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संस्कृति की सीख कठपुतली के सहारे
क्या आप भारत से बाहर रहने वाले भारतीय हैं? क्या आप चाहते हैं कि आपके बच्चे भी भारतीय संस्कृति से उसी तरह जुड़े रहें जिस तरह आप जुड़े हैं? अगर इन दोनों सवालों का जवाब हाँ है तो चेन्नै की एस सीतालक्ष्मी आपकी मदद ज़रूर कर सकती हैं. सीतालक्ष्मी के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है लेकिन एक ऐसी कला ज़रूर है जिसकी मदद से आप अपने बच्चों को भारतीय इतिहास, कला और संस्कृति की सीख दे सकें. सीतालक्ष्मी कठपुतलियों के माध्यम से रामायण, महाभारत और पंचतंत्र की रोचक कहानियाँ सुनाती हैं. चेन्नै स्थित इंडियन पपेट्स नाम की संस्था की कर्ताधर्ता सीतालक्ष्मी ने कठपुतली और भारत के इतिहास का सुंदर संगम तैयार किया है.
पिछले अनेक वर्षों से कठपुतली का खेल दिखाने वाली सीतालक्ष्मी अपनी कला का प्रदर्शन दुनिया के अनेक देशों में कर चुकी हैं. हाल ही में उन्होंने स्पेन में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कठपुतली महोत्सव में भारत का प्रतिनिधित्व किया. इस कठपुतली महोत्सव के बाद उन्होंने यूरोप के कई देशों का दौरा करके वहाँ अपनी कला का प्रदर्शन किया. उनके प्रदर्शनों ने आप्रवासी भारतीयों के साथ-साथ यूरोपीय दर्शकों का भी मन मोह लिया. पेरिस में हुए एक ऐसे ही प्रदर्शन को देखने के लिए भारत भवन में भारी भीड़ जुटी जिसमें हर उम्र के लोग मौजूद थे.
यहाँ सीतालक्ष्मी ने रामायण का वह अंश दिखाया जिसमें बाली और सुग्रीव का युद्ध होता है, इसे दर्शकों ने तालियों की गूँज के साथ सराहा. एक पचीस वर्षीया फ्रांसीसी युवती ने कहा, "मुझे यह प्रदर्शन बहुत पसंद आया. मैं रामायण के बारे में नहीं जानती लेकिन इतना निराला प्रदर्शन पहले कभी नहीं देखा." इसी तरह दस वर्ष के रजत इस खेल को देखकर इतने उत्साहित हुए कि उन्होंने कठपुतलियाँ जमा करने का इरादा ज़ाहिर किया. सीतालक्ष्मी कहती हैं, "अगर आप पश्चिम को भारत की प्राचीन संस्कृति से परिचित कराना चाहते हैं तो रामायण और महाभारत से बेहतर शायद ही कुछ और हो." वे कहती हैं, "और फिर उनको कठपुतलियों के माध्यम से दिखाया जाए तो कहानी रोचक बन जाती है." पूरा परिवार सीतालक्ष्मी बताती हैं कि उनका पूरा परिवार सात पीढ़ियों से कठपुतली कला में लगा हुआ है और वे सिर्फ़ रामायण और महाभारत नहीं बल्कि सामाजिक मुद्दों पर भी कठपुतली का खेल दिखाती हैं. वे अपने बेटे के साथ मिलकर प्रदर्शन तो करती ही हैं, अपने पोते-पोतियों को भी यह कला सिखा रही हैं ताकि परंपरा चलती रहे. सीतालक्ष्मी बहुत गर्व के साथ बताती हैं, "हमारी नौंवी पीढ़ी भी इस कला में माहिर हो रही है." टेलीविज़न और सिनेमा के दौर में सीतालक्ष्मी और उनका परिवार परंपरागत भारतीय कला को जीवित रखने के काम में जुटा हुआ है. |
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