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रीमेक पर पिल पड़ा है बॉलीवुड | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लगता है बॉलीवुड में नई कहानियों का इन दिनों अकाल पड़ा हुआ है. इसीलिए ढेर सारे छोटे बड़े फ़िल्मकार पुरानी सफल फ़िल्मों के रीमेक बनाने में जुटे हैं. यानी वे पुरानी सफल फ़िल्मों का स्वरूप थोड़ा बदलकर, नए कलाकारों के साथ नए नाम से या फिर से उसी पुराने नाम के साथ पेश कर रहे हैं. और ऐसा नहीं है कि छोटे मोटे लोग ऐसा कर रहे हैं. हाल ही में यश चोपड़ा ने 1975 में बनी अपनी ही फ़िल्म ‘कभी-कभी’ के रीमेक की घोषणा कर डाली है. रामगोपाल वर्मा पहले ही 'शोले' की घोषणा कर चुके हैं. लगता है कि फ़िल्मकार इस समय नई फ़िल्मों का जोख़िम लेने की बजाय पुरानी सफलताओं को एक बार फिर भुनाने में समझदारी मान रहे हैं. फरहान अख़्तर अगर शाहरूख ख़ान के साथ ‘डॉन’ के रीमेक में पूरी तरह तल्लीन हैं तो जे.पी. दत्ता ऐश्वर्या राय के साथ बना रहे फ़िल्म ‘उमराव जान’ के लिए काफी उत्साहित हैं और वहीं ऋतुपर्णो घोष अपनी फ़िल्म ‘साहब, बीबी और ग़ुलाम’ को जल्द से जल्द पूरा करने में व्यस्त हैं. देवदास का रास्ता ऐसा लगता है कि फ़िल्मकारों को ये रास्ता देवदास ने दिखाया.
कुछ साल पहले संजय लीला भंसाली ने ‘देवदास’ के रीमेक के साथ-साथ उसका मॉडर्न संस्करण पेश कर करोड़ों कमा लिए तो पूरी इंडस्ट्री के फ़िल्मकारों ने यही रास्ता अख़्तियार करने का मन सा बना लिया. इसी क्रम को आगे बढाते हुए विधु विनोद चोपड़ा ने शरत बाबू के उपन्यास पर फ़िल्म ‘परिणीता’ बनाई और इन्हें भी इस फ़िल्म से अच्छी ख़ासी कमाई हुई. फिलहाल इंडस्ट्री का हर फ़िल्मकार नए आइडिया या नई कहानी पर काम करने से अच्छा यह सोचने में व्यस्त है कि कौन सी पुरानी फ़िल्म उनके लिए ‘लकी’ साबित होगी. कतार डेविड धवन ने अगर मनमोहन देसाई की ‘अमर अकबर एंथोनी’ के रीमेक का इरादा जाहिर किया तो फिरोज़ ख़ान ने लगे हाथों अपनी सुपरहिट फ़िल्म ‘कुर्बानी’ को यंग वर्जन में रीमेक करने का ऐलान कर डाला.
