसने बहुत जल्दी ही पक्की जगह बना ली. सोची समझी नीति! कुछ लोग यह भी कहते हैं कि उस वक़्त की सरकार ने भारतीय फ़िल्मों की चोरी से बनाई जाने वाली वीडियो कैसेटों को जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया.
पाकिस्तान में ईएमआई के अध्यक्ष अमीद रियाज़ कहते हैं, "मेरा पक्का ख़याल है कि भारतीय फ़िल्मों की चोरी की छूट देना एक राजनीतिक नीति थी क्योंकि भारत को किसी भी तरह का आर्थिक नुक़सान पहुँचाना उस नीति का एक हिस्सा था." यह महज़ इत्तेफ़ाक नहीं कहा जा सकता कि कॉपीराइट का एक छोटा सा क़ानून पहली बार 1962 में बना लेकिन उसमें भी भारतीय बौद्धिक संपदा को शामिल नहीं किया गया. अब सरकार ने भारतीय फ़िल्मों की नक़ली डीवीडी को रोकने के लिए फिर से अभियान चलाया है जिससे आम लोगों में नाराज़गी बढ़ सकती है. 1980 के दौर में जब वीडियो कैसेट किराए पर देने का कारोबार चला तो उससे बहुत से लोगों को रोज़गार मिला और इस कारोबार में पाँच लाख से भी ज़्यादा लोग रोज़ी-रोटी कमा रहे हैं. भारतीय फ़िल्मों का पाकिस्तानी समाज में इतना असर नज़र आता है कि बहुत से प्रभावशाली लोग किसी ख़ास हिंदी फ़िल्म में दिखाए गए शादी के सैट बनवाना पसंद करते हैं. यहाँ तक कि कुछ मौलवी भी अपने मज़हबी तरानों को बॉलीवुड फ़िल्म के गीत की धुनों पर गाते हैं ताकि उन्हें लोग पसंद कर सकें. अधिकारी भी दबी ज़ुबान स्वीकार करते हैं कि भारतीय फ़िल्मों की चोरी रोकना एक टेढ़ी खीर साबित होगी. |
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