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रविवार, 29 जनवरी, 2006 को 12:13 GMT तक के समाचार
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'किताबें कुछ कहना चाहती हैं'

17वाँ अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला
मेले में इस बार 19 देशों की पुस्तकें आई हैं
'किताबें कुछ कहना चाहती हैं, तुम्हारे पास रहना चाहती हैं, क्या तुम इन किताबों के संसार में नहीं जाना चाहोगे...' सफ़दर हाशमी की एक कविता की ये पंक्तियाँ दिल्ली में इन दिनों चल रहे 17वें अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले के संदर्भ में भी काफ़ी कुछ कहती हैं.

मेले में इस बार भारत सहित 19 देशों के प्रकाशक अपनी किताबें लेकर आए हैं.

तरह-तरह के विषयों पर केंद्रित लाखों किताबों को प्रदर्शित करने के लिए दिल्ली स्थित प्रगति मैदान में क़रीब 2300 स्टॉल सजाए गए हैं.

मेले में तक़रीबन 1300 प्रकाशक और वितरक किताबें लेकर आए हैं जिनमें से 37 प्रकाशक और वितरक भारत के बाहर से हैं.

ये प्रकाशक पाकिस्तान, फ़्रांस, इस्राइल, नेपाल, श्रीलंका, कनाडा, बांग्लादेश, मारीशस, इटली, मलेशिया, सिंगापुर, अमरीका, ब्रिटेन, कुवैत, जापान, जर्मनी, सऊदी अरब और ईरान जैसे 18 देशों से आए हैं.

इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ़ और यूरोपियन यूनियन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं शामिल हैं.

27 जनवरी से शुरू हुआ यह अंतरराष्ट्रीय मेला चार फरवरी तक चलेगा.

कहाँ हैं पुस्तक प्रेमी

इतना सारा तामझाम भी इस बार पुस्तक प्रेमियों को बड़ी तादाद में खींचता नज़र नहीं आ रहा.

17वाँ अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला
मेले की शुरुआत ठंडी ही है

आयोजक दलील देते हैं कि अभी तो शुरुआत है पर तीन दिन बीतने के बाद भी लोगों की अपेक्षित भीड़ नहीं दिखाई दी.

दलित साहित्य प्रकाशन की किताबें लेकर आए एक विक्रेता बताते हैं, "हमें छुट्टी के दिनों का इंतज़ार है. इस बार कुछ ठंडा ही है और मेले में लोगों की तादाद कम ही है."

उल्लेखनीय है कि कुछ दिनों पहले ही इसी प्रांगण में ऑटो मेला लगा था, उस वक्त लोगों के भीड़ का आलम यह था कि छुट्टी के दिनों में दोपहर तक ही लोगों को अंदर आने से रोकना पड़ा था.

फिर पुस्तक मेले में पुस्तक प्रेमियों की कमी क्यों.

पुस्तक ख़रीदने आए कुछ पाठकों से ही इसकी वजह पूछी तो लोगों ने कहा कि सरकार जितना अन्य मेलों के प्रचार पर पैसा खर्च करती है, उतना ध्यान शायद पुस्तक मेले पर नहीं दिया जाता.

 मीडिया कारों, मॉडलों और मशीनों की तस्वीरें तो ख़ूब छापता है पर पुस्तक मेले को कितनी जगह मिलती है. लोगों को इसके चलते पता ही नहीं चलता और मेला ख़त्म हो जाता है
नितिन, एक पुस्तक प्रेमी

एक पुस्तक प्रेमी नितिन कहते हैं, "मीडिया कारों, मॉडलों और मशीनों की तस्वीरें तो ख़ूब छापता है पर पुस्तक मेले को कितनी जगह मिलती है. लोगों को इसके चलते पता ही नहीं चलता और मेला ख़त्म हो जाता है."

एक छात्रा सुनीता तो यह तक मानती हैं कि भारतीय प्रकाशकों की पुस्तकों के लिए यहाँ आना कोई ज़रूरी नहीं है पर विदेशों में प्रकाशित होने वाली तकनीकी और विज्ञान से संबंधित किताबें उपयोगी हो सकती हैं जो गंभीर और ज़रूरतमंद ख़रीददारों को मेले तक लाएंगी.

वैसे मेले में कई विषयों पर बेहतरीन किताबें आई हैं.

बात चाहे बच्चों के साहित्य की हो या फिर युवाओं के लिए पुस्तकों की, विज्ञान और तकनीकी की किताबों को देखें या फिर तमाम भाषाओं में लिखे गए साहित्य की उम्दा पुस्तकें हों, हर वर्ग की जेब के हिसाब से काफ़ी कुछ यहाँ पर मौजूद है.

मेहमान प्रकाशक

विदेशों से मेले में आ रहे प्रकाशक भी इस बात को ख़ासतौर पर ध्यान में रखकर आए हैं कि भारत में लोगों को क्या ज़्यादा पसंद आएगा और जिससे भारतीय प्रकाशकों से भी व्यापारिक अनुबंध बनें.

17वाँ अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला
ईरान, सऊदी अरब और पाकिस्तान से भी कई विषयों पर किताबें आई हैं

ख़ासकर फ़्रांस, ब्रिटेन और जापानी पुस्तकों के स्टॉलों पर ज़्यादा भीड़ दिखी पर साउदी अरब और ईरान के स्टॉलों पर भी कम भीड़ नहीं पहुँच रही.

आम पाठकों से लेकर साहित्यकारों और गंभीर चिंतकों तक को सबसे ज़्यादा पाकिस्तान के प्रकाशकों में जिज्ञासा रहती है.

पर इस बार जब पाकिस्तानी प्रकाशकों की तरफ बढ़े तो पाया कि कुछ स्टॉलों पर दुकान सज रही है तो कुछ स्टॉल खाली पड़े हैं.

पूछा तो लाहौर स्थित इक़बाल अकादमी पाकिस्तान से अपना प्रकाशन लेकर आए अकादमी के उप निदेशक इरशाद-अल-मुजीब ने बताया कि अभी कुछ प्रकाशकों का आना बाकी है.

उन्होंने बताया, "कुछ पाकिस्तानी प्रकाशकों का सामान तो अभी भी सुरक्षा जाँचों के लिए हवाई अड्डे पर ही पड़ा है. गणतंत्र दिवस की सुरक्षा व्यवस्था के चलते देरी हुई है. फिर कुछ प्रकाशक इस वर्ष मार्च में लाहौर में होने वाले पुस्तक मेले की तैयारी में व्यस्त हैं."

कुल मिलाकर ठंडी शुरुआत के साथ ही सही, किताबों का मेला चल रहा है.

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