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शुक्रवार, 11 अगस्त, 2006 को 15:21 GMT तक के समाचार
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ब्रिटेन में हिंदी के लिए संघर्ष की दास्तां

ब्रिटेन में हिंदी
उषाराजे ने ब्रिटेन में हिंदी की दिशा में प्रयत्न का ज़िक्र किया है
साठ वर्ष पहले जिस ब्रिटेन में हिंदी को 'ग़ुलामों की भाषा' कहकर तिरस्कृत किया जाता था आज इसी हिंदी को ब्रिटेनवासी चाव से अपना चुके हैं.

इसके लिए हिंदी लेखकों ने कितना संघर्ष किया, कितने अपमान झेले- इसे जाने बिना हमारा सांस्कृतिक ज्ञान अधूरा और अधकचरा ही होगा.

ब्रिटेन में हिंदी की अस्मिता बनाए रखने की दिशा में कब क्या प्रयत्न हुए हैं- इस बारे में कोई लिखित जानकारी, कोई दस्तावेज़ नहीं था. लेकिन उषाराजे सक्सेना ने अब इसे साकार किया है.

उनकी पुस्तक 'ब्रिटेन में हिंदी' का विमोचन गुरुवार को लंदन में हुआ. 1980 के दशक से ब्रिटेन में मातृभाषा के आयोजनों में जो गति आई है उसके सारथी के रूप में जिस चेहरे की सबसे अलग पहचान है वो उषाराजे का है.

जिन्होंने इन दशकों की हिंदी की कोई भी सभा, कोई भी सम्मेलन देखा होगा, हो नहीं सकता कि उन्हें उषा राजे की हिंदी की एक निष्ठा का आभास न मिला हो.

आज संसार भर में अंग्रेज़ी का प्रभुत्व जड़े जमा रहा है. लेकिन कई लोगों को ये भ्रम है कि अंग्रेज़ी के प्रयोग के लिए अपनी भाषा छोड़ना ज़रूरी है.

टक्कर

आज असली टक्कर उन दो धारणाओं के बीच है- जिनमें से एक धरती को एकल भाषी बनाना चाहती है, जिसकी मान्यता है कि दुनियाभर का कामकाज एक ही भाषा में हो.

दूसरी ओर हम सब लोग हैं जिनकी मातृभाषा अंग्रेज़ी नहीं है और जो ये मानते हैं कि भगवान ने मनुष्यों को अलग-अलग भाषाएँ बोलने का जो वरदान दिया है उसकी बदौलत एक से अधिक भाषा सीखी जा सकती है.

 अपनी भाषा को गँवाए बिना अंग्रेज़ी पर अधिकार किया जा सकता है. हम उस मोड़ पर खड़े हैं जहाँ तय होना है कि हम सब केवल अंग्रेज़ी का प्रयोग करें या फिर अंग्रेज़ी सीखने के साथ-साथ अपनी भाषा बनाए रखे

अपनी भाषा को गँवाए बिना अंग्रेज़ी पर अधिकार किया जा सकता है. हम उस मोड़ पर खड़े हैं जहाँ तय होना है कि हम सब केवल अंग्रेज़ी का प्रयोग करें या फिर अंग्रेज़ी सीखने के साथ-साथ अपनी भाषा बनाए रखे.

उषाराजे की ये कृति हमें झकझोरती है. हम जहाँ कहीं भी हैं, हम सब पर लाज़िम है कि हम अपनी-अपनी मातृभाषा को बचाए रखें. ये ख़तरे की घंटी केवल किसी भाषा के लुप्त होने की नहीं है.

ये ख़तरा है अपने अस्तित्व के लुप्त होने का, ये ख़तरा ज़दीद है कि अगर अपनी मातृभाषा मिट गई तो हम सब बौने बन जाएँगे. दूसरे जो हमें देंगे हम उन्हीं के बनाए विचारों पर पलेंगे. हम उन्हीं के दिए टुकड़ों पर जिएँगे.

इस पुस्तक में जो आख्यान संकलित हैं, उसे देखकर अपने आप अनुमान मिलता है कि इस जानकारी का लिपिबद्ध होना क्यों ज़रूरी था.

उषाराजे ने क्या लिखा- ये तो आप क़िताब पढ़कर ही जान सकेंगे पर कैसे लिखा- इसका अंदाज़ा ज़रा सा कर लीजिए. किसी पुस्तकालय में, किसी वाचनालय में ऐसा कोई शोध पत्र नहीं मिलता, जिसमें उन संगठनों का, उन रचनाओं का, उन प्रयासों का संकलन हो जो इस देश में हिंदी भाषियों के बीच अपनी भाषा को बनाए रखने की दिशा में हुए.

उषाराजे ने घूम-घूम कर, पूछ-पूछकर ये सामग्री संकलित की. लोगों को फ़ोन किए, इंटरव्यू लिए. लोगों की याद्दाश्त कुरेदी. पुराने प्रकाशनों की, साइक्लो स्टाइल पत्रों की प्रतियाँ बटोरी.

'भाषा का अनर्थ न हो'

पुस्तक के छह अध्यायों में उन्होंने एक ओर तो ये लेखा-जोखा टंकित किया- साथ ही ये सुझाव भी दिया कि अगली पीढ़ी को मातृभाषा में रुचि बनाए रखने के लिए कुछ किया जाना चाहिए.

उषाराजे ने यह पुस्तक लिखने के लिए बहुत मेहनत की

यहाँ मैं ब्रिटेन में, ब्रिटेन में ही नहीं, स्वदेश में भी मातृभाषा का अस्तित्व बनाए रखने के लिए सच्चे मन से एक विनय करना चाहता हूँ.

हिंदी का अगर कोई भविष्य है तो ये तभी संभव है जब हम घर में अपने बच्चों से अपनी मातृभाषा में बात करें. हिंदी का, मातृभाषाओं का अगर कोई भविष्य है तो अगली पीढ़ी की अपनी भाषाएँ सीखने में है.

कल्पना कीजिए किसी ऐसे उद्यान की, जहाँ सब फूल एक रंग के, एक शक्ल के औऱ एक नाप के होंगे. कैसी होगी वो दुनिया जहाँ सभी देशों के लोग एक ही भाषा बोलें, एक ही तरह का संगीत सुनें, एक ही तरह के कपड़े पहनें, एक ही स्वाद का भोजन करें और सबकी शक्ल एक जैसी बनने लगे.

संसार को एक रंग में रंगने का, एक भाषा में गूँथने का जो दुष्चक्र है- उसे तोड़ने का व्रत हमें ही लेना होगा.

बहुत संकोच से मैं एक दृढ़ विश्वास दोहराना चाहता हूँ कि हिंदी मात्र हिंदुओं की भाषा नहीं है. किसी भी भाषा को धर्म के साथ जोड़ना अनर्थ का कारण बनता है.

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