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एक पुलिस अधिकारी का अलग सा मिशन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पश्चिम बंगाल काडर के 1981 बैच आईपीएस अधिकारी डॉ. नज़रूल इस्लाम अपनी कार्यशैली के लिए जितने चर्चित रहे हैं, अपनी लेखनी के लिए उतने ही विवादों में रहे हैं. लगभग हर किताब में पुलिस में शीर्ष स्तर पर फैले भ्रष्टाचार और सत्तारूढ़ दलों के साथ पुलिस अफ़सरों की मिलीभगत को निशाना बनाने वाले डॉ. इस्लाम प्रशासन की तिरछी निगाह के कारण ही कभी किसी अच्छे पद पर लंबे अरसे तक नहीं टिक सके. उन्होंने एक-दो नहीं बल्कि 42 किताबें लिखी हैं. इनमें उपन्यास, नाटक, कहानी, कविता व निबंध संग्रह शामिल हैं. इनमें से दो किताबों, 'सन ऑफ़ सॉयल' व 'बकुल' का हिंदी में भूमिपुत्र व बकुल नाम से अनुवाद भी हो चुका है. उनकी ज्यादातर किताबें तो बांग्ला में हैं लेकिन तीन निबंध संग्रह अंग्रेज़ी में भी लिखे गए हैं. मिशन अपने प्रतिष्ठान विरोधी रवैए के कारण उनको काफ़ी मुश्किलें भी झेलनी पड़ी हैं लेकिन वे इससे विचलित नहीं हैं. वह कहते हैं, "मैं यह सब किसी निजी फ़ायदे के लिए नहीं बल्कि पुलिस में फैले भ्रष्टाचार को दूर कर उसकी छवि साफ़ करने के मक़सद से कर रहा हूँ." फरवरी के पहले सप्ताह में हुए 31वें कोलकाता पुस्तक मेले में एक स्टॉल ऐसा भी था जहां सिर्फ़ इसी आईपीएस अधिकारी की लिखी किताबें बिक रहीं थी. उनके प्रकाशक और इस्लाम के पैतृक ज़िले मुर्शिदाबाद में स्थापित बसंतपुर एजुकेशन सोसायटी की ओर से लगे इस स्टाल में उनकी पुस्तकें ख़ूब बिकीं और खरीदने वालों में पुलिस के निचले स्तर के अधिकारियों के अलावा आम लोग भी थे. इस्लाम, जो फिलहाल पश्चिम बंगाल पुलिस में एनफ़ोर्समेंट शाखा के आईजी पद पर तैनात हैं, भी शाम को स्टॉल पर बैठकर ख़रीददारों के अनुरोध पर अपनी किताबों पर ऑटोग्राफ़ देते रहते थे. विवाद उनकी हर किताब एक विवाद खड़ा करती रही है. वह चाहे 'बकुल' हो या फिर ताज़ा किताब 'पुलिस प्रसंगे' जिसका मतलब हुआ पुलिस के बारे में. पुस्तक मेले में आई अपनी इस ताज़ा किताब में उन्होंने खुलकर लिखा है कि शीर्ष पुलिस अधिकारी किसी तरह भ्रष्टाचार में लिप्त हैं और सत्तारूढ़ दल यानी वामपंथी गठबंधन के हाथों का खिलौना बन गए हैं. वे कहते हैं कि शासक दल पुलिस को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता है. इस किताब के छपने के बाद राज्य सरकार ने उनसे सफाई भी मांगी थी. वे बताते हैं, "मैंने कहा कि यह किताब सरकार की नीतियों नहीं बल्कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लिखी गई है. अगर सरकार घोषित कर दे कि भ्रष्टाचार उसकी नीति है तो मैं कोई भी सज़ा भुगतने को तैयार हूँ." इस सफ़ाई के बाद सरकार ने ही चुप्पी साध ली.
अपनी पुस्तक में उन्होंने पुलिस, प्रशासन व मंत्रियों की ओर से अधिकारों के बेजा इस्तेमाल और सरकारी गाड़ियों के दुरुपयोग के कई उदाहरण भी दिए हैं. इससे पहले दुर्गापूजा के समय एक पत्रिका में छपे अपने लेख में उन्होंने एक मंत्री पर सरकारी कार के जमकर दुरुपयोग करने का भी आरोप लगाया था. तब भी उनको सफाई देनी पड़ी थी. इस्लाम मानते हैं कि इस पेशे में रह कर ऐसा लिखने में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है. लेकिन साथ ही कुछ सहूलियतें भी हैं. इस्लाम कहते हैं, "अगर मैं पुलिस में नहीं होता तो शायद 'बकुल' व 'पुलिस प्रसंगे' जैसी किताबें नहीं लिख पाता." | इससे जुड़ी ख़बरें दया नायक ने आत्मसमर्पण किया20 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस रायपुर से शुरू हुई 'राधा' की रासलीला11 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस नक्सलियों से बचाएंगे आवारा कुत्ते31 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस बिहार पुलिस को कमर कसने की सलाह18 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस वीर रस से श्रृंगार रस की ओर15 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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