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आज़ादी के छह दशक बाद हिंदी साहित्य | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की आज़ादी के छह दशकों में हर चीज़ में बदलाव आया है -सियासत में, विचारधाराओं में, समाज में, महिलाओं की स्थिति में. लेकिन साहित्य ने इन परिवर्तनों को किस तरह से लिया है. क्या ये परिवर्तन साहित्य में दिखाई पड़ते हैं और किस तरह? पेश है वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र यादव से बातचीत के मुख्य अंश: सवाल- राजाओं और शासकों का इतिहास तो इतिहासकार लिखते रहे हैं. आम लोगों का इतिहास कहानियों और कविताओं में लिखा जाता है.क्या कारण रहा है कि दो सदियों तक उपनिवेश बने रहे भारत का इतिहास इस दृष्टि से सीमित रहा है ? जवाब- मैं नहीं मानता कि वह सीमित है. चार पांच साल पहले शाहिद अमीन की एक किताब 'निम्नवर्गीय प्रंसग' आई थी. इसमें उन्होंने जो संघर्ष करते हुए मामूली लोग हैं, उनका इतिहास रिकार्ड करने की कोशिश की है. उन्होंने उन लोगों से बात करके उनकी दुनिया में जाकर उनके मुहावरे और गीत सुने. तो इस तरह का इतिहास इन दिनों काफ़ी रिकार्ड किया जा रहा है. इससे इतिहास का दूसरा पक्ष आ रहा है जो बिलकुल अलग है. सवाल- आज़ादी के छह दशक बाद साहित्य में भारत पर लंबे औपनिवेशिक साए का असर कितना दिखता है? क्या आज का साहित्य इस साए से बाहर आता दिखाई देता है? जवाब- जब हम ग़ुलाम थे, तब हमारे साहित्य का एक ही लक्ष्य था - आज़ादी, वह लड़ाई थी. लड़ाई में जो कुछ लिखा जाता है वह ख़ास तरह के तनाव में, भावुकता में लिखा जाता है, आज़ादी की इच्छा से लिखा जाता है. लेकिन जब आज़ादी मिल गई तो साहित्य का दूसरा रूप आया. रूप यह हुआ कि एक लोकतांत्रिक उभार आया. साहित्य में वह आवाज़ें सुनाई देने लगीं जो पहले नहीं थीं. जैसे दलितों और स्त्रियों की आवाज़ें, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों की आवाज़ें. पिछले पच्चास-साठ सालों में अगर हम देखें तो जितनी बड़ी संख्या में एक आंदोलन की तरह स्त्रियां लिख रही हैं, जितने बड़े पैमाने पर दलित लिख रहे हैं, जितनी बड़ी संख्या में मुसलमान लेखक आए हैं, उतने पहले कभी नहीं आए थे. साहित्य में आज विविधता दिखाई दे रही है. दूसरे यह कि उन साधारण लोगों की बातें जो हम लोग बोला करते थे, वह ख़ुद अपनी बातें बोलने लगे हैं. तो कहने का मतलब यह कि पहले हमारा साहित्य दयनीय रूप में मध्यम वर्गीय साहित्य रहा है....अब ऐसा नहीं है. सवाल- दशक-हर-दशक सामाजिक बदलावों की छटपटाहट...भले ही थोड़ी फूहड़ता के साथ हो..क्या साहित्य सृजन में इन परिवर्तनो का आप असर देखते हैं? जवाब- परिवर्तन तो होते रहते हैं बहुत धीरे और अंजाने... कभी-कभी वह भड़क उठते हैं, अंदोलन के रूप में, राजनैतिक हलचल के रूप में. तो उनकों दशकों में नहीं बांटा जा सकता. लेकिन एक चीज़ को समझने के लिए हम फिर भी उन्हें दशकों में बांट लेते हैं. आज ख़ासतौर से हिन्दुस्तान में बाहरी और भीतरी प्रभाव से इतनी तेज़ी से परिवर्तन हो रहे हैं कि हम उन्हें रिकार्ड नहीं कर पा रहे हैं. सवाल- राजनीति भी बहुत बदल गई है. नेहरू युग..