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ज़िंदगी ने कुछ यूँ करवट बदली | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
फ्रांस में रहने वाले पाकिस्तानी अली अकबर ने न जाने कितने ऐसे दिन देखें है जब ज़िंदगी का मिज़ाज समझ में नहीं आता लेकिन अब वक़्त ने उनकी ज़िंदगी में कुछ निराले ही अंदाज़ में रंग भरे हैं. पिछले क़रीब तीस साल से फ्रांस में अख़बार बेचने का काम कर रहे अली अकबर के लिए यह कोई लॉटरी निकलने से कम नहीं है क्योंकि उन्होंने ऐसा कभी नहीं सोचा था कि कभी उनकी भी किसी महान व्यक्ति की तरह जीवनी लिखी जाएगी और प्रकाशित भी होगी. अली अकबर नाम का यह व्यक्ति पेरिस की सड़कों पर ला मोंडे नाम का अख़बार आवाज़ लगा - लगाकर बेचता है. अली अकबर की ख़ुशी का तब ठिकाना नहीं रहा जब सड़कों पर अख़बार बेचने का उनका अंदाज़ एक प्रकाशक को पसंद आ गया और उन्होंने अली अकबर की ज़िंदगी पर किताब छापने की पेशकश कर दी. अली अकबर तीस साल पहले पाकिस्तान से अवैध रूप से फ्रांस में दाख़िल हुए थे और वह अपना मुश्किलों से भरा बचपन वहीं छोड़ आए थे. अब वह कई साल से पेरिस की सड़कों पर दिलचस्प नारे लगा-लगाकर अख़बार बेचते हैं जिन्हें सुनकर लोग अख़बार ख़रीद लेते हैं. उनके नारों का एक अंदाज़ देखिए - "मोनिका (लेविंस्की) बुश से गर्भवती हैं" या फिर "ला पेन की हत्या हुई".
अली अकबर की इस जीवनी का नाम होगा - 'मैं दुनिया को हँसाता हूँ लेकिन यह दुनिया मुझे रुलाती है'. अली अकबर ने बीबीसी से कहा, "यह लोगों को हँसाने की एक कोशिश होती है. मैं कोई अमीर आदमी बनने या धन-दौलत कमाने के लिए यह काम नहीं करता हूँ, मैं सिर्फ़ लोगों को हँसाने के लिए और उन तक यह अख़बार पहुँचाने के लिए यह काम करता हूँ." लंबा सफ़र अली अकबर बताते हैं कि वह पाकिस्तान में बचपन में सड़क पर लोगों के जूते चमकाने काम करके रोज़ी-रोटी कमाते थे. छह साल की उम्र में एक आदमी ने अली अकबर से संपर्क किया और कहा कि वह इतनी कम उम्र में काम क्यों करता है. जब अली अकबर ने अपनी मजबूरी बयान की तो उस आदमी ने कहा कि अगर वह स्कूल नहीं भी जाता है तो कम से कम उर्दू और अंग्रेज़ी तो सीख ही सकता है. "हर दिन लिखा-पढ़ा करो, अपनी डायरी लिखो-जो भी कुछ तुम्हारी ज़िंदगी में होता है, कौन जाने एक दिन तुम एक लेखक बन जाओ." अली अकबर ने उस आदमी की सलाह मान ली और अपने साथ घटने वाली घटनाओं के बारे में डायरी लिखने के साथ-साथ आसपास की घटनाओं को भी लिखना शुरू कर दिया. उसके बाद जब उसकी उम्र 18 साल की हुई तो वह ग्रीस में एक जहाज़ पर वेटर का काम करने लिए रवाना हो गया.
अली अकबर ने बीबीसी को बताया कि उसका ख़्वाब किसी अंग्रेज़ी भाषी देश में बसना था जैसेकि ब्रिटेन, अमरीका या फिर कनाडा लेकिन चूँकि इन देशों में उसका कोई संपर्क नहीं था इसलिए 1972 में जब जहाज़ फ्रांस पहुँचा तो वह उससे उतर गया. पेरिस में शुरू में उसने एक पुल के नीचे वक़्त गुज़ारा. वहाँ अर्जेंटीना के कुछ छात्रों से उसकी मुलाक़ात हुई जिन्होंने उसे पचास अख़बार बेचने के लिए दिए. अली अकबर ने अपने मज़ाहिया अंदाज़ का सहारा लेते हुए बस कुछ ही घंटों में वो अख़बार बेच दिए. बस अली अकबर का यही अंदाज़ प्रकाशक एडीशन गावसेविच को पसंद आया और उन्होंने अकबर को पेशकश कर डाली कि वह अपनी जीवन कहानी लिख डालें जिसे एक किताब के रूप में प्रकाशित किया जाएगा. अली अकबर कहते हैं कि उन्हें इस अंदाज़ में अख़बार बेचना बहुत अच्छा लगता है, "मुझे लोगों के बीच रहना अच्छा लगता है. मैं जब सड़कों पर होता हूँ तो बहुत आज़ाद महसूस करता हूँ.जब में सड़कों पर अख़बार बेचता हूँ तो भिन्न-भिन्न लोगों से मुलाक़ात होती है." "मैं कोई व्यावसायिक आदमी नहीं हूँ, मैंने कोई डिग्री या डिप्लोमा भी नहीं किया है इसलिए मुझे कोई अच्छी नौकरी नहीं मिल सकी." |
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