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बुधवार, 25 अगस्त, 2004 को 17:40 GMT तक के समाचार
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सराहा जा रहा है सरहद पार का साहित्य

दिल्ली पुस्तक मेले में पाकिस्तानी स्टॉल
दिल्ली में पुस्तक मेले में पाकिस्तानी स्टॉल पर काफ़ी भीड़ उमड़ रही है
सियासत सीमाओं में बँधी हो सकती है मगर संवेदना और साहित्य किसी सरहद या सियासत का मोहताज नहीं होता. दिल्ली में चल रहे पुस्तक मेले में पाकिस्तानी किताबों के स्टालों और उन पर उमड़ती भीड़ को देखकर ऐसा ही लगता है.

131 से ज़्यादा प्रकाशकों और पुस्तक विक्रेताओं के 12 स्टॉल इस बार के 'दिल्ली पुस्तक मेला' में आकर्षण का केन्द्र हैं.

पाकिस्तान से आई इन किताबों में जहाँ एक ओर बड़ी तादाद में साहित्य और सामाजिक सरोकारों वाली किताबें हैं वहीं विज्ञान, तकनीकी और वाणिज्य पर भी उम्दा किस्म की किताबों की भरमार है.

पाकिस्तान से आए प्रकाशक आबिद हमीद बताते हैं, "भारत की किताबें सस्ती हैं और उनकी गुणवत्ता भी बेहतर होती है, इसलिए हम बड़ी मात्रा में विज्ञान और तकनीकी की किताबें आयात करते हैं. लेकिन यहाँ एक बड़ा बाज़ार है जिसमें उर्दू की किताबों के लिए बेहतर संभावनाएँ हैं."

हमीद मानते हैं, "राज की बात राजनेता जानें, हम तो बस इतना जानते हैं कि जितना संवाद बढ़ेगा, भाईचारा और आपसी रिश्ता भी उतना ही मज़बूत होगा."

प्राथमिक शिक्षा से लेकर रिसर्च तक की तमाम पुस्तकें इस बार मेले में लाई गई हैं जिनके चलते शिक्षण से जुड़े लोगों और छात्रों का जमावड़ा भी इन स्टालों पर बढ़ा है.

पाकिस्तान पहुँचेंगी पुस्तकें

पाकिस्तान से आए जाने-माने साहित्यकार अहमद फ़राज़ ख़ुद इस प्रयास को लेकर बहुत खुश हैं.

पाकिस्तानी स्टॉल
साहित्यकार और पब्लिशर्स इस पहल से काफ़ी उत्साहित हैं

फ़राज़ बताते हैं, "एक-दो दिन पहले ही पाकिस्तानी सरकार ने साहित्यिक पुस्तकों के आयात पर लगा प्रतिबंध हटाया है, यह दोनों देशों के लिए अच्छी ख़बर है."

हालाँकि फ़राज़ मानते हैं, "इस्मत चुगताई और मंटो जैसे लेखक अब नहीं रहे, जिनसे ऐसे लेखक पैदा होते, उन हाथों में बंदूक थमा दी गईं, पर पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान में फिर से बेबाक लेखन शुरू हुआ है."

एक अन्य प्रकाशक अहमद अली शेख ने बताया, "मैं 1988 से 25 बार पुस्तकें लेकर भारत के तमाम पुस्तक मेले में आ चुका हूँ और हर बार बेहतर अनुभव लेकर गया हूँ."

शेख बताते हैं, "हमने भारत के 35 प्रकाशकों को मार्च 2005 में आमंत्रित किया है. साथ ही कई प्रकाशकों से अनुबंध भी हुए हैं ताकि हमारी किताबों की भारत में लगातार आमद बनी रहे."

'सबक लें सरकारें'

उधर भारतीय प्रकाशक और पाठक, दोनों ही इन पुस्तकों को हाथों-हाथ ले रहे हैं.

अहमद फ़राज़
अहमद फ़राज़ के अनुसार पाकिस्तान में पुस्तकों के आयात पर से प्रतिबंध हटने की ख़बर से उत्साह है

उर्दू साहित्य के शौकीन डॉक्टर ए रहमान बताते हैं, "इस बार सबसे ख़ास यह है कि सामग्री के साथ प्रकाशन की गुणवत्ता भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की मिल रही हैं. ऐसे लोगों और विषयों पर भी किताबें और रिसाले (पत्रिकाएं) आई हैं, जिन पर पहले लिखना-छापना मुमकिन नहीं था."

दिल्ली विश्वविद्यालय के एक छात्र सुधीर बताते हैं, "पाकिस्तान और भारत का साहित्य लगभग एक जैसी सामाजिक संस्कृति की देन है इसलिए वहाँ लिखा गया सब कुछ अपने यहाँ जैसा ही लगता है."

सुधीर कहते हैं, "भारत और पाकिस्तान के राजनेताओं को इससे सबक लेना चाहिए. दोनों ओर से आम लोग, कलाकार और साहित्यकार एक-दूसरे को सम्मान दे रहे हैं, फिर सरकारें क्यों आपस में बैठकर हल नहीं निकाल सकतीं. "

ख़ुद साहित्यकार फ़राज़ अहमद इस तर्क से सहमत हैं. वह मानते हैं, "दोनों ओर से हालात एकदम अनुकूल हैं, बस ज़रूरत है तो दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और ईमानदारी से किए गए प्रयास की."

दिल्ली में पिछले तीन दिनों से लगातार हो रही बारिश के बावजूद बड़ी तादाद में पुस्तक प्रेमी पुस्तक मेले में पहुंच रहे हैं.

प्रकाशकों के मुताबिक पिछले पुस्तक मेलों की तुलना में इस बार ख़राब मौसम के बावजूद 10-15 प्रतिशत ज़्यादा कारोबार हुआ है.

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