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पेरिस ने देखे दुर्गा पूजा के रंग
अपने देश से लगभग आठ हज़ार किलोमीटर दूर होने पर भी और संख्या में बहुत कम होने के बावजूद भी पेरिस के बंगाली समुदाय ने ज़ोर-शोर से दुर्गा पूजा का आयोजन किया. फ़्रांस में बंगाली समुदाय में केवल 60-70 परिवार ही हैं. इनमें से अधिकतर शिक्षा और कला के क्षेत्र से जुड़े हैं. मगर इतनी कम संख्या में होने के बावजूद इस समुदाय ने अपनी सांस्कृतिक रीतियाँ कायम की हैं. इसलिए पर साल पेरिस में दुर्गा पूजा और सरस्वती पूजा धूम-धाम से मनाई जाती है. इस बार दुर्गा पूजा का आयोजन पेरिस के दक्षिणी छोर पर स्थित सिते यूनिवर्सितेयर के मेसन दि ल इंदे यानी भारत भवन में किया गया. मेसन दि ल इंदे फ़्रांस में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों के लिए घर से दूर एक घर के रूप में प्रसिद्ध है. इसमें लगभग 100 छात्र-छात्राएँ रहते हैं. मूर्ति स्थापना और पूजा पूजा के लिए पूरे मेसन दि ल इंदे की सजावट की गई और पहली मंज़िल पर दुर्गा की मूर्ति स्थापित की गई है.
बंगाली परंपराओं के अनुसार ही आरती के बाद यहाँ भी सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए. संस्थान के निदेशक बिकास सान्याल कहते हैं कि इस बार पूजा का नया और ख़ास रंग ये भी रहा कि इस बार सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद ने कोलकाता के विख्यात रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय से 10 सदस्यीय दल भेजा. अपनी कला से इस दल ने लोगों का मन मोह लिया. लगभग दो घंटे के कार्यक्रम में गुजरात का डांडिया, राजस्थान के लोकनृत्य और बंगाल तथा असम के भी नृत्यों का प्रदर्शन किया गया. साथ ही भारतीय शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम भी पेश हुआ. आयोजन पूजा का आयोजन सम्मिलनी द्वारा किया गया है. ये दरअसल फ्रांस में रहने वाले बंगाली समुदाय के लोगों का एक संगठन है. सम्मिलनी के सदस्य नरेश सेन ने कहा कि सम्मिलनी पिछले चार-पाँच वर्षों से दुर्गा पूजा का आयोजन कर रही है और इसमें आने वाले लोगों की संख्या हर साल बढ़ती ही जा रही है. इस आयोजन से इस संस्था के छात्र-छात्राएँ भी ख़ुश हैं. गुजरात के आनंद ज़िले से एक सप्ताह पहले ही पढ़ने के लिए पेरिस आई स्वाती सप्तर्षि का कहना है, "अपने देश और घर से इतनी दूर होने के कारण मुझे नहीं लगता था कि मैं पेरिस में दुर्गा पूजा या कोई अन्य भारतीय उत्सव मना पाउँगी." वह अपने अन्य साथियों की तरह ही पूजा के आयोजन से काफ़ी खुश थीं. |
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