फिर लाल बहादुर शास्त्री का दौर...उसके बाद इंदिरा गाँधी...फिर मंडल-कमंडल की राजनीती...इन परिवर्तनों से साहित्य कितना प्रभावित हुआ? जवाब- जिस तरह हर दिन राजनीति बदलती है साहित्य उस तरह नहीं बदलता. सिर्फ़ राजनेताओं का मुंह देखकर लिखने वाला या उनके विरोध में लिखा जाने वाला साहित्य अख़बारी साहित्य होता है. लेकिन यह सही है कि इन नीतियों का असर तो होता ही है. सवाल- हिंदू-मुस्लिम-दलित-सवर्ण-पिछड़ा-अगड़ा....यह लड़ाई हिंदी साहित्य मे कैसी लग रही है? जवाब- लोगों की शिकायत है कि हिंदी की रचानाओं में सिर्फ़ यही आ रहा है जबकि आज 'मेन-थीम' ही यही है. आज मध्यम वर्ग के तनाव और भावनात्मक सम्बंधो की कहानी लगभग पीछे धकेल दी गई है. आज के उपन्यासों और कहानियों में आम लोगों का संघर्ष बहुत प्रभावाशाली ढंग से आ रहा है. उसका अच्छा उदाहरण है मोहम्मद आरिफ़ का उपन्यास 'उपकथा' जो बाबरी मस्जिद पर लिखा गया दूसरा उपन्यास है. इसमें मैं ख़ास विभाजन यह भी देखता हूँ कि मुसलमानों का जो साहित्य आ रहा है वह असुरक्षा और दंगों से पीड़ित भावनाओं से भरा हुआ है. हिन्दुओं के साहित्य में यह भय और असुरक्षा नहीं है. वहीं दलितों के अलग तरह के तनाव और दिक़्कते हैं उनकी लड़ाई अवसर की लड़ाई है. हालांकि उन्हें जब भी अवसर मिले हैं उन्होंने अपनी क्षमता दर्ज कराई है. महिलाओं की स्थिति सवाल- आज़ादी के बाद से आज तक औरत की छवि बदली और नहीं भी बदली है. आपका क्या मानना है? साहित्य में औरत की छवि किस हद तक बदली है? जवाब- आज़ादी के बाद साहित्य और समाज में औरत की छवी बहुत ज़्यादा बदली है. जैसे मैं कहूं - उसे अपने होने की चेतना, कि वह निर्भर नहीं है दूसरों पर. वह अपना आधिकार माँग सकती है. आज वह पंचायत द्वारा पूरे क़स्बे और गांव को शासित कर रही है. उसकी हर क्षेत्र में भागीदारी है.पहले हमारे साहित्य में गांव की स्त्री हुआ करती थी. अब पहली बार ऐसा हो रहा है कि पुष्पा मैत्रीय जैसी लेखिकाओं की रचानाओं में स्त्री का गांव दिखाई देता है.तो आज जो सबसे तेज़ और आक्रामक आंदोलन है वह दलित और स्त्री का आंदोलन है. सवाल- क्या कारण है कि चालीस करोड़ की आबादी जिस भाषा में बोलती... सुनती है...उसी भाषा को हाशिए पर रखकर चलती है. तो क्या इन छह दशकों में अपनी भाषा और साहित्य के प्रति हिंदी समाज की एहसान फ़रामोशी बढ़ी है? सवाल- यह समस्या सिर्फ़ हिंदी की नहीं है हर भारतीय भाषा की है. भाषा वह महत्वपूर्ण हो जाती है जिसके पढ़ने से अवसर मिलें, सत्ता मिले, और हम अपने आपको सशक्त महसूस करें. हमारे जो कर्णधार हैं, शासक वर्ग है, उनके घरों में भी उनकी अपनी भाषा नहीं बोली जाती ......अग्रेज़ी बोली जाती है. तो अंतराष्ट्रीय भाषा होने की वजह से अग्रेज़ी के पास अवसर भी हैं, सत्ता भी है, और सब कुछ जान लेने का गर्व भी है, और ऐसी स्थिति में भारतीय भाषाओं का किनारे पर चला जाना स्वभाविक ही है. |
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