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एक जनगीत का होना सौ बरस का | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जनगीत वो होता है जो जन-जन की ज़ुबान पर बसा हो और इस नज़रिए से देखें तो अल्लामा इक़बाल का लिखा हुआ गीत 'सारे जहाँ से अच्छा...' सही मायनों में एक जनगीत है. तभी तो यह गीत पूरे सौ बरस का हो गया और अब भी यह लोगों की ज़बान पर बसा हुआ है. एक स्कूली बच्चे से लेकर एक फ़ौजी तक सभी को अपने देश की विशेषता बताने के लिए आज भी 21 अप्रैल 1904 को पहली बार गाया गया यह गीत याद आता है. तभी तो महात्मा गाँधी से लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक सभी 'सारे जहाँ से अच्छा...' गाते रहे हैं और जब अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय राकेश शर्मा से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने पूछा था कि अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखाई देता है तो उनका जवाब था, 'सारे जहाँ से अच्छा...' और हाल ही में मुज़फ़्फ़राबाद से श्रीनगर के बीच बस चली तो पूरे रास्ते भर पोस्टर लगे हुए थे, 'मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना...' और साथ में थी अल्लामा इक़बाल की तस्वीरें. दिल में बसा गीत हालाँकि इन बरसों में इस बात को लेकर बहुत बहस चली कि 'सारे जहाँ से अच्छा...' लिखने वाले अल्लामा इक़बाल ने तो देश के बँटवारे की वकालत की थी और वह मुस्लिम लीग के समर्थक थे लेकिन इन विवादों ने इस गीत की लोकप्रियता पर कोई आँच नहीं आने दी. साहित्यकार और समीक्षक गोपीचंद नारंग कहते हैं कि यह गीत लोगों के दिलों में बसता है. ऐसा क्या है इस गीत में जिसकी वजह से यह जन गीत बन गया? इस सवाल के जवाब में उर्दू के सुपरिचित साहित्यकार शमशुल रहमान फ़ारूक़ी कहते हैं, "इसके दो बड़े कारण हैं, एक तो इस गीत में वतन की मोहब्बत का जो जज़्बा हर पंक्ति में भर दिया गया है उस पर किसी को शक नहीं हो सकता. दूसरा इसमें पूरे देश की ख़ासियत को अच्छी तरह पिरोया गया है." नारंग कहते हैं कि इसके बाद एक बड़ा कारण यह भी बना कि इक़बाल के गीत आसानी से गाए जा सकने वाले थे चाहे वे कठिन हों या आसान. फिर ये गीत तो आसान ही था. विवाद एक ओर 'सारे जहाँ से अच्छा...' की लोकप्रियता को लेकर कोई विवाद नहीं है तो दूसरी ओर ये बड़े विवाद का विषय रहा है कि डॉक्टर अल्लामा इक़बाल ने देश के विभाजन की वकालत की थी. शमशुल रहमान इसे सही नहीं मानते. वह कहते हैं, "इसमें शक है कि वह दो देशों के पक्षधर थे. दो क़ौमों की बात को दो देशों की बात नहीं कहा जा सकता क्योंकि क़ौम को हम समाज के रुप में देखते रहे हैं. वह तो एक संघीय ढाँचे के पक्षधर थे जिसमें मुसलमानों के लिए स्वायत्तता वाले इलाक़े चाहते थे न कि अलग राष्ट्र." उनकी राय से गोपीचंद नारंग भी इत्तेफ़ाक रखते हैं और कहते हैं, "इक़बाल मुसलमानों के लिए एक अलग सूबा चाहते थे, अलग देश नहीं. वह हिंदुस्तानी थे और 1938 में हिंदुस्तानी ही मरे." लेकिन 'सारे जहाँ से अच्छा...' इतना राष्ट्रप्रेम से भरा लोकप्रिय गीत था तो फिर उसे राष्ट्रगीत क्यों नहीं बनाया गया? यह सवाल भी शायद इसी विवाद से जुड़ा हुआ है. पहली बार हिंदुस्तान की सांस्कृतिक, सामाजिक विविधता और भौगोलिक महत्ता को सटीक रुप से परिभाषित करने वाले इस गीत की रचना का इतिहास भी दिलचस्प है. गोपीचंद नारंग ने बीबीसी को बताया कि 1904 में अल्लामा इक़बाल युवा थे और एक कॉलेज में प्रोफ़ेसर हुआ करते थे. उनके एक शिष्य लाला हरदयाल ने अमरीका में ग़दर पार्टी बनाई थी. लाहौर में उन्होंने यंगमेन्स इंडियन एसोसिएशन बनाया था. इस संस्था के एक आयोजन में उन्होंने अल्लामा इक़बाल को बुलाया था. वह कोई राजनीतिज्ञ तो थे, न ही कवि थे और वहाँ इक़बाल एक गीत लिखकर ले गए थे. उन्होंने 'सारे जहाँ से अच्छा...' वहाँ गाया और वहाँ मौजूद मोहम्मद उमर ने उसे जैसे-तैसे नोट करके कहीँ छपवा दिया. बाद में इक़बाल ने इस गीत में सुधार किए. फिर यह तथ्य भी अपने आपमें दिलचस्प है कि इस गीत की जो धुन अभी हम सुनते हैं, जिसे भारतीय सेना का बैंड बजाता है या जो मोबाइल की रिंग टोन में आती है उसे पंडित रविशंकर ने तैयार किया है. बहरहाल एक जनगीत सौ बरस का हो गया है और इसकी लोकप्रियता बताती है कि यह इसी तरह आने वाले बरसों में भी गाया-सुना जाता रहेगा. |
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