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अमृता प्रीतम के साथ है उनका पाठक संसार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पंजाबी साहित्यकार अमृता प्रीतम को पद्मविभूषण देना तो सरकार को याद रहा लेकिन उनके उपस्थित न हो पाने पर सम्मान उनके घर तक पहुँचाना याद नहीं रहा. अमृता प्रीतम के समकालीन लेखक मित्र तो मानों उन्हें भुला ही चुके हैं. लेकिन उनके साथ है उनका विशाल पाठक संसार और उनके साथी इमरोज़. 85 वर्ष की हो चुकीं अमृता प्रीतम पिछले दो साल से बीमारी से जूझ रही हैं और अपने कमरे में पड़े एक अदद पलंग तक सिमट कर रह गई है उनकी ज़िंदगी. जनवरी 2002 में वे अपने ही घर में गिर पड़ी थीं और तब से चारपाई ने उन्हें नहीं छोड़ा है. उनकी उम्र इतनी ज़्यादा हो चुकी है कि अब उनका दोबारा ऑपरेशन संभव नहीं हैं और ऐसा लगता है कि अमृता प्रीतम अब जीवन की सांध्यबेला की ओर बढ़ रही हैं. दुःख के इन क्षणों में अमृता प्रीतम के साथ हैं इमरोज़ जो पिछले 40 सालों से उनके साथ रह रहे हैं और हर पल उनकी देखरेख में लगे हैं. इमरोज़ बताते हैं कि इन दो सालों में कोई भी समकालीन लेखक अमृता की सुध लेने नहीं आया और न ही किसी ने हाल-चाल पूछने की ज़रूरत समझी. पर इमरोज़ ख़ुद इसे लेकर निराश नहीं है. वह कहते हैं, "हमारे लिए तो अमृता के पाठक ही सब कुछ हैं. पाठक आज भी उन्हें याद करते हैं और बड़े चाव के साथ आज भी अमृता की रचनाएँ पढ़ते-सुनते हैं. हमारे लिए यही सबसे बड़ी बात है. फिर तमाम समकालीन याद करें या न करें, हमें इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता." सम्मान इस तरह पिछले दिनों देश की जिन शीर्ष हस्तियों को पद्मविभूषण सम्मान से नवाज़ा गया उनमें एक नाम अमृता प्रीतम का भी था. विडंबना यह थी कि अमृता प्रीतम अपनी ख़राब हालत की वजह ये सम्मान लेने जा नहीं सकती थीं और सरकार को भी न तो सम्मान बाँटते वक़्त अमृता प्रीतम की याद आई और न ही किसी ने उन तक यह सम्मान पहुँचाने की ज़रूरत ही समझी. हालाँकि जब भारतीय समाचार पत्रों में इसकी ख़बरें छपीं तो आनन-फानन में सरकार के एक सचिव अमृता प्रीतम को उनके घर पर ही ये सम्मान दे आए. पर इन सब से बेख़बर अमृता सूजी का उपमा और ग्लूकोज़ के घोल के सहारे अपने दिन गुज़ार रही हैं. इमरोज़ बताते हैं कि अमृता को आजकल न तो इतनी चेतना है और न ही उन्हें कभी ईनाम की चाहत ही रही. अमृता आजकल बहुत ऊँचा सुनने लगी हैं और बोलना तो एकदम न के बराबर रह गया है, फिर भी कभी-कभी उनका मन करता है तो बुल्लेशाह और शाह हुसैन के सूफ़ियाना कलाम सुन लेती हैं. छूटा हुआ है कैनवस इमरोज़ एक अच्छे चित्रकार हैं पर अमृता की तबीयत ख़राब होने की वजह से आजकल उनकी कूची और कैनवस उनसे छूटा हुए हैं. इन हालात में क्या उन्हें कुछ भी न बना पाने का दुख होता है? ये पूछने पर इमरोज़ कहते हैं, "मैं अपनी कूची कमाई के लिए नहीं चलाता, अपने दिल की तसल्ली के लिए पेंटिंग करता हूँ और फिर आजकल तो अमृता ही मेरी पेंटिंग हैं जिन्हें मैं अपना पूरा वक़्त दे रहा हूँ." इसे अमृता के घर में बख़ूबी देखा भी जा सकता है. इमरोज़ लगभग हर क्षण अमृता के कमरे में ही रहते हैं और चारों ओर दीवारों पर अमृता के चित्रों को इमरोज़ ने काफ़ी करीने से सजा कर रखा है. अमृता प्रीतम को पंजाबी साहित्य की धरोहर के रूप में लोग जानते और चाहते हैं. पंजाबी साहित्य में उनका योगदान अतुलनीय है. इसका सहज अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमृता ही शायद पंजाबी की एकमात्र ऐसी लेखिका हैं जो केवल अपनी रचनाओं की रॉयल्टी पर ही अपना जीवन गुज़ार रही है. भारत और पाकिस्तान, दोनों ही देशों में अमृता के साहित्य को पढ़ने वालों की एक बड़ी संख्या है और एक कवि और लेखक के लिए उनके पाठकों से बढ़कर और क्या हो सकता है भला. |
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