रामगोपाल वर्मा की फैक्टरी से रमेश सिप्पी की सुपर-डुपर हिट फ़िल्म ‘शोले’ के नए संस्करण की बात जैसे ही बाहर निकली, हर कोई इसका स्वागत करता दिखा. इस फ़िल्म को लेकर कॉपीराइट का मामला अभी भी गरम ही है लेकिन सितारों का चुनाव भी लगभग तय माना जा रहा है. गब्बरसिंह का रोल अमिताभ बच्चन को दिए जाने की बात चल ही रही थी कि वीरू के रोल के लिए अभिषेक बच्चन और जय के लिए ‘जेम्स’ के हीरो मोहित अहलवात को लेने के बारे में फैक्टरी में चर्चाएं ज़ोरों पर हैं. जवां होते हिन्दी सिनेमा को ध्यान में रखकर पूजा भट्ट ने अपने प्यारे पापा महेश भट्ट की फ़िल्म ‘अर्थ’ को नए ढंग से परोसने का विचार कर रही हैं. पुराना रोग ऐसा नहीं है कि रीमेक अभी-अभी शुरू हुआ है. महबूब ने 1940 में जिस कहानी पर फ़िल्म ‘औरत’ बनाई थी, करीब 17 साल बाद 1957 में उसी कहानी पर फ़िल्म ‘मदर इंडिया’ बनाई. 1940 में बनी फ़िल्म ‘लगन’ को 1957 में गुरुदत्त ने ‘प्यासा’ नाम दिया. 1982 की ‘नदिया के पार’ को सूरज बडजात्या ने ‘हम आपके हैं कौन’ नाम से पेश की. 1967 की ‘राम और श्याम’ को राकेश रोशन 1990 में ‘किशन कन्हैया’ नाम से बनाया. 1977 में बनी राजकपूर की फ़िल्म ‘सत्यम शिवम सुन्दरम’ है जो 1949 की फ़िल्म ‘आग’ से प्रभावित थी. 1991 में महेश भट्ट की सुपरहिट फ़िल्म ‘दिल है कि मानता नहीं’ को भी 1956 की फ़िल्म ‘चोरी-चोरी’ का ही रीमेक कहा जाता है. नए रंग-रूप से सराबोर इन फ़िल्मों में काम करने के लिए आज हर अभिनेता-अभिनेत्री लालायित है फिर चाहे वह सुपरस्टार शाहरूख ख़ान हों, फ़िल्मों के शहंशाह अमिताभ बच्चन हों, प्रियंका चोपड़ा हों या फिर ऐश्वर्या राय हों. वही गीत-संगीत इन बातों को अगर थोड़ा दरकिनार किया जाए तो रीमेक में जुटे तमाम फ़िल्मकारों को आज एक ही सवाल सता रहा है कि क्या उनकी फ़िल्म का संगीत वही जादू जगा पाएगा जो ओरिजिनल फ़िल्मों ने जगाया था.
शायद इसी डर से बचने के लिए लगभग हर फ़िल्मकार अपनी फ़िल्म में ओरिजिनल फ़िल्म का एक-दो गाना ज़रूर डाल रहा है. फिरोज़ ख़ान ‘कुर्बानी’ के रीमेक में कामयाबी के सारे रिकॉर्ड तोड चुका गाना ‘आप जैसा कोई मेरी ज़िंदगी में आए’ को ज्यों का त्यों रखने का मन बनाया है. फरहान अख़्तर ने ‘डॉन’ में दो गाने ओरिजिनल फ़िल्म के रखे हैं बाकी गाने शंकर-एहसान-लोय ने नए सिरे से कंपोज किए हैं. ऋतुपर्णा घोष अपनी फ़िल्म ‘साहब, बीबी और ग़ुलाम’ में पूरा का पूरा संगीत वही रखने का फैसला किया है. इस फ़िल्म के एक गाने में प्रियंका चोपड़ा ‘न जाओ सइयाँ छुड़ाके बहियाँ’ गाकर सलमान ख़ान को रिझातीं नज़र आएंगी तो विद्या बालन ‘भौंरा बड़ा नादान’ गाकर जॉन अब्राहम को छेड़ेंगी. वहीं दूसरी ओर ‘उमराव जान’ में जे. पी. दत्ता ने ऐश्वर्या राय को रेखा वाली अदाएं तो दीं लेकिन खय्याम के संगीत के बदले अनु मलिक से पूरा नया गाना रिकॉर्ड करवाया है. | इससे जुड़ी ख़बरें साहित्य और इतिहास की ओर बॉलीवुड19 जुलाई, 2005 | मनोरंजन पाकिस्तान में शोले और देवदास 13 अक्तूबर, 2004 | मनोरंजन शोले की बात ही कुछ ऐसी है...01 सितंबर, 2004 | मनोरंजन नए रूप में भी धमाका कर रही है शोले 19 अगस्त, 2004 | मनोरंजन फ़िल्म देखने पर पिटाई होती थी- राम गोपाल वर्मा29 जुलाई, 2004 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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