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गुरुवार, 23 सितंबर, 2004 को 04:50 GMT तक के समाचार
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अपराध की चपेट में राष्ट्रकवि दिनकर का गाँव

दिनकर
दिनकर की मूर्ति तो है सिमरिया में, लेकिन उनके विचारों की सुध लेने वाला कोई नहीं
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का गाँव सिमरिया सरकारी दस्तावेज़ों में एक आदर्श गाँव है, लेकिन आज यहाँ कोई सामाजिक आदर्श नज़र नहीं आता है.

बिहार के बेगूसराय ज़िले के इस गाँव में स्वास्थ्य और पेयजल की परियोजनाएँ सफ़ेद हाथी साबित हो रही है.

18 साल पहले सरकार द्वारा आदर्श ग्राम घोषित सिमरिया में सड़कों और विद्यालयों की स्थिति दयनीय है.

दिनकर 97 साल पहले 23 सितंबर को जिस घर में पैदा हुए थे वो खंडहर में तब्दील हो चुका है.

और अब विकास की बात तो दूर सिमरिया में अपराध का बोलबाला हो गया है और असामाजिक तत्त्वों के आपसी वर्चस्व की लड़ाई और रंगदारी आदि के कारण पिछले कुछ वर्षों में अनेक ग्रामीण मारे जा चुके हैं.

जहाँ राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत दिनकर के ओजस्वी गीतों के बोल गूंजा करते थे आज वहाँ बंदूकों की तड़तड़ गूँज रही है.

जहां साहित्य की सुगंध और राष्ट्रीयता की बयार बहती थी, वहाँ की आबोहवा में बारुद का धुआँ और कारतूस की गंध है.

अपराध भूमि

दिनकर का गाँव सिमरिया अपराधियों के कारनामों से जल रहा है, लोग दहशत में हैं.

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यहीं पैदा हुए थे दिनकर

अपराधियों के भय से इस समय गाँव के साधन संपन्न 40-50 परिवार गाँव छोड़ ज़िला मुख्यालय बेगूसराय और अन्य जगहों पर रह रहे हैं.

बरौनी थाना में उपलब्ध रिकार्डो के अनुसार 1980 के दशक से अब तक सिमरिया से जुड़े हत्या के 35 मामले दर्ज है.

दिनकर जी के भतीजे रामनरेश सिंह बताते हैं कि गाँव में कुछ असामाजिक तत्त्वों के कारण अशांति फैली हुई है.

वे बताते हैं कि कैसे दिनकर जी ने गाँव में एक हत्या हो जाने के बाद दुखी होकर सिमरिया आना ही छोड़ दिये थे, और लोगों के काफी मान-मनौवल के बाद वे छह वर्ष बाद गाँव आए थे.

गाँव के मुखिया कृष्ण कुमार शर्मा के अनुसार हत्या के दौर में कुछ समाजसेवी और किसान भी मारे जा चुके हैं.

उनके अनुसार प्रशासन सिर्फ खानापूर्ति ही करता रहा है.

गिरोह

इन दिनों यहाँ बिंदू सिंह और राजेन्द्र सिंह उर्फ़ जनमलका के गिरोह सक्रिय हैं.

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प्रशासन शांति की गारंटी ले तो जनमलका हथियार छोड़ने को तैयार

एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे इन गिरोहों के लोगों के आपसी वर्चस्व की लड़ाई में कई निर्दोष लोग भी मारे गए हैं.

एक सुनसान जगह पर हुई बातचीत में जनमलका ने कहा कि जो लोग सिमरिया के विकास में बाधक बने हुए हैं, अशांति फैलाने की कोशिश की है, उन्हीं के ख़िलाफ़ उन्होंने 30 वर्ष पूर्व बंदूक उठाई.

वे कहते हैं कि यदि प्रशासन सिमरिया में शांति की गारंटी ले तो वे आत्मसमर्पण तो क्या जान भी देने को तैयार है.

बेगूसराय के आरक्षी अधीक्षक सुनील कुमार झा ने सिमरिया की आपराधिक गतिविधियों के सवाल पर कहा कि वो इस इलाक़े में नए हैं और मामले के अध्ययन के बाद इस पर विस्तार से बात कर सकेंगे.

हिंदीसेवी

स्थानीय साहित्यकार डा. आनंद नारायण शर्मा के अनुसार दिनकर राष्टीय भावनाओं के ऐसे कवि थे जिन्होंने पराधीनता काल में देश को जगाने का प्रयास किया और स्वाधीनता बाद के युग में समाज में व्याप्त विषमताओं पर प्रहार किया.

उन्होंने भारतीय संस्कृति की विशदता को अपने काव्य और गद्य दोनों से उभारा.

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प्रशासन की अक्षमता को दोष देते हैं मुखिया कृष्ण कुमार शर्मा

डॉ. शर्मा कहते हैं, "दिनकर एक ऐसे कवि थे, जिन्होंने युग के साथ अपने को बदला और काव्य की नयी भूमि को अच्छी तरह मापा."

वह कहते हैं,"दिनकर केवल राष्टीय विचारों के ही संवाहक नहीं थे, उन्होंने जीवन के कोमल पक्ष को भी बड़ी मार्मिकता से प्रस्तुत किया, जैसे अपनी कृति उर्वशी में."

डा. शर्मा कहते हैं दिनकर प्रयोगवाद के प्रवक्ता न होकर भी अपने साहित्य में निरंतर प्रयोगशील थे.

'प्रणभंग' से 'हारे को हरिनाम' तक की दूरी केवल दिनकर के कवि व्यक्तित्व के विकास को ही रेखांकित नही करती, इसके माध्यम से हिन्दी कविता की आधी शताब्दी का इतिहास पढ़ा जा सकता है.

डॉ. शर्मा 'परशुराम की प्रतीक्षा' की इन पंक्तियों का उदाहरण देते हैं कि कैसे दिनकर ने देश के प्रसुप्त पौरूष के जागरण के लिए शंखनाद करने के साथ ही शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार, जातिवाद, और भाई-भतीजावाद पर करारा प्रहार भी किया-

"घातक है जो देवता सदृश दिखता है/ लेकिन कमरे में ग़लत हुक़्म लिखता है/ जिस पापी को गुण नहीं, गोत्र प्यारा है/ समझो, उसने ही हमें यहाँ मारा है."

बहरहाल, दिनकर के गाँव सिमरिया में अपराध की छाई बदरी कब हटेगी यह तो आनेवाला समय ही बतायेगा लेकिन विकास आदि को देख तथा नेताओं की घोषणाओं के मद्देनज़र वर्षों पूर्व दिनकर द्वारा लिखित पंक्तियाँ अक्षरशः सही साबित हो रही है-

"तुमने दिया देश को जीवन, देश तुम्हें क्या देगा/ अपनी आग तेज़ करने को, नाम तुम्हारा लेगा."

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