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वक्त की कसौटी पर आज़ाद भारत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी, हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की ज़ीनत.... अल्लामा इक़बाल की इस नज़्म में एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित देश के भविष्य का बिंब दिखाई देता है. देश की आज़ादी के वक़्त तमाम स्वतंत्रता सेनानियों के दिलों में आने वाले भारत के लिए कुछ ऐसा ही ख़्वाब था. "बहुत साल पहले हमने नियति से एक वादा किया था- आज उस वादे को पूरा करने का वक़्त आ गया है. आधी रात के वक़्त जब सारी दुनिया सो रही है, भारत ज़िंदगी और आज़ादी पाने के लिए जागने जा रहा है." 14 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि के वक़्त को याद करें तो संसद के केंद्रीय सभागार में जवाहरलाल नेहरू के शायराना अंदाज़ में गूँजे ये शब्द भी याद आते हैं. हालांकि आज़ादी के इस जश्न के वक़्त गाँधी दिल्ली नहीं, कोलकाता में थे और सांप्रदायिक दंगों को ख़त्म करने के लिए अनशन पर बैठे थे जहाँ उन्होंने कहा था कि अपनों के बीच शांति और सौहार्द्र उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि विदेशी शासन से मुक्ति. साथ ही अंबेडकर जैसे संविधान निर्माता इस प्रयास में लगे थे कि एक ऐसे देश को खड़ा किया जाए, जहाँ लोग एक साथ चल सकें और एकता का लक्ष्य हासिल किया जा सके. ख़ुद आज़ाद भारत के संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि भारत एक प्रजातांत्रिक गणराज्य बनेगा. बाद में समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्द भी इससे जोड़ दिए गए. 'सारे जहाँ से अच्छा' पर आज़ादी के बाद का भारत इन मूल्यों की कसौटी पर कितना खरा उतर पाया है. क्या जनतंत्र की जड़ें भारत में गहराई तक उतर पाई हैं या फिर सत्ता के प्रतिष्ठानों पर चुनावों में केवल मोहरे बदलने भर से यह मान लिया जाए कि भारत के जनतांत्रिक मूल्य परिपक्व हो गए हैं. इस बारे में जानी-मानी लेखिका और दैनिक हिंदुस्तान की संपादक मृणाल पांडे बताती हैं, "कुल मिलाकर अभी तक भारत में एक बार भी सैनिक तानाशाही की बात लोगों के ज़हन में नहीं आई. हालांकि कुछ ख़ामियाँ हैं पर एशियाई महाद्वीप में लोकतंत्र का जो वर्तमान स्वरूप है,उसे देखते हुए भारत की स्थिति इतनी ख़राब नहीं है." ख़ुद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पुष्पेश पंत मानते हैं कि कुछ कमियां भले ही रह गई हों, पर इस लोकतांत्रिक ढाँचे में आम आदमी का सशक्तीकरण तो हुआ है. वो कहते हैं, "आम आदमी की तस्वीर बदली है, उसका सशक्तीकरण हुआ है, हालांकि पूरा नहीं हुआ है पर हुआ ज़रूर है." 'ये वो सहर तो नहीं' हालांकि जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलपति मुशीरुल हसन देशभर के संस्थानों के गिरते स्तर को लेकर ख़ासे चिंतित हैं. मुसीरुल हसन बताते हैं, "मसला न्यायपालिका का हो, विज्ञान और प्रौद्योगिकी का हो, शिक्षण संस्थानों का हो, या फिर राजनीतिक संस्थानों और लोकसेवाओं का. जबतक इन संस्थानों को सुधारा नहीं जाएगा, तबतक संसदीय लोकतंत्र का फ़ायदा लोगों तक नहीं पहुँचेगा." एक सवाल संविधान की प्रस्तावना में दिखाए गए धर्मनिरपेक्ष भारत से संबंधित भी है. काग़ज़ों पर एक धर्मनिरपेक्ष देश का सपना भले ही सजा लिया गया हो पर 1984 के सिख दंगों, 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद के दंगों और या फिर चार साल पहले हुए गुजरात के दंगों को देखें तो यह स्वरूप इतना संरक्षित भी नहीं रहा है. जब यह सवाल हमने स्टेट्समैन और ख़लीफ़ टाइम्स के पूर्व संपादक, एस निहाल सिंह के सामने रखा तो उन्होंने कहा कि भले ही हम एक तरह से देखने पर धर्मनिरपेक्ष हों पर लोगों में व्यक्तिगत स्तर पर ऐसा नहीं दिखाई देता. एक सवाल आज़ादी के बाद देश में दलितों को मिले आरक्षण को लेकर भी उठता है. पहले दलितों को उपर उठाने लिए जिस आरक्षण की व्यवस्था को लागू किया गया था, आज उसी सवाल पर तमाम दूसरे वर्ग भी आरक्षण की माँग करने लगे हैं. इस बारे में राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव का मानना है कि अभी देश में पिछड़े वर्ग की स्थिति ऐसी नहीं बन पाई है जिसे देखते हुए आरक्षण की व्यवस्था को ख़त्म कर दिया जाए. वो बताते हैं, "आरक्षण पिछड़ेपन को कम करने का औज़ार नहीं है. आरक्षण तो वर्जनाओं के समाज में उन वर्जनाओं को तोड़ने का औज़ार है." सपेरों से बाज़ीगरों तक किसी ज़माने में सपेरों का देश रहा भारत आज बाज़ार के बाज़ीगरों का देश बन गया है. यहाँ कॉलसेंटर अब राष्ट्रीय मुक्ति के नए उपासना स्थल हैं. भारतीय समाज का मध्यम वर्ग इस मुहावरे को समझ गया है कि समृद्ध होना गौरवशाली है. प्रकाश कारत के संग या उनके बग़ैर भी. इस देश को आज भी गर्व है कि उसके पास दुनिया में तीसरे स्थान पर सबसे ज़्यादा वैज्ञानिक हैं. हालांकि इस धरोहर की गुणवत्ता और क्षमताओं से लेकर अंतरराष्ट्रीय मानकों और पुरस्कारों को हासिल करने तक की पड़ताल इसपर सवाल खड़े कर देती है. 21वीं सदी की सुबह का भारत ऊपरी तौर से आत्मविश्वास से भरा, भरोसेमंद और दुनियाभर की आर्थिक परियोजनाओं में भागीदार बनने के लिए तैयार नज़र आता है. अठ्ठावन सीढ़ियाँ राजनीतिक स्वतंत्रता के 58 वर्षों के भारतीय प्रयोग एक देश के जीवन में छोटी अवधि हो सकती है पर देश की दिशा बदलने के लिए यह अवधि कतई छोटी नहीं है. सच्चाई तो यह है कि जिन लोगों ने देश की आज़ादी में अपना सब कुछ न्यौछावर किया, वो उसका प्रबंधन करने में विफल रहे. सत्ता में आने के बाद स्वतंत्रता पूर्व के आदर्शवाद का स्थान पुरानी पड़ चुकी विचारधाराओं ने ले लिया. यह समझना होगा कि लोकतंत्र या उसकी प्रचुरता ही समृद्धि की गारंटी नहीं हो सकती, लेकिन यह विचारों की विफलता नहीं, उनको अमल में लाने वालों की विफलता है. भारत के लिए सब कुछ अभी ख़त्म नहीं हुआ है. उम्मीद है और बहुत है. |
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