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सोमवार, 13 अक्तूबर, 2003 को 20:54 GMT तक के समाचार
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'हम एक निर्लज्ज समाज में रहते हैं'

मनोहर श्याम जोशी
मनोहर श्याम जोशी मानते हैं कि टीवी छोड़कर फ़िल्मों की ओर जाना ग़लती थी

हिंदी के सुपरिचित लेखक मनोहर श्याम जोशी कहते हैं कि समाज में व्यंग्य की जगह ख़त्म हो गई है क्योंकि वास्तविकता व्यंग्य से बड़ी हो गई है.

उनका कहना है कि व्यंग्य उस समाज के लिए है जहाँ सब कुछ दबा छिपा रहता है और लोग छोटे मुद्दों को लेकर भी संवेदनशील होते हैं.

लेकिन उनका कहना है कि अब जॉर्ज बुश, अटल बिहारी वाजपेयी, राबड़ी देवी या टोनी ब्लेयर जिस तरह बोलते हैं उससे लगता नहीं कि व्यंग्य की और कोई जगह हो सकती है.

हिंदी समाज

 हिंदी बहुत चाटुकारों और चापलूसों का समाज है. शायद अन्य भाषाओं का भी होगा

मनोहर श्याम जोशी

लंदन में बीबीसी से हुई बातचीत में मनोहर श्याम जोशी ने कहा कि अगर इस पर लिखा जाए तो वह वीभत्स व्यंग्य हो जाएगा.

उन्होंने कहा, ''हम निर्लज्ज समाज में रहते हैं यहाँ व्यंग्य से क्या फ़र्क पड़ेगा.''

उन्होंने हिंदी के लेखकों के बारे में कहा, ''हिंदी बहुत चाटुकारों और चापलूसों का समाज है. शायद अन्य भाषाओं का भी होगा.''

अफ़सोस

मनोहर श्याम जोशी भारत में सोप ऑपेरा के जनक माने जाते हैं. उन्होंने 'हम लोग' और 'बुनियाद' से उन्होंने भारत के टेलीविजन की दुनिया में एक नई शुरुआत की.

मनोहर श्याम जोशी
मनोहर श्याम जोशी मानते हैं कि अब टीवी के लिए लिखना दिहाड़ी लेखकों का काम हो गया है

उन्होंने कहा, ''उन दिनों रमेश सिप्पी का सितारा डूब रहा था और उन्होंने हमें भी डूबो दिया.''

उनका कहना है कि अब टीवी की दुनिया बहुत बदल गई है और अब वहाँ दिहाड़ी लेखक चल रहे हैं.

मनोहर श्याम जोशी ने कहा कि अब टीवी तो फ़ैक्टरी हो गया है और लेखक से ऐसे परिवार की कहानी लिखवाई जाती है जिसमें हिरोइन सिंदूर लगाकर पैर भी छू लेती है और फिर स्विम सूट भी पहन लेती है.

लेखन

कुरु कुरु स्वाहा और कसप जैसे उपन्यास लिख चुके मनोहर श्याम जोशी कहते हैं कि वे एक साथ कई रचनाओं पर काम कर रहे हैं.

उन्होंने बताया कि वे अपने दो उपन्यास प्राथमिकता के आधार पर पूरा करना चाहते हैं.

उनमें से एक है, कपिश जी और दूसरा कंबोडिया की पृष्ठभूमि पर है.

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