| स्वतंत्रता सेनानी होने के 'झूठे दावे' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सुप्रीम कोर्ट ने आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने का झूठा दावा करने वाले लोगों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं. न्यायालय ने ये आदेश एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिए हैं जिसमें कहा गया था कि महाराष्ट्र के एक ज़िले में बहुत से लोगों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने का प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया है और उन्हें तमाम सुविधाएँ दी जा रही हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जो लोग स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने का झूठा दावा कर रहे हैं वो लोग 'ग़द्दार' हैं और देश का अपमान कर रहे हैं. इस मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कहने से एक ऐसे व्यक्ति की छवि मन में उभरती है जिसने देश की आज़ादी के लिए शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना सहन की. उन्होंने कहा कि जब इस तरह की ख़बरें मिलती हैं कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का झूठा दावा करके लोग ग़लत ढंग से आर्थिक लाभ ले रहे हैं तो यह छवि धूमिल हो जाती है. हालाँकि अदालत ने अभी इस याचिका पर कोई फ़ैसला नहीं दिया है. लेकिन न्यायमूर्ति पसायत ने कहा है कि इस तरह के मामलों से देश की नैतिकता की दुखी करने वाली छवि उभरती है जिसमें ऐसे बहुत से मामले सामने आए हैं कि ऐसे लोगों ने भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने का दावा किया है जो आज़ादी की लड़ाई के समय या तो पैदा ही नहीं हुए थे या फिर बच्चे थे. उल्लेखनीय है कि मुंबई हाईकोर्ट के निर्देश पर एक जाँच समिति का गठन किया गया था जिसने 354 संदिग्ध मामलों का पता लगाया था. अब सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई हाईकोर्ट के सेवानिवृत जज की एक सदस्यीय समिति बनाई है जो अपनी जाँच के बाद आवश्यक कार्रवाई के लिए राज्य सरकार को रिपोर्ट देगी. |
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